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सदाबहार हरफनमौला
धु्रव मुंजाल और रंजीता गणेशन /  January 29, 2016

हर वक्त बदलती क्रिकेट की दुनिया में परिवर्तन लाजिमी दिखता है लेकिन रवि शास्त्री एक ऐसी शख्सियत हैं जिनमें कोई बदलाव देखने को नहीं मिला है

पिछली गर्मियों में क्रिकेट विश्व कप से ठीक पहले एडिलेड में चल रहे एक ऐसे टेस्ट मैच में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के सामने घुटने टेक दिए जिसे वह लगभग जीतने ही वाला था। पांचवें दिन जीत के लिए 364 रनों की जरूरत थी, लक्ष्य का पीछा करते हुए विराट कोहली ने उसी अंदाज में बल्लेबाजी की जिसे देखने के हम आदी हो चुके हैं। जोरदार स्क्वेयर कट, मिड-विकेट के ऊपर से फ्लिक और कवर शॉट से होते हुए गेंद को आगे पहुंचाने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे।
अचानक कोहली अपना विकेट गंवा बैठे और उनके साथ ही टीम की उम्मीद भी खत्म हो गई। इससे निराश होकर अगले एक घंटे में दर्शकों ने भी मैदान खाली करना शुरू कर दिया और भारतीय टीम एक ऐसा मैच गंवा बैठी जिसे वह बहुत ही अच्छी तरह बचा सकती थी। मैच के बाद भारतीय टीम के निदेशक रवि शास्त्री पर कई खतरनाक सवालों की बौछार कर दी गई। शास्त्री ने पूरे दम से अपनी टीम के साहसी दृष्टिïकोण की तारीफ की। उन्होंने कहा, 'स्कोर मायने नहीं रखता है। हम जीतने के लिए खेले, मैच को ड्रॉ कराना कोई विकल्प नहीं है।'
परिश्रमी, निर्भीक और तेज तर्रार होने की खासियतें ही वे वजहें हैं जिनके कारण पिछले दो दशकों में उनके प्रशंसकों और आलोचकों की सूची में लगातार इजाफा होता जा रहा है। हार में भी वह हमेशा सकारात्मकता के साथ आगे बढऩे में भरोसा करते हैं जो एक योद्घा की पहचान होती है।  मैच फिक्सिंग घोटालों और राजनीतिक षडयंत्रों से भरपूर भारतीय क्रिकेट के इतिहास में शास्त्री एक बहुआयामी व्यक्तित्व के तौर पर उभरे जो जरूरत के वक्त कोई भी भूमिका निभा सकते हैं। एक कमेंटेटर, एक प्रशासक और एक कोच के तौर पर उन्होंने अलग-अलग समय पर अपनी भूमिकाएं निभाई हैं।
कई कोच प्रवासी पक्षियों की तरह आए और गए, अक्सर वे खिलाडिय़ों के जाल में फंसकर रह गए लेकिन शास्त्री पूरे परिदृश्य में हमेशा छाए रहे। इसलिए वर्ष 2005 में जब कोच के तौर पर जॉन राइट का कार्यकाल खत्म होने को था तो शास्त्री उस समिति का हिस्सा थे जिसने ग्रेग चैपल को कोच नियुक्त किया। वर्ष 2007 विश्व कप की दौड़ से भारत के आश्चर्यजनक रूप से बाहर हो जाने पर जब चैपल के कार्यकाल में कटौती की गई तो शास्त्री को कुछ महीने बाद होने वाले बांग्लादेश दौरे के लिए टीम का कोच बना दिया गया।
साल के आखिर में बीसीसीआई ने उन्हें बेंगलूरु में राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) का प्रमुख नियुक्त कर दिया। इस काम के लिए शास्त्री को काफी वक्त देने की जरूरत थी और वह अपने साथियों के साथ बमुश्किल ही कभी अकादमी पहुंचे होंगे। एनसीए के एक पूर्व अधिकारी ने बताया, 'यह एक बहुत बड़ी दुर्घटना थी। उनके पास बैठकों में शामिल होने के लिए वक्त नहीं होता था क्योंकि वह अपनी अन्य प्रतिबद्घताओं की वजह से अत्यधिक व्यस्त रहते थे।' वर्ष 2010 में अनिल कुंबले को उनकी जगह एनसीए का प्रमुख बनाया गया।
