बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन की मंदी और भारत की प्रतिक्रिया
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चीन की मंदी और भारत की प्रतिक्रिया
अजय शाह /  January 28, 2016

चीन में व्याप्त मंदी के प्रभाव से निपटने के क्रम में भारत क्या कोशिशें कर सकता है, इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह
इस बात की काफी संभावना है कि अगले कुछ सालों तक चीन की स्थिति कमजोर बनी रहे। भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं? इससे एक ऐसा वैश्विक वित्तीय संकट आने की आशंका है जो भारत समेत तमाम उभरते बाजारों को प्रभावित करेगा। चीन की समस्या वैश्विक कारोबारी कीमतों पर दबाव बनाएगी। यह बात भारत में कारोबारी उत्पादकों के मुनाफे को प्रभावित करेगी जबकि खरीदार इससे फायदा पाएंगे। चीन मॉडल को भारत में बहुत अधिक सराहना नहीं मिलने वाली, यह बात बेहतर नीति निर्माण के लिहाज से महत्त्वपूर्ण है।
चीन में खासी निराशा का भाव है। वर्ष 2014 के मध्य से ही वहां पूंजी का पलायन बड़े पैमाने पर हो रहा है। अनुमान के मुताबिक 18 महीनों में वहां से करीब 15 खरब डॉलर की पूंजी बाहर गई है। चीन का बुर्जुआ वर्ग भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित नहीं है। यही वजह है कि वे अपनी पूंजी और अपने परिजन को नुकसान से दूर कर रहे हैं। इसका संबंध विनिमय दर नीति से भी है। एक वक्त जब केंद्रीय बैंक लगातार अधिमूल्यन कर रहा था तो जिस प्रकार पूंजी चीन में जा रही थी जब अधिमूल्यन के दौर में पूंजी उसी प्रकार बाहर जा रही है। निजी उद्यमों की बात करें तो उनके लिए भी पूंजी को चीन से बाहर ले जाना ही श्रेयस्कर है। राजनेता और नौकरशाहों को नियंत्रण कायम करना पसंद है। वे अस्थिरता के प्रबंधन में राजनीतिक आग्रह का ध्यान रखेंगे लेकिन यह प्रक्रिया भी नुकसान ही देगी।
वैश्विक वित्त को लेकर मुख्य धारा का नजरिया कहता है कि फिलहाल कोई बड़ा खतरा आसन्न नहीं है। बहरहाल, प्रत्येक अंतरराष्टï्रीय वित्तीय संकट अपनी तरह से अनूठा होता है। हम फिलहाल कई नजरिये से अलग हैं। वैश्विक इतिहास में किसी भी केंद्रीय बैंक ने मुद्रा बाजार के सटोरियों से निपटने के लिए मासिक 100 अरब डॉलर की राशि खर्च नहीं की होगी। वैश्विक इतिहास में कोई ऐसी अर्थव्यवस्था इतना बड़ा स्वरूप कभी ग्रहण नहीं कर पाई जो बाजार आधारित नहीं हो। उसे लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता है कि कौन सा हिस्सा या प्रक्रिया धोखा दे जाएगी।
भारत में हमें भी समस्याओं को लेकर विचार करना शुरू कर देना चाहिए और उन कारकों पर भी विचार करना चाहिए जो हमें प्रभावित कर सकते हैं। अतीत से भी ऐसे दो उदाहरण हमारे सामने हैं। ये हमें बताते हैं कि भविष्य को लेकर हमारी विचारधारा क्या हो। मोटे तौर पर भारत ने वर्ष 2008 के वित्तीय संकट से निपटने में अच्छा प्रदर्शन किया। जबकि वर्ष 2013 के छोटे संकट से निपटने में हमसे मामूली चूक हो गई। हमें इन विरोधाभासी अनुभवों से आगे विचार करना होगा।
वर्ष 2008 में हमने बाजार को उसका काम करने दिया और रुपये में भारी अवमूल्यन हुआ। वर्ष 2013 में हमने रुपये के अवमूल्यन का मुकाबला करने की ठानी और इस दौरान ब्याज दरों में 400 आधार अंक का इजाफा किया गया और कई सुधारों को पलट गया।
