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निवेश करते समय लंबी अवधि का हमेशा रखें ध्यान
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  February 10, 2016

देश में लंबी अवधि की बचत की दो प्रमुख योजनाएं कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) और राष्टï्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) अब अपनी बचत का एक हिस्सा शेयर बाजार में निवेश कर सकती हैं। ऐसे में यह महत्त्वपूर्ण है कि इनके फंड मैनेजरों तथा जिन कंपनियों में ये निवेश करेंगी उनकी दृष्टिï दीर्घकालिक हो। इन दोनों के बीच एक अहम बिचौलिये का जिक्र आवश्यक है। यानी ऐसे विश्लेषक जो जानकारी का विश्लेषण कर निवेश संबंधी मशविरा देते हैं। आदर्श स्थिति तो यही है कि विश्लेषक को भी एक दीर्घकालिक नजरिया रखना चाहिए। इसके विपरीत हमने अमेरिकी मॉडल का अनुकरण किया है जिसमें तिमाही नतीजों पर ध्यान दिया जाता है। कारोबारी नेतृत्वकर्ता निवेशकों का समर्थन गंवाने को लेकर सतर्क रहते हैं और उनको हमेशा यह डर सताता रहता है कि कहीं तिमाही नतीजों से उनके शेयर मूल्य में गिरावट न आ जाए। इन बातों को देखते हुए वे दीर्घावधि की वृद्घि के लिए कोई नवाचार अपनाने के बजाय अल्पावधि के हित देखते हैं। 

 
इसका एक अच्छा उदाहरण गत सप्ताह टाटा स्टील के ब्रोकरेज द्वारा की गई गोपनीय बिकवाली या घटाई गई अनुशंसाओं में देखने को मिला। कंपनी को दिसंबर तिमाही में न केवल जबरदस्त घाटा हुआ बल्कि वैश्विक स्तर पर अत्यधिक आपूर्ति बनी होने और चीन के इस्पात निर्यातकों द्वारा कारोबार समेटने के बावजूद कंपनी 10 लाख टन की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता लाने जा रही है। उसके ब्रोकरेज को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उसने तो अल्पकालिक नजरिया ही अपनाया। लेकिन टाटा स्टील जिसे अभी कुछ वक्त पहले तक दुनिया का सबसे कम लागत वाला स्टील उत्पादक समझा जाता था, वह 15  लाख टन अतिरिक्त स्टील का उत्पादन कर उसे बेचने जा रही है, वह भी उच्च गुणवत्ता वाला। हाल में प्रतिकूल नतीजे आए और भारी नुकसान इसलिए हुआ है क्योंकि वैश्विक स्तर पर जिंस कीमतों में कमी आई है और इससे पहले यूरोप में अधिग्रहण का उसका दांव उलटा पड़ गया। 
 
स्टील उत्पादकों की कारोबारी संभावनाओं में आई इस मंदी ने दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी आर्सेलरमित्तल को भी प्रभावित किया। कंपनी ने अपने निवेशकों से आग्रह किया कि वे मंदी से उबरने के क्रम में उसे 3 अरब डॉलर की मदद करें। अगर आप पेंशनरों के भुगतान के लिए 20 वर्ष का नजरिया लेकर चलें तो परिदृश्य नाटकीय रूप से बदल जाएगा। टाटा स्टील के शेयर की मौजूदा कीमत अच्छी है। किसी को उनके नीचे जाने की उम्मीद नहीं है और जिंस कीमतें हमेशा कमजोर नहीं रहने वाली। आमतौर पर जापान की यह प्रवृत्ति रही है। वह मंदी के दिनों में अधिशेष तैयार करता है ताकि कारोबारी चक्र सुधरने पर जब कमी पैदा हो तो वह उसका फायदा उठा सके। 
 