लेकिन इससे भी शास्त्री के लिए संभावनाएं खत्म नहीं हो गईं। अगस्त, 2014 में शास्त्री को टीम का निदेशक नियुक्त किया गया। इस बार इंगलैंड के खिलाफ विदेशी धरती के दौरे में भारतीय टीम को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी। 53 साल के शास्त्री अब भी इस पद पर कायम हैं। क्या इसका मतलब यह है कि शास्त्री को अलग कर पाना संभव नहीं है? मुुंबई के पूर्व कप्तान मिलिंद रेगे उस दिन को याद करते हैं जब उनकी नजर 14 साल के शास्त्री पर पड़ी। वह कहते हैं, 'उनकी वह पहली खूबी जिसने मुझे प्रभावित किया वह थी उनकी नेतृत्व क्षमता। वह हमेशा ही आत्मविश्वास बढ़ाते थे, इसके अलावा क्रिकेट में भी उनका दिमाग बहुत तेजी से चलता था।'
यही वजह है जिससे उनके भीतर जरूरी लोगों का पसंदीदा बने रहने की क्षमता आती है। मुंबई में पोद्दार कॉलेज के शिक्षक उन्हें एक ऐसे बच्चे के तौर पर याद रखते हैं जिसका आचरण हमेशा ही अच्छा रहता था। कॉलेज की पूर्व उप-प्रधानाचार्य कुमुद मिश्रा कहती हैं, 'मुझे उनके बारे में कभी कोई शिकायत नहीं मिली।'
दिलीप वेंगसरकर के मुकाबले उनका व्यवहार एकदम अलग था। वेंगसरकर एक अंतरराष्टï्रीय दौरे से लौटने के बाद एक टी-शर्ट पहनकर कॉलेज जिमखाना पहुंचे जिस पर बिकनी पहनी हुई महिलाओं की तस्वीरें बनी हुई थीं।
जवानी के दिनों में भी शास्त्री वहीं पाए जाते थे जहां कुछ रोचक हो रहा हो। स्कूल और कॉलेज के दौरान शास्त्री के खिलाफ खेलने वाले और मुंबई के कप्तान बने शिशिर हटंगड़ी याद करते हैं कि वह हमेशा खेल में बने रहना चाहते थे चाहे वह बल्लेबाजी की बात हो, गेंदबाजी की या फिर मैदान में क्षेत्ररक्षण करने की। उन्होंने कहा, 'वह बेहतरीन चिंतक थे, जो फटाफट यह समझ जाते थे कि उनके लिए कौन सी चीज काम की है।'
रेगे का कहना है कि शास्त्री जो करते हैं उसमें इसी विचार के साथ आगे बढ़ते हैं। रेगे का कहना है, 'वह बहुत ही बुद्घिमान हैं और दूसरों से हमेशा एक कदम आगे रहते हैं।'
हालांकि शास्त्री को अपना क्रिकेट करियर अधूरा ही छोडऩा पड़ा। वह एक क्षमतावान हरफनमौला खिलाड़ी थे जिन्होंने भारत की ओर से 80 टेस्ट मैचों और 150 एकदिवसीय मैच खेले। शास्त्री अक्सर अपनी क्षमता से सभी को चौंका देते थे। अपनी प्रतिभा का एक नजारा उन्होंने ऑस्टे्रलिया में 1985 वल्र्ड चैंपियनशिप ऑफ क्रिकेट में मैन ऑफ द सीरीज का खिताब हासिल कर पेश किया था और इसके लिए उन्हें एक ऑडी कार भी मिली थी। इसके अलावा उन्होंने वर्ष 1992 में सिडनी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक दोहरा शतक लगाकर अपना सिक्का जमाया था।
लेकिन वर्ष 1992 में घुटने में लगी एक चोट की वजह से उनका अंतरराष्टï्रीय करियर अचानक ही खत्म हो गया। उस वक्त उनकी उम्र महज 31 साल थी। 1983 की विश्वविजेता टीम में उनके साथी सैयद किरमानी ने कहा, 'वह सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी नहीं थे। लेकिन वह कभी हार मानने वाले नहीं थे और वह आखिरी गेंद तक लडऩे की चाहत रखते थे।' शास्त्री ने सिर्फ एक टेस्ट मैच में कप्तानी की। कई लोगों का मानना है कि वह भारतीय टीम के सबसे बेहतरीन कप्तान साबित हो सकते थे।
उनके साथ खेल चुके अन्य लोगों के मुताबिक शास्त्री एक दिमागी खिलाड़ी थे जो रणनीति के साथ आधुनिक कुशलताओं से परिपूर्ण थे। वह मैदान के बाहर और भीतर दोनों ही जगह मौजूद होते थे।
