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दिवालिया कानून की कमियां करें दूर
देवाशिष बसु /  February 09, 2016

देश को एक दिवालिया कानून की आवश्यकता है लेकिन इससे संबंधित नए विधेयक में कुछ कमियां हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु 

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उचित कदम, गलत राह
 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जिन महत्त्वपूर्ण सुधारों का जिम्मा लिया है उनमें से एक है दिवालिया विधेयक (इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंक्रप्टसि कोड, 2015)। यह विधेयक संसद के बजट सत्र के दौरान पेश किया जाएगा। मोदी सरकार ने अब तक जो काम किए हैं उनमें से अधिकांश या तो यथास्थितिवादी हैं या फिर उन्होंने पिछली सरकार की योजनाओं का ही सुधरा हुआ संस्करण पेश किया है। हां, एक व्यापक दिवालिया कानून पूरी तरह उसका अपना विचार है और उसने इसके क्रियान्वयन की दिशा में बहुत तेज गति से कदम बढ़ाया है। अभी यह तय नहीं है कि इसे लेकर कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल किस तरह का विरोध करेंगे क्योंकि उसके बचाव में उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होगा। न ही उनके पास इस मुद्दे में भुनाने के लिए कुछ है। यह उनके लिए एक रहस्यमय विषय है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विधेयक पारित हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो माना जाना चाहिए कि सरकार कम से कम कागजी स्तर पर तो कारोबारी सुगमता के मामले में विकसित विदेशी मुल्कों की बराबरी करने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगा लेगी। 
 
भारत में दिवालियापन से निपटने का कोई कानून नहीं है। व्यक्तियों का दिवालियापन तो सन 1909 के प्रेसिडेंसी इन्सॉल्वेंसी टाउन्स ऐक्ट और प्रॉविंशियल इन्सॉल्वेंसी ऐक्ट, 1920 के तहत आता है लेकिन कंपनियों के दिवालियापन के मामले उच्च न्यायालय द्वारा कंपनी अधिनियम के तहत निपटाए जाते हैं। जबकि इसके समांतर हमारे यहां सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज ऐक्ट, 1985, रिकवरी ऑफ डेट ड्यू टु बैंक ऐंड फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशंस ऐक्ट 1993 और सिक्युरिटाइजेशन ऐंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनैंशियल ऐसेट्स ऐंड एन्फोर्समेंट ऑफ सिक्युरिटी इंट्रेस्ट ऐक्ट, 2002 (सरफेसी) हैं। इनमें से आखिरी दो कानून तो बैंकों की मदद के लिए उस समय बनाया गया जब फंसा हुआ कर्ज उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन चुका था। लेकिन इसका अर्थ यह भी हुआ कि कंपनी लॉ बोर्ड, द बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल ऐंड फाइनैंशियल रिकंस्ट्रक्शन (बीआईएफआर) और डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) के रूप में चार अलग-अलग एजेंसियां फंसे हुए कर्ज से निपटने के काम में लग गईं। इसकी वजह से देरी और भ्रष्टाचार की शुरुआत हुई। बैंकरों और नियामकों ने गलत तरीके से और अपनी सुविधा के मुताबिक इन एजेंसियों और अपर्याप्त कानूनों की मदद से यह स्पष्टï करने की कोशिश की है आखिर क्यों सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज ज्यादा हैं। दिवालिया विधेयक के तहत दिवालियापन को 180 दिनों के अंदर निपटाना होगा।
 
इस विधेयक के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है वाटरफॉल प्रावधान। देश में पहली बार मैं देख रहा हूं कि सरकार का बकाया सबसे आखिर में आ रहा है। इस विधेयक के तहत नकदीकरण का भुगतान निम्रलिखित तरीके से किया जाएगा: सुरक्षित ऋणदाता, कामगारों का 12 महीने का बकाया, कामगारों से इतर कर्मचारी, असुरक्षित ऋणदाता। इन सबके बाद सरकारी ऋण का नंबर आएगा वह भी महज दो वर्ष के लिए। इसके बाद अन्य कर्र्ज, प्राथमिकता वाले अंशधारकों और इक्विटी अंशधारकों का नंबर आएगा। अगर सरकार ने इस पर समग्रता से विचार किया है और वह इस कतार में आखिरी बनने को तैयार हो गई है तो यह बहुत सुखद बदलाव है और सरकार के पूर्व के रुख से एकदम उलट है।
 
