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गांधी की खोज
मानवी कपूर /  February 03, 2016

देश की राजधानी दिल्ली में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर बने कुछ संस्थान प्रासंगिक बने रहने के लिए कर रहे हैं संघर्ष। इसका जायजा लिया मानवी कपूर ने

हफ्ते के किसी कामकाजी दिन नई दिल्ली के राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय में लोगों की भीड़ देखना, हैरान कर देने जैसा है। इस भीड़ में ज्यादातर पर्यटक और विदेशी हैं। हालांकि यहां मौजूद लोगों में दिल्ली के लोगों की तादाद भी अच्छी खासी है जो बेहद शांत नजर आते हैं। संग्रहालय के निदेशक अलागन अन्नामलाई को कोई हैरानी नहीं होती है। वह कहते हैं, 'महात्मा गांधी को लेकर कुछ उत्सुकता हमेशा रही है और यह दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही है।' कड़क सफेद कुर्ता पायजामा पहने हुए वह दफ्तर में बैठे हैं और ऐसा लगता है जैसे वह वक्त के साथ थम गए हैं। वह एक पेंट किए गए बांस के सोफे पर बैठे हैं जिस पर गद्दे लगे हुए हैं। यहां हर जगह गांधी की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं और बदलते वक्त का संकेत सिर्फ कंप्यूटर और डेस्क पर लगे प्रिंटर से मिलता है।
ऐसी धारणा है कि राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय और गांधी के नाम वाले दूसरे संस्थानों का स्वामित्व सरकार के पास रहता है और उन्हें सरकार ही चलाती है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या के बाद नागरिक समाज और राजनीतिक क्षेत्र के कुछ प्रभावशाली लोगों ने गांधी के लिए एक स्मारक बनाने का फैसला किया। इसकी संस्थापक समिति के सदस्यों में जवाहरलाल नेहरू, सी राजगोपालाचारी, वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद शामिल थे। उसी दौरान आम लोगों से पूंजी दान करने की अपील के साथ गांधी स्मारक निधि की स्थापना हुई थी। उस वक्त 11 करोड़ रुपये जमा हुए थे जो उस वक्त का सबसे बड़ा सार्वजनिक कोष था। हालांकि इस पूंजी को बरकरार रखा गया लेकिन इस फंड का मूल्य कई सालों से कम होता गया। करीब 30 सालों से गांधीवादी छात्र आंदोलन से जुड़े अन्नामलाई का कहना है, 'भले ही इससे प्रभावशाली नेता जुड़े थे लेकिन उस वक्त भारत सरकार का एक भी रुपया इस स्मारक को बनाने में  खर्च नहीं किया गया था। गांधी का मानना था कि यह सरकार नहीं बल्कि लोगों का कर्तव्य है कि वे उनके काम को आगे बढ़ाएं।'
गांधी स्मारक निधि तब मुख्य संगठन बन गया जो देश भर में गांधी से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं और स्मारकों के निर्माण के लिए फंडों का आवंटन करता है। लेकिन शुरुआती स्तर के तुरंत बाद गांधी से जुड़ा यह संगठन स्वायत्त हो गया और अपने वित्त का प्रबंधन खुद करने के साथ ही वह अपने लोगों को नौकरी पर भी रखने लगा। दिल्ली में राजघाट के नजदीक गांधी समाधि के पास 6.2 एकड़ गांधी स्मारक निधि के परिसर के एक हिस्से में 1959 में दो मंजिला संग्रहालय अस्तित्व में आया। अन्नामलाई के मुताबिक यह जमीन चिरस्थायी रूप से पट्टïे पर ले ली गई है। राजघाट परिसर करीब 36 एकड़ जमीन पर है। समाधि को छोड़कर वित्त या प्रशासन के लिहाज से किसी भी गांधी संस्थान का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ साल पहले ही समाधि सरकार के नियंत्रण में आई है। पी वी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह सरकार के दौरान संग्रहालय के नाम 10 करोड़ रुपये की पूंजी का आवंटन किया गया जो इसकी पहले की 11 करोड़ रुपये की सार्वजनिक पूंजी के अतिरिक्त है। अन्नामलाई का कहना है कि आजकल यह संग्रहालय पूंजी की जरूरतों को अपनी कुल जमा पूंजी के ब्याज की कमाई से पूरा करता है।