बाजार आधारित विनिमय दर का त्याग करने के कई नुकसान देखने को मिले: कंपनियों का दावा है कि सरकार ही उनके जोखिम का प्रबंधन करेगी। विनिमय दर प्रबंधन की लागत का भार अर्थव्यवस्था उठा रही है। जबकि उसके लाभ कंपनियों के जोखिम को कम करने तक सीमित हैं। फिलहाल जो हालात हैं उनमेंं आगे चलकर राजनीतिक दबाव और बढ़ेगा। मुद्रा में भारी गिरावट की स्थिति में कंपनियां पुन: सरकार से चाहेंगी कि वह इस पर कोई प्रतिक्रिया प्रकट करे। इस अरुचिकर परिदृश्य से बचने के लिए वर्ष 2013 के बाद विनिमय दर व्यवस्था से दूरी बनाने का क्रम समय रहते शुरू कर देना चाहिए।
भारत को प्रभावित करने वाला दूसरा कारक है कारोबार के लायक वस्तुओं की कीमत। चीन में अंकेक्षण और मुनाफे के विचार को कई कंपनियां ठीक से समझ नहीं पाई हैं। कई घाटे में चल रही कंपनियों को चालू रखा गया है। इनको सरकारी ऋण मिलता है। उत्पादन घटाने, कामगारों की छंटनी करने और फैक्टरियों को बंद करने के कदमों को अक्सर राजनीतिक बना दिया जाता है और यथास्थिति बरकरार रखने के लिए राजनीतिक दबाव बनाया जाता है। ये तमाम बातें मिलकर ऐसी फर्म को जन्म देती हैं जो लागत से कम दाम पर उत्पादन और बिक्री करती हैं।
चूंकि चीन का आकार इतना बड़ा है इसलिए उनकी कंपनियों के मूल्य निर्धारण का फैसला पूरी दुनिया पर नकारात्मक असर डालता है। चीन का संकट उन बाजारों में मूल्य और मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है जहां चीन की कंपनियों का दबदबा हो। भारत के लिए इसके दो निहितार्थ हैं। हमें संरक्षणवादी उपायों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। इससे कारोबारी खुलेपन की ओर हमारे 25 सालों के सफर को झटका पहुंचेगा। घटता हुआ मुनाफा देश के निजी क्षेत्र में भुगतान संतुलन के संकट को बढ़ावा देगा।
इसके साथ ही, विभिन्न फर्म और उद्योग धंधे जो ये सस्ती कारोबारयोग्य वस्तुएं खरीदते हैं उनको लाभ होगा। दीर्घकालिक नजरिया रखने वाले लोगों के लिए यह एक अच्छा अवसर है, ऐसी वस्तुओं का भंडारण करने का। उदाहरण के लिए अगर कोई फर्म चीनी मशीनी उपकरणों की असेंबली लाइन तैयार करना चाहती है तो उसके लिए अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने का यह सही समय है। इसलिए कि वर्ष 2016-2017 में इन मशीनों की कीमत खासी कम रहेगी।  वित्तीय बाजारों के नजरिये से देखा जाए तो यह वक्त है निफ्टी और रुपये को लेकर बड़ी नकारात्मक गतिविधियों से संरक्षण हासिल करने का। अगर भारत विनिमय दर व्यवस्था में सुधार करने में सफल नहीं हुआ वृहद कारोबार के अवसर उत्पन्न होंगे।प्रभाव की आखिरी लहर विचारों की दुनिया से ताल्लुक रखती है। कई सालों तक चीन की सफलता ने भारत के नीतिगत क्षेत्र को आंदोलित रखा। ऐसा लगा कि चीन उदार लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था के विकल्प के रूप में उभर रहा है। इसने राजनेताओं और नौकरशाहों द्वारा अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण, सरकार के नियंत्रण वाले निवेश, विनिमय दर नीति, वित्तीय व्यवस्था का निरोध, किसानों का जबरिया पुनर्वास, आदि की राह दिखाई। भारत के बारे में कहा जाने लगा कि वह चीन का अनुकरण करे।
यह भारत के मुख्य पथ से एक भटकाव था। भारत का मुख्य पथ है एक उदार लोकतंत्र का निर्माण, जिसमें कानून का शासन हो और जहां सुव्यवस्थित बाजार अर्थव्यवस्था हो। अब यह नकारात्मक प्रभाव उतना प्रभावी नहीं होगा और हम भारत को अधिक परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था बना सकेंगे। इसमें राज्य के काम को सीमित करते हुए बाजार की विफलताओं को संबोधित किया जाएगा। उनसे निपटने के लिए सरकारी क्षमताएं विकसित की जाएंगी।

Keyword: China, slowdown, India,
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