वॉल स्ट्रीट में पारंपरिक समझ अब बदल रही है। ब्लैकरॉक के मुख्य कार्याधिकारी लैरी फिंक के पास 46 खरब डॉलर का पोर्टफोलियो है और उनको दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक माना जाता है। उन्होंने हाल ही में एसऐंडपी कंपनियों के 500 मुख्य कार्याधिकारियों को तथा यूरोप के कुछ बड़े संस्थानों को खत लिखकर सलाह दी कि वे अल्पावधि के सोच का प्रतिरोध करें और दीर्घावधि की वृद्घि के लिए निवेश करें। उन्होंने कहा कि ब्लैकरॉक के अधिकांश ग्राहक सेवानिवृत्ति के लिए बचत कर रहे हैं, ऐसे में यही उपयुक्त होगा। वह उनको व्यवस्थित ढंग से काम करने के लिए कह रहे हैं ताकि वे दीर्घावधि की वृद्घि को ध्यान में रख सकें। अगर आज निवेशक कंपनियों को लेकर अल्पावधि का दृष्टिïकोण अपना रहे हैं तो इसकी वजह यह है कि मुख्य कार्याधिकारियों ने उनको दीर्घावधि के महत्त्व से परिचित नहंी कराया है। फिंक कहते हैं, 'दीर्घावधि पर ध्यान दिया जाए तो तिमाही प्रति शेयर आय को लेकर किसी निर्देशन की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। ऐसे में कंपनियों से कहा जाना चाहिए कि ये आंकड़े पेश करने की जरूरत ही नहीं।' इसके बाद एक अहम वाक्य में वह कहते हैं, 'आज तिमाही आय की संस्कृति जोर पकड़ चुकी है जो दीर्घावधि के नजरिये से एकदम गलत है।' विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों को चाहिए कि वे प्रति शेयर आय में आए विचलन पर ध्यान देने के बजाय अपनी रणनीति पर काम करें। 
 
आखिरी पैराग्राफ में फिंक कहते हैं कि दीर्घावधि के दौरान प्रतिफल हासिल करने के लिए उन पर्यावरण और सामाजिक कारकों पर तेज नजर रखनी होगी जिनका सामना कंपनियों को आज करना पड़ रहा है। वह स्पष्टï कहते हैं कि दीर्घावधि के दौरान केवल पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासन संबंधी मुद्दे ही मायने रखेंगे। इन मामलों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले ही टिक सकेंगे। यह सारी बात भारत के लिए किस हद तक प्रासंगिक है? फिंक कहते हैं कि वैश्विक स्तर पर बहुत असमानता देखने को मिल रही है। अधिकांश उभरते बाजारों में विकास के लिए बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में निवेश और रोजगार निर्माण समेत उससे जुड़े तमाम अन्य लाभ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे समय में जबकि पूंजी बाजारों में जबरदस्त अनिश्चितता का माहौल है, उस समय निवेशकों के लिए जरूरी है कि निवेशकों को कम से कम उनकी कंपनी के भविष्य के बारे में अग्रगामी नजरिया सुनने को मिले। सरकारी नीति भी ऐसी होनी चाहिए जो स्थायी विकास हासिल करने में मददगार हो सके। दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक सचेत पूंजीवाद की बात कर रहा है जो सामाजिक उद्यमिता के लक्ष्य से बहुत दूर नहीं है। इसका लक्ष्य ऐसी स्थायी सार्वजनिक नीति हासिल करना है जो बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा दे और वैश्विक स्तर पर असमानता को कम करे। 
 
भारत के लिए यह अच्छी बात है कि हमारे यहां हर तीन महीने में आमदनी के ब्योरे के साथ आगे की संभावना का संकेत कभी कभार ही देखने को मिलता है। हां, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में जरूर ऐसा हुआ करता था लेकिन इन्फोसिस ने वर्ष 2012 में ऐसा करना बंद कर दिया तो कमोबेश सभी जगह इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया। हालांकि कॉग्निजेंट इस मामले में अपवाद है। 
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