बिजनेस स?टैंडर?ड - जटिल कथानक का अहसास देगी 'वजीर'
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जटिल कथानक का अहसास देगी 'वजीर'
मानवी कपूर /  January 08, 2016

सप्ताह के किसी दिन सुबह 9.30 बजे सोनू निगम और श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज के साथ आपकी दिन की शुरुआत हो तो फिर क्या कहने। फरहान अख्तर और अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म 'वजीर' की शुरुआत दानिश अली (फरहान अख्तर) और उनकी पत्नी रुहाना अली (अदिति राव हैदरी) पर फिल्माए गए एक रोमांटिक गाने, 'तेरे बिन' से होती है। इस गाने की धुन सुकून देने वाली है और इस गाने में जो सीन दिखाए गए हैं वह बिल्कुल किसी विज्ञापन शूट के पर्दे के पीछे शूट किए गए वीडियो की तरह दिखता है। अदिति राव की मुस्कराहट और अख्तर के चेहरे की अस्वाभाविक भाव-भंगिमा थोड़ी अजीब लगती है क्योंकि दोनों ही कैमरे को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग दिखते हैं ऐसे में अभिनय की स्वाभाविकता खत्म हो जाती है। 

 
दानिश आतंकवादी निरोधक दस्ते (एटीएस) के पुलिस अधिकारी हैं और उनकी शादी रुहाना से हुई है जो एक कथक नृत्यांगना हैं। उनके जीवन में तब तक सबकुछ ठीक होता है जब तक कि उनकी बेटी की मौत आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ में नहीं हो जाती। रुहाना बेटी की मौत के लिए दानिश को जिम्मेदार ठहराती है और फिर दानिश अकेले ही आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों के खिलाफ एक ऐसे अभियान का बीड़ा उठाते हैं जो वास्तविक नहीं है।
 
इस कहानी में एक नए पात्र व्हीलचेयर पर बैठने वाले पंडित ओंकारनाथ धर (अमिताभ बच्चन) नजर आते हैं जो शतरंज के चैंपियन रह चुके हैं और बच्चों को यह खेल सिखाते हैं। फिल्म के पोस्टर और टीजर देखकर ऐसा लगता है कि दोनों किरदारों के बीच में कोई तनाव होगा लेकिन पर्दे पर बच्चन का किरदार एक ऐसे शख्स के रूप में दिखता है जो लोगों से हिल-मिल जाता है। धर दानिश की बेटी को चेस खेलना सिखाते थे और यहीं से  अप्रत्याशित कडिय़ां शुरू होती हैं। पंडित जी का अपना ही एजेंडा है। उन्हें यह संदेह है कि उनकी बेटी को एक मंत्री एजाज कुरैशी ने मारा है। दानिश धर की शतरंज की चालों को आगे बढ़ाते हैं और उन्हें यह अंदाजा हो जाता है कि दोनों बेटियों की मौत में कोई संबंध हो सकता है।
 
कुरैशी के किरदार में मानव कौल ने खलनायक की भूमिका अच्छी तरह निभाई है। विधु विनोद चोपड़ा ने इस फिल्म में कश्मीर के मसले को ऊपरी जानकारी के तौर पर पेश किया है, हालांकि उनसे यह उम्मीद की जा सकती थी कि वह इसमें थोड़ी और गहराई में जाते। कश्मीरी पंडित धर के मुस्लिम दोस्त हैं। घाटी में शांति का चेहरा बना कुरैशी वास्तव में एक खलनायक है। शतरंज के उस्ताद धर काफी तेज तर्रार हैं। इस फिल्म में शतरंज और उसकी बिसातों का इस्तेमाल आलंकारिक तौर पर किया गया है और ये सभी चीजें फिल्म के आखिर के डांस ड्रामा में एक साथ आती हैं। फिल्म के बिखरे और भ्रामक कथानक तथा कमजोर अभिनय के बीच शतरंज के ऊंट, हाथी और प्यादे सभी एक कारक में तब्दील होते नजर आते हैं।
 
इस फिल्म में अभिनेता नील नितिन मुकेश भी मेहमान भूमिका में नजर आते हैं लेकिन उनका रोल इतना छोटा है कि उस लोगों का ध्यान कम ही जाएगा। अगर उनकी भूमिका एक मिनट से थोड़ी और ज्यादा होती तो उनका अस्वाभाविक अभिनय कुछ ज्यादा ही स्पष्ट हो जाता। यही बात जॉन अब्राहम पर भी लागू होती है जो आश्चर्यजनक रूप से मुकेश के मुकाबले अच्छे लगे हैं। अदिति राव ने एक आहत मां और मुसीबत से घिरे आदमी की पत्नी की भूमिका निभाई है लेकिन वह वास्तव में दर्शकों के मन में अपने लिए कोई वास्तविक संवेदना नहीं जगा पातीं। वह खूबसूरत दिखती हैं और फिल्म में उनकी भूमिका इसके साथ ही समाप्त हो जाती है।
 
बच्चन अभिनय की बादशाहत को बरकरार रखते हुए नजर आते हैं, हालांकि उनकी अदाकारी पहले की फिल्मों की तरह ही है जिसे 'पीकू' में थोड़ा बदलने की कोशिश हुई थी। मैं यह समझ नहीं पाती कि उनके बालों का स्टाइल पीकू की तरह ही जस का तस क्यों रखा गया है इससे उनके किरदार में कुछ नयापन नहीं आता और मेरा ध्यान भी बच्चन की अदाकारी से हटकर उनकी बालों की तरफ ज्यादा जाता है। फरहान अदिति की तरह ही पर्दे पर अच्छे दिखते हैं हालांकि उनके किरदार पर इस बात से कोई संबंध नहीं है। फरहान और अमिताभ दोनों की साझेदारी बड़े पर्दे पर अच्छी लगती है। इस फिल्म में दोनों के साथ वाले दृश्य यादगार बन पड़े हैं। हालांकि फिल्म के प्रमोशन वीडियो और ट्रेलर में जिस तरह दोनों के साथ वाले दृश्य प्रभावकारी दिखते हैं फिल्म में वे दृश्य उतने जानदार नहीं दिखते हैं। 
 
इस फिल्म का संगीत कई संगीतकारों ने दिया है मसलन अद्वैता शांतनु मोइत्रा और अंकित तिवारी। बेशक इस फिल्म का संगीत ताजगी का अहसास देता है। अमिताभ बच्चन और फरहान की आवाज में 'अतरंगी यारी' गाना सुनते हुए आपके पैर ताल से ताल मिलाने लगेंगे। यह गाना बेहद भावपूर्ण भी लगता है। फिल्म के बाकी गाने भी कहानी के साथ ही बुने गए हैं हालांकि उसमें कोई ड्रीम सीक्वेंस नहीं है। थोड़े घुमावदार और अविश्वसनीय कथानक के साथ 'वजीर' उन फिल्मों में जरूर शामिल हो गई है जिसे एक बार जरूर देखा जाना चाहिए लेकिन उससे ज्यादा की उम्मीद इस फिल्म से नहीं की जा सकती है। 
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