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फंसे कर्र्ज के लिए 'बैड बैंक'!
अरूप रॉयचौधरी और दिलाशा सेठ / नई दिल्ली February 18, 2016

देश की वित्तीय संस्थाओं के फंसे हुए कर्ज अपने हाथ में लेने के लिए सरकारी 'बैड बैंक' बनाने का विचार भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को चाहे नहीं भा रहा हो, लेकिन सरकार शायद इस पर आगे बढ़ जाएगी। राजन ने इस विचार पर संदेह जताया है, लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड को पता चला है कि सरकार इस मसले पर पहले ही नीतिगत प्रस्ताव पर काम कर रही है।
 
हालांकि सरकार समर्थित ऐसी परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी का गठन एक लंबी प्रक्रिया है और अभी भी यह विचार शुरुआती अवस्था में है। यहां तक कि सरकारी सूत्रों का कहना है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली आगामी बजट में वित्तीय क्षेत्र के लिए मध्यावधि योजना के तौर पर इसे लेकर कोई ऐलान कर सकते हैं। इस मसले पर अंतर-मंत्रालय स्तर पर भी विमर्श हो चुका है।
 
कुछ दिन पहले ही राजन ने कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में फंसे हुए कर्जों से निपटने के लिए अलग बैंक बनाने की जरूरत नहीं है। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में राजन ने कहा था, 'सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर खुद सरकार का हाथ रखा हुआ है, लिहाजा सरकार प्रवर्तित एक अलग संस्था गठित करने की कोई जरूरत नहीं। अब मसला बैंकों के फंसे हुए कर्जों से निपटने का है।' राजन ने यह भी कहा था कि सरकार प्रवर्तित ऐसे बैंक में परिसंपत्तियों के मूल्यांकन का मामला नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के मोर्चे पर भी फंस सकता है। 
 
इस मामले से जुड़े एक सरकारी सूत्र ने बताया, 'सरकार एक 'बैड बैंक' के प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित आस्तियों से निपटने की जिम्मेदारी खुद लेकर इन बैंकों के बहीखाते दुरुस्त करने में मदद करेगा। इससे जुड़े विभिन्न पक्षों के साथ शुरुआती स्तर पर वार्ता चल रही है।' चालू वित्त वर्ष की मीसरी तिमाही में इन बैंकों ने फंसे हुए कर्जों के मामले में तेजी का नया रिकॉर्ड बनाया, जिसमें मुश्किलों के दौर से गुजर रही इस्पात, बिजली और अवसंरचना क्षेत्र की कंपनियों को दिए गए कर्जों का दबाव साफ तौर पर नजर आया। 
 
सरकारी अधिकारी ने बताया, 'गवर्नर (आरबीआई) ने तार्किक बिंदुओं को उठाया है, जिन पर गौर किया जाएगा। हालांकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि अगर नियामक किसी चीज का विरोध करे तो वह चीज नहीं करनी चाहिए या उसे नहीं किया जा सकता। कोई भी फैसला सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही किया जाएगा।' एक अन्य अधिकारी ने बताया कि परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी आरबीआई के लिए कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि यह बैंकों की खराब परिसंपत्तियों का ही जिम्मा लेगी। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि केवल यही कारगर विकल्प नहीं होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि बैंक फिर फंसे हुए कर्जों के फेर में न फंस जाएं। सूत्रों का कहना है कि विभिन्न देशों के अनुभवों को देखते हुए इस पर विचार किया जा रहा है। इसमें ताजा पहल तो अमेरिका में ट्रबल्ड ऐसेट्स रिलीफ प्रोग्राम (टीएआरपी) की स्थापना के रूप में की गई है, जिसका गठन अमेरिकी वित्त विभाग ने वर्ष 2008 में लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद किया था। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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