गांधी से जुड़ी कई चीजों और निशानी के अलावा यहां के सभागार में गांधी पर बनी फिल्में भी दिखाई जाती हैं। इस संग्रहालय में एक बड़ा पुस्तकालय भी है जो सभी लोगों के लिए खुला है। अन्नामलाई कहते हैं, 'हम किताबें किसी को ले नहीं जाने देते क्योंकि खो जाने पर इन्हें वापस पाना मुश्किल है।' इन अभिलेखों का डिजिटलीकरण करने से इसकी पहुंच का दायरा लोगों तक बढ़ेगा। संग्रहालय के बाहर लाल पत्थरों वाले रास्ते और गार्डन के बीच लगी गांधी की बड़ी प्रतिमा के सामने कई परिवार तस्वीरें खिंचाने के लिए खड़े हैं।
मैं एक सुरक्षाकर्मी से गांधी स्मारक निधि की ओर जाने का रास्ता पूछती हूं और वह मुझे एक छोटे से गेट से लगे रास्ते से जाने के लिए कहते हैं। गेट के पीछे जाते ही मुझे ऐसा अहसास होता है जैसे मैं बिल्कुल अलग दौर में चली गई हूं। यहां की इमारतों से पेंट उखड़ चुके हैं और हर जगह बिखरी हुई पत्तियां नजर आती हैं। गार्डन में फूल लगे हुए हैं जिनमें से ज्यादातर झड़ रहे हैं और घास को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी उपेक्षा ही की जाती है। गांधी स्मारक निधि के सचिव रामचंद्र राही मुझे अपने दफ्तर में मिलने के लिए कहते हैं।
फंड की कमी और लोगों की कम होती दिलचस्पी के बावजूद राही को कोई असंतुष्टि नहीं जताते हैं। वह कहते हैं, 'गांधी ने हमें यह सिखाया है कि अपने सीमित साधनों के बीच ही हमें कैसे रहना है और हम उसका ही अनुसरण करने की कोशिश करते हैं। हमारे ट्रस्टी को अपने निजी खर्चों में कटौती करनी पड़ती है ताकि इन संस्थानों को बनाए रखा जाए।'
गांधी स्मारक निधि का विकेंद्रीकरण 1969 में किया गया था जिसके तहत हरेक राज्य इकाई को स्वतंत्र रूप से काम करने की इजाजत दी गई थी। यह देश के लिए गांधी की दूरदर्शिता के अनुरूप है कि छोटी सहकारी संस्थाओं को स्वतंत्र शक्तियां दी जाएं। गांधी की विरासत में कोई भी अति महत्त्वपूर्ण संस्थान नहीं है जो सभी संगठनों को एक साथ जोड़ता हो। अन्नामलाई इस विडंबना की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, 'सभी संगठनों को स्वतंत्र बनाए जाने की वजह से गांधी स्मारक निधि में अब बिल्कुल भी फंड नहीं बचा है कि इसकी अपनी संपत्ति का जीर्णोद्धार भी किया जाए।'
इस परिसर में विभिन्न गांधीवादी संस्थानों के लिए काम करने वालों के लिए आवास है जिसमें किसी आयोजन में शिरकत करने वाले आगंतुकों और शोधार्थी के लिए एक गेस्टहाउस भी शामिल है। यहां के घरों और गेस्टहाउस को देखकर ऐसा लगता है कि कम से कम 20 सालों में ताजा रंग-रोगन के अलावा इनके रखरखाव के लिए कुछ नहीं किया गया है। इस परिसर के आखिरी सिरे पर गांधी बुक हाउस है जहां सिर्फ एक कर्मचारी हैं। नैचुरोपैथी के एक अलग हिस्से के अलावा स्टील के कैबिनेट में गांधी पर और उनकी खुद लिखी हुई किताबें हैं। किताब की इस दुकान को शैक्षणिक संस्थानों से बड़ी तादाद में ऑर्डर मिलता है और यहां 5-6 लाख रुपये तक की किताबें हर साल बेची जाती हैं।
इस परिसर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर गांधी शांति प्रतिष्ठान है जो एक अलग ही दौर को दर्शाता है। इस परिसर में चलने पर 1970 के दशक की हृषीकेश मुखर्जी की फिल्म याद आ जाती है। यहां 21वीं सदी में आने का संकेत बाहर खड़ी कारों और भीतर रखे कंप्यूटर से ही पता चलता है। यहां के पुराने कर्मचारी भी इस इमारत के दौर के ही लगते हैं।
गांधी पीस फाउंडेशन की स्थापना 1964 में की गई थी ताकि गांधी की शिक्षा और उसके नित्य प्रयोग और उनकी प्रासंगिकता पर शोध और अध्ययन किया जा सके। फाउंडेशन के अध्यक्ष कुमार प्रशांत का कहना है कि वास्तविक चुनौती प्रासंगिक बने रहना और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनना है। उनका कहना है, 'पीढ़ी में बदलाव होने के साथ ही गांधी के प्रति रुचि कम हो रही है। उस लिहाज से हम असफल नजर आते हैं।' 
गांधी संस्थानों से जुड़े सभी लोगों की अच्छी बात यह है कि अपनी खामियों के प्रति उनका रवैया निष्पक्ष और स्पष्ट होता है। प्रशांत कहते हैं, 'हमारे पास लाठी के साथ गांधी वाली प्रतिमा और तस्वीरें हैं। लेकिन हमने गांधी को कभी युवा नहीं दिखाया जिन्होंने एक वकील के तौर पर दुनिया को चुनौती देने का दमखम दिखाया था।'