पहले दर्जे के क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद शास्त्री ने टाटा स्टील में अपनी नौकरी छोड़ दी, हालांकि कंपनी ने उन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए काफी कोशिश की। इसके बाद उनकी अगली पारी की शुरुआत हुई: वर्ष 1994 में श्रीलंका में सिंगर कप के दौरान मार्क मैसकारेनहास ने उन्हें कमेंटेटर बनने की सलाह दी।
इसके बाद किस तरह शास्त्री एक शानदार कमेंटेटर से गैर आधिकारिक रूप से बीसीसीआई के प्रवक्ता बन गए? किस तरह वह भारतीय क्रिकेट के संकटमोचक बन गए? शास्त्री फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में हैं जहां भारतीय टीम कुल तीन मैच जीत चुकी है। इसी वजह से शास्त्री से संपर्क नहीं किया जा सका।
जो लोग उन्हें अच्छी तरह जानते हैं वे कहते हैं उनका व्यक्तित्व ही ऐसा है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। राष्टï्रीय टीम में उनके साथी रहे मनिंदर सिंह उन्हें अपवादस्वरूप स्मार्ट मानते हैं। वह कहते हैं, 'वह जानते हैं कि सही समय पर सही चीज क्या होती है, यह बहुत ही आसान है।'
पिछले आठ साल में बीसीसीआई में छह प्रमुख बदल गए और शास्त्री की साख सभी के साथ बहुत ही अच्छी थी। बीसीसीआई के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'आप जितना सोच सकते हैं शास्त्री उससे भी कहीं अधिक चतुर हैं। एक वक्त पर वह एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर खुद को पेश करते हैं कि जैसे वह पूरी तरह गैर राजनीति हैं। लेकिन भीतर से उन्हें पता होता है कि कौन सी चाल कब चलनी है।' बीसीसीआई के ही एक पूर्व अधिकारी ने कहा, 'आप एक साथ शरद पवार की तारीफ भी करते हैं और अगले ही पल एन श्रीनिवासन के बारे में मुस्करा कर काम कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने के लिए आपको बहुत अच्छा होने की जरूरत है, तमाम कैंप बदल गए लेकिन उनमें लोगों का भरोसा बना हुआ है।' बीसीसीआई के अखाड़े में पवार और श्रीनिवासन अभी भी प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं। इसके बाद इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत के तुरंत बाद 2008 में शास्त्री ने ललित मोदी से अपने संबंध काफी मजबूत कर लिए। शास्त्री आईपीएल की प्रशासनिक परिषद के सदस्य भी थे। कुछ साल मोदी को बीसीसीआई ने भले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया लेकिन शास्त्री मोदी के विरोधियों के भी भरोसेमंद बने रहे। शास्त्री के संबंध उनके 20 साल पुराने मित्र जगमोहन डालमिया से भी काफी अच्छे रहे। लेकिन कुछ तो वजहें ऐसी जरूर होंगी जिनके आधार पर बीसीसीआई शास्त्री पर इस हद तक भरोसा करता है। अपनी कमेंट्री के दौरान भारत के पक्ष में उनकी सपाट टिप्पणियों ने उन्हें भारतीय क्रिकेट की गैर आधिकारिक आवाज बना दिया।
वर्ष 2001 में सचिन तेंडुलकर और सौरभ गांगुली सहित कई खिलाडिय़ों को दक्षिण अफ्रीका में एक टेस्ट मैच के दौरान गेंद से छेड़छाड़ के आरोप में या तो निलंबित कर दिया गया या फिर उन पर जुर्माना लगाया गया। लेकिन उस वक्त शास्त्री ने मैच रेफरी माइक डेनिस की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। इस तरह बीसीसीआई को एक ऐसा प्रवक्ता मिल गया जो कभी किसी से समझौता नहीं करता और टीम के बचाव में जरूरत पडऩे पर खुलकर बोल सकता है।
