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आईपीआर की कमियां
संपादकीय /  February 18, 2016

अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के ग्लोबल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी सेंटर (जीआईपीसी) ने भारत को अपने चौथे सालाना बौद्घिक संपदा अधिकार (आईपीआर) सूचकांक में शामिल किए गए 38 देशों की सूची में अंतिम से दूसरा स्थान दिया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वह यह मानता है कि भारत में पेटेंट संरक्षण की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद श्रेष्ठï मानकों या कार्य व्यवहार के अनुरूप नहीं है। भारत के आईपीआर संबंधी माहौल की जिन कमियों अथवा सीमाओं का उसने उल्लेख किया है उनमें जीवन विज्ञान क्षेत्र के लिए विशिष्टï बौद्घिक संपदा अधिकार की कमी, प्रवर्तन का कमजोर माहौल, ऑनलाइन पायरेसी से निपटने के लिए प्रभावी उपायों की कमी, डाटा संरक्षण के कमजोर मानक और अंतरराष्ट्रीय आईपीआर संबंधी संधियों में उसका भागीदारी नहीं करना आदि शामिल हैं। इसके अलावा उसने अमेरिकी उद्योग जगत और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) की उन सामान्य चिंताओं को स्वर दिया ही है जो पेटेंट की जरूरतों और भारतीय पेटेंट कानून में अनिवार्य लाइसेंसिंग से संबंधित हैं। 

 
जीआईपीसी की रैंकिंग सांविधिक, नियामकीय और प्रवर्तन संबंधी उन मानकों का प्रयोग करती है जो नैसर्गिक तौर पर विकसित देशों में आईपीआर की अवधारणाओं पर आधारित होते हैं। कहना नहीं होगा कि रैंकिंग में विकसित देशों का स्थान शीर्ष पर है। ऐसी तमाम शिकायतें हैं कि विभिन्न देशों ने छोटे लेकिन महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनकी मदद से वे आईपीआर के प्रवर्तन और शिकायत निवारण व्यवस्था निर्मित करने में प्रगति कर रहे हैं लेकिन इनको सूचकांक में शामिल नहीं किया गया। यह सच है कि भारत में भी प्रवर्तन की व्यवस्था कमजोर है। लेकिन इसने अपने पेटेंट कार्यालय को मजबूत बनाया है। इस कोशिश में उसने अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ा है और वह व्यावसायिक विवादों को हल करने के लिए न्यायिक उपचार हासिल करने की प्रक्रिया में सुधार कर रहा है। ये तमाम बातें रैंकिंग में परिलक्षित नहीं हुई हैं। एक अन्य संभावित अग्रगामी कदम है देश की लंबे समय से प्रतीक्षित आईपीआर नीति। बहुत कुछ इस नीति की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है। क्या यह नीति देश की आईपीआर चिंताओं को दूर कर सकेगी वह भी बिना भारतीय पेटेंट कानून के सिद्घांतों से समझौता किए? आखिरकार भारतीय पेटेंट कानून के प्रावधान वैश्विक बहस में बाहरी हैं भले ही उनको प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब तक किसी तरह की चुनौती नहीं दी गई हो। ऐसे में भारत के इस दावे का विरोध करना मुश्किल है कि उसका कानून टीआरआईपी के अनुरूप है। निश्चित तौर पर दोहा घोषणा और उक्त नजीर इस आधार पर अनिवार्य लाइसेंसिंग का बचाव करती है कि वह जनस्वास्थ्य की जरूरतों के लिहाज से अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में इस आधार पर भारतीय पेटेंट कानून का विरोध करना मुश्किल हो जाएगा। 
 
बहरहाल, अनेक वास्तविक चिंताएं ऐसी भी हैं जिनसे निपटना आवश्यक है। खासतौर पर उन मामलों में जो सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान तथा मनोरंजन क्षेत्र में ऑनलाइन पायरेसी और कॉपीराइट के उल्लंघन से संबंधित हैं। पेटेंट की पूरी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा तथा जिन पेटेंट धारकों को लगता है कि उनकी बौद्घिक संपदा का उल्लंघन हुआ है उनकी समस्या का देश में अधिक तेजी से निवारण होना चाहिए। एक बार जब इस नीति में उपयुक्त सुधार हो जाएंगे और आईपीआर व्यवस्था की कमियां दूर कर ली जाएंगी तो उम्मीद की जा सकती है कि भारत भी यह कहने की स्थिति में होगा अब उसे आईपीआर मसलों की निगरानी सूची में रखे जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। 
Keyword: india, IPR, america, GIPC,,
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