इस संगठन में राही और दूसरे लोगों की तरह ही प्रशांत भी एक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से ताल्लुक रखते हैं जिसकी वजह से उनमें गांधी से जुड़े कार्य करने में वैचारिक प्रतिबद्धता बनी। गांधीवादियों ने गांधी का कार्य करने के लिए भौतिक फायदे को त्याग कर अपने जीवन को समर्पित किया गया है। फाउंडेशन के एक वरिष्ठ कर्मचारी जो करीब 40 सालों से यहां काम कर रहे हैं उन्हें मासिक वेतन के रूप में 15,000 रुपये मिलते हैं। यहां के ज्यादातर सदस्य इस संगठन से पूरी सक्रियता के साथ 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के राजनीतिक आंदोलन के दौरान या बाद में जुड़े थे और इनमें क्रांतिकारी राजनीति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। प्रशांत कहते हैं, 'हाल में किसी ने इस बात की ओर इशारा किया था कि गांधी शांति प्रतिष्ठान के व्याख्यान में हमारे ज्यादातर वक्ता 60 से अधिक उम्र के होते हैं। इसमें बदलाव आना चाहिए। हमें युवाओं को आगे बढ़ाना चाहिए और गांधी को उनकी वास्तविकता की प्रासंगिकता के आधार पर ही रूबरू कराना चाहिए।'
मेरी बातचीत पत्रिका गांधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र से भी हुई जो अक्सर संगठन से इतर व्यापक गांधीवादी विचारधारा की बात करते हैं। जब हम उनके दफ्तर की ओर बढ़ते हैं तो मिश्रा गलियारे की ट्यूबलाइट बंद करते हैं। दफ्तर के भीतर गांधीवादी सादगी दिखती है। गांधी के टिकट और पोस्टर दराजों और किताबों की शेल्फ पर लगे हुए हैं। वह कहते हैं, 'हमारे पास हमारे काम का कोई कॉपीराइट नहीं है और हम फंड के लिए नहीं कहते हैं। अपने शोध को बढ़ावा दिए जाने के बगैर ही ये काम मोरक्को जैसी जगहों तक पहुंच चुके हैं। गांधीवादी सिद्धांतों की यह सच्ची ताकत है।'
गांधी की परपोती तारा गांधी भट्टïाचार्य कहती हैं कि सच्ची ताकत इस बात से नहीं मिलती कि कोई कितने घंटे चरखे पर सूत कातता है या खादी पहनता है। वह कहती हैं, 'गांधीवादी बनने के लिए जरूरी नहीं है कि शाकाहारी हुआ जाए या एक दिन में कुछ घंटे प्रार्थना की जाए। गांधीवादी होने का मतलब दयावान, अहिंसक होना और दिमागी रूप से स्वतंत्र होना है।' उनका कहना है, 'इसी तरह भारत में कई संस्थान हो सकते हैं जो अपने काम में सैद्धांतिक रूप से गांधीवादी हो सकते हैं लेकिन उन्होंने गांधी के नाम का इस्तेमाल नहीं किया है। गांधी कभी नहीं चाहते थे कि उनके नाम से कुछ भी शुरू हो। हां उन्होंने अपने जीवनकाल में अपनी पत्नी की स्मृति में कस्तूरबा गांधी ट्रस्ट बनाया था।'
खादी साड़ी और शॉल में नजर आ रही भट्टïाचार्य कहती हैं कि कई सालों से लोगों ने मितव्ययिता, आत्मसंयम और कठोर नियम को फटेहाल अवस्था से जोड़ दिया है। वह कहती हैं, 'हम मितव्ययी होना चाहते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि हम गांधी संस्थानों को गंदा और उपेक्षित होने देंगे। यह गांधी की रुचि के खिलाफ है।' भट्टïाचार्य गांधी परिवार के उन कुछ सदस्यों में से एक हैं जिन्होंने इन संगठनों में एक ट्रस्टी के तौर पर बड़ी सक्रियता से हिस्सा लिया था। वह गांधी की विरासत को सहेजने के लिए कट्टïरपंथी, हठधर्मी और दुराग्रही होने की भावना के प्रति चेतावनी देती हैं। वह कहती हैं, 'अगर बिजली है तो एक लालटेन लेकर चलना कोई बुद्धिमता नहीं होगी। हमें गांधी और उनकी प्रासंगिकता से जुड़े अपने नजरिये में बदलाव लाने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि हमें एक ऐसा तरीका ढूंढने की जरूरत है ताकि गांधी की विचारधारा और आधुनिक समाज की जरूरतों के अनुरूप शख्सियत का मेल हो जाए।'

Keyword: Delhi, Mahatma Gandhi, institution,
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