बिजनेस स्टैंडर्ड - टाइनीआउल की थाली खाली!
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टाइनीआउल की थाली खाली!
पतंजलि पाहवा / मुंबई March 13, 2016

जनवरी खत्म होने वाला था और मुंबई की फूड टेक स्टार्टअप कंपनी टाइनीआउल की हालत दिनोदिन पतली होती जा रही थी। हर महीने करीब 2.5 करोड़ रुपये फूंकने वाली कंपनी के गल्ले में महज 18 करोड़ रुपये बचे रह गए थे। पिछले करीब 18 महीनों में उसने तमाम निवेशकों से 152 करोड़ रुपये जुटाए थे, लेकिन अब सभी रास्ते एक-एक कर बंद हो रहे थे। कोई निवेश कंपनी में पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं था और कोई इसे खरीद भी नहीं रहा था। आज यह आलम है कि इस कंपनी के पास केवल जून तक का वक्त रह गया है।
लेकिन स्टार्टअप की दुनिया के इस सबसे चमकदार सितारे की यह दुर्गति कैसे हो गई? असल में कंपनी के गर्दिश भरे दिन पिछले साल सितंबर में शुरू हुए, जब जरूरत से ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखने के बाद उसने 300 को बाहर का रास्ता दिखा दिया। वह इसकी पहली गलती थी।
दरारों का अंदाजा उस वक्त लग गया, जब 30 साल की उम्र पार कर चुकी एक महिला कर्मचारी ने गहरी सांस ली और लंबे डग भरते हुए वह एक केबिन में दाखिल हो गई। केबिन में पहुंचकर उसने ऊंची आवाज के साथ सख्त लहजे में सवाल दाग दिया, 'मुझे नौकरी से निकाल कर आपने कितनी रकम बचा ली है?' यह सवाल टाइनीआउल के संस्थापक और
मुख्य कार्याधिकारी हर्षवद्र्धन मंदाड की ओर उछाला गया था। जवाब में मंदाड उसकी ओर घूरते रहे, कुछ देर की खामोशी के बाद उस महिला ने कहा, 'असल में न तो मुझे इस बात की परवाह है और न ही आपको इससे कोई मतलब है।' इतना कहने के बाद वह धड़धड़ाते हुए केबिन से बाहर हो गई। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि केबिन का दरवाजा बंद होने के बाद मंदाड फिर अपने फोन पर रम गए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। असल में वह अनूठा दिन था क्योंकि मंदाड दफ्तर में थे, जहां आम तौर पर वह नहीं होते। आईआईटी बंबई से निकले मंदाड का काम रकम जुटाना है। परिचालन, वित्त, विपणन, मानव संसाधन और तकनीक का जिम्मा चारों सह-संस्थापकों के बीच बंटा हुआ है। मंदाड को उस महिला ने खरी खोटी सुनाई थी, जिसका साक्षात्कार खुद मंदाड ने तब लिया था, जब जुलाई 2015 में 2,500 ऑर्डरों के साथ कंपनी जबरदस्त तेजी से दौड़ रही थी। संस्थापक जोश में थे और निवेशक भी। जोश लाजिमी भी था क्योंकि भारत की सबसे बड़ी फूड टेक कंपनी जोमैटो भी दिन में करीब 3,000 ऑर्डर ही ले पाती है।    