दिवालिया कानून का सबसे अधिक फायदा सरकारी बैंकों के अंशधारकों को मिलेगा। सरकारी बैंकों का अर्थव्यवस्था पर दबदबा है लेकिन शीर्ष तीन फंसे कर्ज वाले खातों की राशि करीब 90,000 करोड़ रुपये है। यह सकल फंसे हुए कर्ज का 36 फीसदी है। एक अनुमान के मुताबिक सरकारी बैंकों को वर्ष 2018 तक 2.4 लाख करोड़ रुपये की पूंजी की आवश्यकता है। तभी वह बेसल-3 मानकों को पूरा कर पाएगा। आरबीआई गवर्नर और कुछ अन्य बैंकरों ने आरोप लगाया है कि दिवालिया कानून की कमी के चलते फंसे हुए कर्ज का दबाव बढ़ा। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि आखिर निजी क्षेत्र के बैंकों पर दिवालिया कानून की कमी का प्रभाव क्यों नहीं पड़ा? सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज उनके कुल कर्ज का 5 फीसदी है जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों में यह महज 1.5 फीसदी है। स्पष्टï है कि फंसे हुए कर्ज की एक बड़ी वजह भ्रष्टïाचार भी है। इसके अलावा राजनेताओं का हस्तक्षेप, फंसा हुआ कर्ज और नियामकीय विफलताएं भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। क्या नया कानून इसमें बदलाव लाने में सक्षम है? नए विधेयक की कुछ समस्याओं पर विचार करते हैं। 
 
मेरी नजर में सबसे बड़ा मसला यह है कि मौजूदा कानूनों में से कोई समाप्त नहीं किया जा रहा है। कुछ लोगों ने विनम्रतापूर्वक यह सुझाव दिया है कि इन कानूनों की सीमा और इनके एक दूसरे को प्रभावित करने वाले प्रावधानों का स्पष्ट सीमांकन होना चाहिए। ऐसा इसलिए ताकि किसी तरह का विवाद न पैदा हो। स्पष्टï है कि अगर इन कानूनों को समाप्त नहीं किया गया तो हम और बड़ी दिक्कत में पड़ सकते हैं।
 
दूसरा, एक नया नियामकीय ढांचा तैयार किया जा सकता है। इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंक्रप्टसि बोर्ड ऑफ इंडिया के रूप में इस ढांचे का प्रस्ताव नियामकीय पेशेवरों, एजेंसियों और उन सूचना इकाइयों के समक्ष रखा जा सकता है जो दिवालियापन की समस्याओं से निपटने के काम में लगे हैं। इसके अलावा इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंक्रप्टसि फंड नामक एक कोष का भी प्रस्ताव है। यह भी भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड जैसी एक संस्था बनकर रह जाएगी। इसमें तकरीबन वे सारी बुराइयां आ जाएंगी जिन्होंने सेबी को बहुत हद तक निष्प्रभावी बना दिया है। 
 
तीसरी बात, शायद दिवालिया विशेषज्ञ इसकी व्याख्या कर सकें। लेकिन जहां तक मेरी समझ है इस बात की पूरी संभावना है कि पूरी व्यवस्था एकजुट हो जाए और दिवालियेपन की 180 दिन या 270 दिन की सीमा को तकनीकी आधार पर खत्म कर दे। इसके बाद नियामक की निगरानी में काम पहले की तरह चलता रहेगा। विधेयक में बड़े पैमाने पर संशोधनों की आवश्यकता है। इसके लिए कोशिश यह की जानी चाहिए कि विकसित देशों के विशेषज्ञों को लाया जाए जिनको दिवालियेपन से निपटने की अच्छी समझ हो और जो तनावग्रस्त ऋण बाजार के बारे में भी समझ रखते हों। हम अब तक अपने स्तर पर ऐसे तमाम गलत उपायों का खूब खमियाजा उठा चुके हैं जिनमें वित्तीय क्षेत्र की हर समस्या से निपटने में सरकार की अहम भूमिका रखी गई है। 
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