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शरणार्थी समस्या का निकले संतुलित हल
दीपक लाल /  February 01, 2016

यूरोप में शरणार्थियों की समस्या पर अगर संतुलित रुख नहीं अपनाया गया तो यह यूरोप के लिए अत्यंत घातक साबित हो सकता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं दीपक लाल
तकरीबन छह माह पहले अपने दो आलेखों में मैंने बताया था कि कैसे यूरो के डिजाइन की गड़बड़ी और पूर्व सोवियत संघ के देशों के पूर्वी यूरोप में शामिल होने से बढ़े तनाव के बीच संयुक्त राज्य यूरोप की परिकल्पना जोखिम में पड़ रही है। जर्मन चांसलर एंगला मर्केल द्वारा युद्धग्रस्त सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और उत्तरी अफ्रीका से आने वाले शरणार्थियों के लिए यूरोप की सीमाएं खोले जाने से समस्या और बढ़ गई है।
मर्केल का कदम मोटे तौर पर मानवीय आधार पर था जो तुर्की के किनारे पर एक सीरियाई बच्चे के डूबने की तस्वीरें सामने आने के बाद उठाया गया था। लेकिन उनके इस कदम के पीछे कुछ आर्थिक पहलू भी थे। जर्मनी की उम्रदराज होती और गिरती आबादी के बीच उसके समक्ष आर्थिक वृद्धि दर बरकरार रखने की चुनौती पैदा हो गई है। अगर प्रवासियों को देश में आने की इजाजत दी जाती है तो इससे बढ़ते पेंशनरों की देखरेख के लिए संसाधन जुटेंगे और जर्मनी की वृद्धि बहाल करने में भी मदद मिलेगी। लेकिन चूंकि आने वालों के आंकड़े और उनकी गुणवत्ता पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं था इसलिए वे बहुत जल्दी जर्मन नियंत्रण से परे हो गए। हैरिस टोडारो के ग्रामीण-शहरी आव्रजन मॉडलों का प्रखर अध्ययन करने वाले छात्र इन हालात की भविष्यवाणी कर सकते थे। इन मॉडलों में ग्रामीण शहरी आव्रजन के लिए ग्रामीण वेतनमान की कमी और शहरी वेतनभत्तों के बेहतर होने की संभावना को वजह बताया जाता है। यह संभावना शहरी बेरोजगारी दर पर निर्भर करती है। सन 1960 के दशक में केन्या की सरकार ने पाया था कि अगर शहरी बेरोजगारी से निपटने के लिए शहरी क्षेत्र की सरकारी कंपनियों में उच्च वेतनमान वाले पदों की बढ़ोतरी की जाती है तो अंतत: शहरी बेरोजगारी में ही इजाफा होता है क्योंकि शहरों में बेहतर वेतनभत्ते की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिक शहरों का रुख करने लगते हैं। यह तब तक होता है जब तक कि शहरी क्षेत्र की बढ़ती बेरोजगारी के कारण वेतन भत्ते दोबारा शुरुआती स्तर पर नहीं पहुंच जाते।
जब मर्केल ने जर्मनी के दरवाजे पश्चिमी एशिया के शरणार्थियों के लिए खोले तो शरण चाहने वालों की बाढ़ आ गई। सन 1951 का जिनेवा समझौता कहता है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य देश में केवल तभी शरणार्थी का दर्जा पा सकता है जबकि वह उस देश में दाखिल हो गया हो और उसने शरणार्थी बनने का आवेदन किया हो। ऐसे में जर्मनी में नया जीवन तलाश रहे लोग ऐसा केवल तभी कर सकते हैं जब वे पूरा यूरोपीय महाद्वीप पार करते हुए जर्मनी तक पहुंचें। इस दौरान समुद्र पार करने के दौरान उनको बड़े जोखिम से भी पार पाना होता है। लेकिन पिछले वर्ष जो 10 लाख लोग जर्मनी पहुंचे उन्हें देखकर लगता है कि लोग ऐसे जोखिम को पार करते हुए वहां पहुंचने के इच्छुक हैं। माना जा रहा था कि खराब मौसम के कारण तुर्की से समुद्र के रास्ते आने वाले लोगों की संख्या में कमी आएगी। लेकिन ऐसा होने के कोई संकेत नहीं नजर आ रहे हैं।
इस बीच जर्मनी के रास्ते में पडऩे वाले वे देश, जहां ये शरणार्थी उतरते हैं, उन्हें इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जर्मनी में प्रवेश की प्रतीक्षा करते देखकर उलझन होती है। इस समस्या के चलते कई देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं। नतीजतन ग्रीस स्वाभाविक रूप से एक बहुत बड़े शरणार्थी शिविर में तब्दील होता जा रहा है। उसके लिए इसका आर्थिक बोझ वहन करना मुश्किल होता जा रहा है।