इंगलैंड और भारत के बीच 2011 में ट्रेंट ब्रिज में एक टेस्ट मैच के दौरान शास्त्री इंगलैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन से भिड़ गए। शास्त्री ने आरोप लगाया कि अंग्रेज भारतीय टीम के विश्व चैंपियन बनने की बात को पचा नहीं पा रहे हैं और उन्होंने निर्णय समीक्षा प्रणाली का विरोध करने के बीसीसीआई के फैसले का बचाव किया। इस तरह शास्त्री ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि वह व्यवस्था के साथ चलने के हिमायती हैं। यह बात अलग है विश्वविजेताओं को इस सीरीज में 0-4 के भारी अंतर से हार का मुंह देखना पड़ा।
स्तंभकार अयाज मेमन का मानना है कि शास्त्री की स्थिति ऐसी इसलिए है क्योंकि उन्हें चीजों की बहुत अच्छी समझ है। वह इस बात से सहमत हैं कि शास्त्री ने बीते समय में बीसीसीआई का बचाव किया है लेकिन वह खेल को अच्छी तरह समझते हैं।
एक अन्य पूर्व खिलाड़ी का कहना है कि शास्त्री के दायरे में विस्तार ही होगा। उनका कहना है, 'बीसीसीआई के मौजूदा प्रमुख शशांक मनोहर उन्हें पसंद करते हैं। खिलाड़ी उन्हें पसंद करते हैं। एक ब्रांड के तौर पर उनकी लोकप्रियता में इजाफा ही होना है।' दरअसल कोहली के तौर पर शास्त्री को एक ऐसा साथी मिल गया है जो उनकी ही तरह सबकुछ या कुछ नहीं के दर्शन पर भरोसा करता है।
सिंह बताते हैं, 'अपने खेल के दौरान वह लोगों को प्रोत्साहित किया करते थे। वह किसी से हार मानने वाले नहीं थे। लेकिन अब वह बहाने बनाने लगे हैं। आखिर में वह पिच और क्यूरेटर को दोषी ठहराते हैं जो अच्छी बात नहीं है।'
पिछले साल शास्त्री ने सार्वजनिक रूप से वानखेड़े स्टेडियम के क्यूरेटर सुधीर नायक से बहस कर ली, इसकी वजह थी कि दक्षिण अफ्रीका के एबी डिविलियर्स और फाफ डू प्लेसी ने भारतीय गेंदबाजों की बुरी तरह पिटाई की थी। नायक ने आरोप लगाया कि शास्त्री ने उन्हें बल्लेबाजों के लिए अनुकूल पिच बनाने के लिए गाली दी थी। उम्मीद के मुताबिक बीसीसीआई ने शास्त्री के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
मार्च में होने वाले टी20 विश्वकप के लिए भारतीय टीम यह उम्मीद कर सकती है कि शास्त्री वैसे ही उत्प्रेरक के तौर पर अपनी भूमिका निभाएंगे जैसे 90 के दौर में मुंबई क्रिकेट को उन्होंने संकट से उबारा। वर्ष 1993-94 में शास्त्री ने मुंबई की एक युवा टीम का नेतृत्व किया जिसमें चार नए खिलाड़ी पारस महाम्ब्रे, अमोल मजूमदार और सैराज बहुतुले थे। बहुतुले याद करते हैं कि उन्हें वेंकटेश प्रसाद का सामना करने में मुश्किल हो रही थी लेकिन उन्होंने मुझे इससे पार पाने में मदद की। वह हमेशा से ही खिलाडिय़ों के खिलाड़ी थे।
टी20 विश्वकप के बाद टीम निदेशक के तौर पर शास्त्री के अनुबंध की समीक्षा की जाएगी। बीसीसीआई के अधिकारियों का कहना है कि इस टूर्नामेंट के बाद एक पूर्णकालिक कोच की नियुक्ति की जा सकती है। इस बात में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि शास्त्री को ही यह कमान सौंप दी जाए।     (आभास शर्मा का भी योगदान)

Keyword: Ravi shastri, Cricket, Game,
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