बहरहाल बेतरतीब तरीके से भर्तियां करने और बाद में नौकरियों से निकालने का मतलब यह था कि टाइनीआउल को एक ही महीने में 8 से 10 करोड़ रुपये फूंकने पड़े। ग्राहक कंपनी के बार-बार लौटकर आ तो रहे थे, लेकिन केवल छूट के बल पर... उन्हें कंपनी से किसी तरह का लगाव नहीं था।
बची-खुची रकम तेजी से खत्म हो रही थी। आखिरकार मंदाड ने दुनिया भर के निवेशकों से गुहार लगानी शुरू कर दी। जर्मनी के कुछ निवेशकों से बात भी हुई, लेकिन उन्होंने रकम लगाने से इनकार कर दिया। हारकर मंदाड ने अक्टूबर में अपने प्रतिद्वंद्वियों से कंपनी का एक हिस्सा खरीदने के लिए कहना शुरू कर दिया। उस समय बिजनेस स्टैंडर्ड ने कंपनी को ई-मेल भेज कर पूछा भी था कि टाइनीआउल बिक तो नहीं रही है। मंदाड और निवेशक कंपनी सिकोया कैपिटल के गौतम मागो ने साफ मना कर दिया।
हालांकि कंपनी के खासमखास रह चुके एक पूर्व कर्मचारी ने बताया, 'हां, हर्ष ने टाइनीआउल का एक हिस्सा बेचने के लिए उन सभी लोगों से बात की, जिनसे उन्हें उम्मीद थी।'
सिकोया, नेक्सस वेंचर्स पार्टनर्स और मैट्रिक्स पार्टनर्स ने कंपनी को 52 करोड़ रुपये देने का फैसला तो किया, लेकिन साफ कहा कि इसके बाद और कुछ नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी को 52 करोड़ रुपये में ही पूरा साल गुजारना होगा। टाइनीआउल के लिए यह जीवनदान से कम नहीं था। लेकिन जहां हर महीने 10 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हों, वहां 52 करोड़ कब तक चलेंगे।
उसी वक्त टाइनीआउल ने दूसरी गलती कर डाली। नवंबर में उसने एक बार फिर छंटनी शुरू कर दी। मंदाड को आगाह भी किया गया कि दीवाली के वक्त छंटनी ठीक नहीं, लेकिन कंपनी ऐलान कर चुकी थी। केवल मुंबई और बेंगलूरु में कामकाज जारी रखा गया। बाकी सभी जगहों पर सह-संस्थापक गए। उसके बाद उनके और कर्मचारियों के संबंध किस कदर बिगड़े, किस तरह उनमें से कुछ को दफ्तर में ही कैद कर लिया गया, सबको पता है। लेकिन इस बीच मंदाड की किसी को खबर नहीं थी। वह दफ्तर में फटके भी नहीं और फोन से ही बातचीत करते रहे।
उस छंटनी के बाद महीने का खर्च घटकर 4 करोड़ रुपये से भी नीचे आ गया। अब उसी रकम से सात महीने तक गुजारा हो सकता था। लेकिन कंपनी का नाम खराब हाने के कारण अब बमुश्किल 1,000 ऑर्डर मिल रहे थे। टाइनीआउल अब छूट नहीं दे रही थी और बेंगलूरु की कंपनी स्विगी उससे आगे निकल गई थी।
इतने बुरे दिनों में भी टाइनीआउल एक और गलती करने से नहीं चूकी। दिसंबर के पहले हफ्ते में मंदाड ने कहा कि कंपनी टाइनीआउल को नई शक्ल में पेश करने जा रही है। उस वक्त ऊंचे ओहदे पर रहे और अब कंपनी छोड़ चुके एक व्यक्ति ने कहा, 'इस ऐलान से सब सकते में आ गए।' नई टाइनीआउल अब केवल एक व्यंजन बेच रही थी। मसलन आप ऐप्लिकेशन खोलते थे तो लिखा मिलता था कि आज का व्यंजन डोसा है। इसके बाद ऐप आपको बताती थी कि आप कहां-कहां से डोसा ऑर्डर कर सकते हैं। इसका भ_ïा बैठना ही था क्योंकि दो महीने पहले पूरे दिन में महज तीन ऑर्डर मिल रहे थे।
बुरे दिनों के बीच दिसंबर में मंदाड तीन हफ्ते की छुट्टïी पर निकल गए। लेकिन जाने से पहले वह चौथी गलती करना नहीं भूले। उन्होंने एक मुख्य तकनीकी अधिकारी (सीटीओ) को नौकरी पर रख लिया। खबर है कि सीटीओ आकाश सक्सेना को 1.50 करोड़ रुपये सालाना पगार पर रखा गया और कंपनी में कदम रखते वक्त उन्होंने 50 लाख रुपये का बोनस भी लिया। अभी तक बेफिक्र रहे निवेशक अब एक-एक पैसे पर नजर रख रहे थे। एक कर्मचारी ने बताया कि तकनीकी टीम से 10 कर्मचारियों को केवल यह दिखाने के लिए निकाल दिया गया कि सक्सेना के आने से खर्च नहीं बढ़ा है। अच्छे दिनों में जिस तकनीकी टीम में 200 लोग थे, वहां अब केवल 20 काम कर रहे थे। कंपनी में 1,100 के बजाय अब 200 से भी कम कर्मचारी रह गए थे। छुट्टïी पर रहते हुए ही मंदाड ने बेंगलूरु का दफ्तर बंद करने का फरमान भी सुना दिया।
जनवरी में लौटते ही मंदाड ने नई गलती करने की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने नई रणनीति का खाका खींचा, जिसमें किसी खास इलाके में खान-पान के ऑर्डर लेने थे, जैसा ग्रॉफर्स किराने के मामले में करती है। हाल में कंपनी छोडऩे वाले एक कर्मचारी ने कहा, 'इसे ऐसे समझिए। मान लीजिए कि आपने दाल, रोटी और सब्जी का ऑर्डर दिया है। टाइनीआउल ये तीनों व्यंजन अलग-अलग रेस्तरां से लेगी और आप तक पहुंचा देगी।' तीन जगह से सामान बटोरने और पहुंचाने का खर्च टाइनीआउल को ही उठाना पड़ता था, जो महंगा पड़ता। यह कारोबारी बहुत नकदी चट कर रहा था। यह देखकर सभी विभाग प्रमुखों
को भी नई नौकरियां तलाशने के लिए कह दिया गया।
एक कर्मचारी ने कहा, 'हमने मंदाड से कहा कि होममेड (शौकिया तौर पर खाना बनाने वालों को इक_ïा करने का कारोबार) पर ही ध्यान दिया जाए। उसमें केवल होलाशेफ ही हमें टक्कर दे रहा था और उसे हम आसानी से पछाड़ सकते थे।' होममेड कंपनी की इकलौती इकाई थी, जो नुकसान में नहीं चल रही थी, लेकिन उसे भी बंद कर दिया गया। यह छठी गलती थी।
इसके बाद मंदाड और निवेशकों ने कंपनी की कीमत आंकनी शुरू कर दी। इसके साथ ही यह तय हो गया कि कंपनी को अब बिकना है। संस्थापकों को उम्मीद है कि टाइनीआउल को जोमैटो खरीद लेगी क्योंकि सिकोया ने दोनों में ही निवेश किया है। कुछ पूर्व कर्मचारियों ने बताया कि मंदाड के मुताबिक ओला भी इसमें दिलचस्पी दिखा रही है। लेकिन दोनों से बातचीत नाकाम ही साबित हुई। फिर खबरें आईं कि टाइनीआउल की रोडरनर से बात चल रही है। लेकिन खबरों की पुष्टिï नहीं हो पाई। जोमैटो ने इस तरह की खबरों पर कुछ कहने से इनकार कर दिया और टाइनीआउल, ओला, रोडरनर से कोई जवाब नहीं मिला।

Keyword: tiny owl, Food, tech start-up,
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