बुरी बात यह है कि पश्चिम एशिया से जो अपनी यात्रा शुरू कर रहे हैं उन पर कोई लगाम नहीं है। इनमें अधिकांश 35 से कम उम्र के युवा है। नए साल की पूर्व संध्या पर जर्मनी के कोलोन, डजलडॉर्फ, फ्रैंकफर्ट और हैंबर्ग, ऑस्ट्रिया के साल्जबर्ग, फिनलैंड के हेलसिंकी, स्वीडन के कालमार और माल्मो तथा स्विटजरलैंड के ज्यूरिख मेंं तहर्रुश गामा नामक सामूहिक यौन हमले (इसकी शुरुआत मिस्र में 2005 में हुई थी) किए गए। विकीपीडिया के मुताबिक यह ऐसा खेल है जिसमें सार्वजनिक जगहों पर पुरुष गोलबंदी कर महिलाओं पर यौन हमला करते हैं। जबकि पुरुषों का ही एक बाहरी घेरा बचाने आए लोगों को रोकने का काम करता है। भ्रम पैदा करने के लिए कई बार हमलावर भी बचाने वालों की तरह हरकतें करते हैं। इस दौरान महिलाओं के साथ मारपीट, बलात्कार, लूट समेत तमाम शारीरिक हमले किए जाते हैं। मिस्र की महिलाओं ने इसे 'नरक का घेरा' कहकर पुकारा है।
इसकी वजह से शेनजेन समझौता कमोबेश समाप्त हो गया। इस समझौते ने पूरे यूरोपीय संघ में नि:शुल्क और अबाध आवागमन सुनिश्चित कराया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अधिकांश पूर्वी यूरोपीय देशों ने अपनी सीमाएं प्रवासियों के लिए बंद कर दी हैं। डेनमार्क, स्वीडन, ऑस्ट्रिया और बाल्कन देशों तथा जर्मनी में सीमा पर नियंत्रण कायम किया गया है। इनमें से अनेक देश जो असीमित शरणार्थियों का स्वागत कर रहे थे, उन्होंने अब इनके आगमन की सीमा तय कर दी है। इसे कैसे रोका जाए? जर्मनी के वित्त मंत्री वोल्फगैंग स्काबल ने दावोस में कहा कि यूरोपीय संघ को यूरोप की इस नई समस्या को लेकर मार्शल योजना तैयार करनी चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर भले ही यह सही लगे लेकिन युद्धग्रस्त पश्चिम एशिया में ऐसा करना हकीकत से परे होगा। ध्यान रहे कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति ने हाल ही में इस क्षेत्र से अपने हाथ पूरी तरह खींच लिए हैं। ऐसे में जाहिर है प्रवासियों का आगमन जारी रहेगा। जरूरत इस बात की है कि केवल ऐसे लोगों को ही प्रवेश की इजाजत दी जाए जो यूरोप की घरेलू व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाएं।
गत वर्ष लंदन में आयोजित एक बैठक में जब पूछा गया था कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए तो ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड ने कहा था कि यूरोप को वही नीति अपनानी चाहिए जो ऑस्टे्रलिया ने दक्षिण पूर्वी एशियाई प्रवासियों से निपटने के लिए अपनाई है। यूरोप की तरह वहां भी कई प्रवासी छेद वाली बोटों में पनाह लेकर पहुंचे थे और पहली प्राथमिकता उनकी जान बचाने की थी। उन्हें बचाकर ऑस्ट्रेलियाई युद्धपोत नाउरु द्वीप ले गए। वहां उनके शरण चाहने के दावों का परीक्षण किया गया। अगर दावा मंजूर नहीं हुआ तो उन्हें उनके देश भेज दिया गया।
यूरोप को भी कुछ ऐसा ही करने की जरूरत है। यूरोपीय नौसेनाओं को तैनात करना चाहिए ताकि वे प्रवासियों की बोट को रास्ते में रोकें और उनको सेंट हेलेना द्वीप ले जाएं। वहां नेपोलियन को बंद करने के लिए बनाई गई व्यवस्था को नए सिरे से तैयार किया जा सकता है। परंतु शेनजेन समझौता प्रभावी है और ऐसा लगता है कि यूरोप नामक एक और भ्रम टूटने के कगार पर है। शायद अगली बारी रोजगार और कल्याण से जुड़े लाभों की है। दुख की बात है कि यूरोप नामक एक काल्पनिक साम्राज्य ढहने के कगार पर है।

Keyword: refugee, europe, syria,
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