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कठिन डगर, मुश्किल सफर
संपादकीय /  February 25, 2016

वर्ष 2016-17 का रेल बजट कठिन परिस्थितियों के बीच पेश किया गया। वर्ष 2015-16 के लिए इसका संशोधित अनुमान स्वाभाविक तौर पर आर्थिक मंदी की गवाही देता है और सातवें वेतन आयोग के कारण पडऩे वाले बोझ ने वर्ष 2016-17 के मुनाफे को बहुत हद तक प्रभावित किया है। परिचालन अनुपात के संशोधित आंकड़ों की बात करें तो चालू वर्ष में 1.5 फीसदी की गिरावट आई है और यह 90 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा वर्ष 2014-15 के एकदम उलट है जब इस क्षेत्र में प्रदर्शन अनुमान से काफी बेहतर रहा था। 

 
वर्ष 2016-17 के अनुमानों में कहा गया है कि भारतीय रेल की वित्तीय स्थिति और डांवाडोल हो सकती है। अनुमान जताया गया है कि परिचालन अनुपात में पूरे दो प्रतिशत की गिरावट आ सकती है और यह 92 प्रतिशत के अत्यंत खतरनाक स्तर पर पहुंच सकता है। सबसे अधिक चिंता की बात तो यह है कि डेप्रिशिएशन रिजर्व फंड यानी मूल्यह्रïास आरक्षित निधि में भारी कमी की गई है और इसे चालू वर्ष के 5,500 करोड़ रुपये के संशोधित आंकड़ों की तुलना में घटाकर 3,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है। वह भी तब जबकि 5,500 करोड़ रुपये की राशि भी बजट अनुमान में उल्लिखित 7,900 करोड़ रुपये की तुलना में काफी कम थी। ध्यान रहे कि यह राशि महत्त्वपूर्ण रखरखाव कार्यों मसलन पटरी आदि बदलने पर खर्च की जाती है। अचरज नहीं कि इस मद में कमी से दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ सकती है। वास्तविक खर्च कुछ अलग हो सकता है लेकिन आंकड़ों से नकारात्मक संकेत जाता है इसमें दो राय नहीं। 
 
मांग की परिस्थितियों में कमजोरी पर सुरेश प्रभु का कोई वश नहीं है। उन्होंने कम से कम लागत को थामने के लिए कुछ तो किया है। संशोधित आंकड़ों में कार्यशील खर्च में सात प्रतिशत की कटौती की गई है। अगर अगले साल के अनुमान में उसमें 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी नजर आ रही है तो वह दरअसल सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का प्रभाव है। कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रभु को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने वित्तीय नुकसान को कम से कम करने का प्रयास किया। वह मालढुलाई नीति बनाने की सही राह से डिगे नहीं। न ही उन्होंने अपने मूल ग्राहकों पर ध्यान बनाए रखते हुए संगठनात्मक पुनर्गठन और निवेश बढ़ाने के प्रयासों से कोई समझौता किया। लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर नए सिरे से रोशनी डालने की आवश्यकता है।
 
उन्होंने सुधारों पर से अपनी नजर तो नहीं हटाई है लेकिन चालू वर्ष में वह उनकी ओर बहुत धीमी गति से आगे बढ़े हैं। पुनर्गठन और शुल्क तय करने के लिए नई संस्था गठित करने का विचार लंबे समय से चर्चा में है लेकिन अब तक इस पर अमल नहीं हो सका है। यहां तक कि नए वैकल्पिक संग्रहण आधरित लेखा तैयार करने का काम भी पूरा नहीं हो सका है जिसे लेकर तमाम विवाद हैं। परंतु अहम सवाल यह है कि आखिर आने वाले साल के लिए आर्थिक वृद्घि के अनुमान क्या हैं जिनके आधार पर प्रभु ने यात्री राजस्व तथा माल ढुलाई से होने वाली आय दोनों में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है। यह प्रश्न इसलिए क्योंकि चालू वर्ष में इन दोनों में तीव्र नकारात्मक संशोधन किया गया है। 
 
सुरक्षा (रेलवे सुरक्षा बल) और अस्पताल चलाने तथा स्कूल चलाने जैसी गैरमूलभूत गतिविधियों को अलग करने के विचार पर जरा भी तरक्की नहीं हो सकी है। कर्मचारियों और पेंशन पर होने वाला खर्च पहले ही कुल खर्च का लगभग आधा हो चुका है। अब सातवें वेतन आयोग द्वारा लगे झटके के बाद इस व्यय में और अधिक इजाफा होना तय है। इस मोर्चे पर नियंत्रण करना रेलवे के लिए अत्यंत अहम है लेकिन प्रभु ने इस मुद्दे का समाधान करना आरंभ तक नहीं किया है।
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