बिजनेस स?टैंडर?ड - बदलेगी देश की सियासत तभी रुकेगी ये आफत
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बदलेगी देश की सियासत तभी रुकेगी ये आफत
दीपक लाल /  January 05, 2016

देश में सांप्रदायिक हिंसा का अतीत काफी पुराना है और तब उससे निपटने के प्रभावी उपाय भी होते थे। अब सांप्रदायिक संघर्ष के उलझे समीकरणों को सुलझाना मुश्किल नजर आ रहा है। बता रहे हैं दीपक लाल 

 
यह 1960 के दशक के शुरुआत की बात है, जब भारतीय विदेश सेवा के प्रशिक्षु के तौर पर जिला प्रशिक्षण के लिए मेरी नियुक्ति कर्नाटक के धारवाड़ में की गई। चूंकि वह इलाका सांप्रदायिक हिंसा के लिए कुख्यात था, लिहाजा मैंने स्थानीय पुलिस अधीक्षक से अपना ज्ञानवर्धन करने के लिए पूछा कि असल सांप्रदायिक दंगों से वह कैसे निपटते हैं। उन्होंने मुझे अंग्रेजी राज की एक नियमावली दिखाई, जिसमें स्थानिक सांप्रदायिक दंगों से निपटने के इंतजामों का ब्योरा था।
 
उसमें कार्रवाई के लिए विभिन्न स्तरों को चिह्नित किया गया था। उसमें संदिग्ध पहलुओं में पहले तो उस समय को चिह्नित किया गया, जब सांप्रदायिक तनाव चरम पर होता था। इस लिहाज से दोनों समुदायों के धार्मिक उत्सवों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता। तब अगर किसी तरह के सांप्रदायिक तनाव की आशंका नहीं होती, तभी उन्हें मंजूरी दी जाती। अगर पथराव जैसी शुरुआत होती तो ऐसा करने वालों पर हल्का लाठीचार्ज किया जाता। अगर मामला और बिगड़ता तो पुलिस हवा में फायरिंग करती और अगर इनमें से कोई भी कवायद सफल नहीं होती तो क्या पुलिस को अंतिम विकल्प के तौर पर भीड़ पर गोलीबारी का विकल्प अपनाना चाहिए, जो पुलिस की नाकामी का संकेत होता। 
 
कुछ साल पहले निजामुद्दीन में अपने घर के पहले तल पर हमने इन नियमों को अमल में आते हुए देखा। वहां सरकारी जमीन पर एक मुस्लिम पीर की मजार अवैध रूप से बना दी गई। स्थानीय निकाय को उसे हटाने की अदालत से मंजूरी भी मिल गई। इससे एक स्थानीय गैर-मुस्लिम कांग्रेसी नेता को भीड़ इक_ïा करने का अवसर मिल गया कि वह उस जगह पर जाकर पुलिस कार्रवाई का विरोध करे और पुलिस ने वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की इजाजत भी दी। मगर जब अवैध ढांचा गिराने वाले अधिकारियों पर पथराव होने लगा तो पुलिस ने लाठी चार्ज शुरू कर दिया। भीड़ की अगुआई करने वाले नेता पर भी लाठी बरसी, जिन्होंने दावा किया कि उन्हें अधिकांश भीड़ की तरह दौड़-दौड़ाकर पीटा मारा जा रहा था। 
 
अपनी किताब 'द प्रोडक्शन ऑफ हिंदू-मुस्लिम वायलेंस इन कंटम्प्रेरी इंडिया, ऑक्सफर्ड, 2015' में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पॉल ब्रास ने सांप्रदायिक दंगों की गहराई से पड़ताल की है। यह किताब अलीगढ़ विश्वविद्यालय में 30 वर्षों के शोध पर आधारित है, जो अंग्रेजी राज में सांप्रदायिक हिंसा के भंवर में फंसा हुआ था। उन्होंने न केवल इसकी व्याख्या की कि क्यों कुछ इलाके सांप्रदायिक तनाव के लिहाज से संवेदनशील रहते हैं और वहां अधिकांश समय उपशमन क्यों जारी रहता है और शहरों में भी इसके अलग-अलग संकेत क्यों दिखते हैं, जहां कुछ इलाकों में कोई दंगा होता नहीं दिखता। 
 
उन्होंने दर्शाया कि सामाजिक विज्ञान साक्ष्य (आर्थिक सहित) सांप्रदायिक हिंसा की उत्पत्ति और उसके कायम रहने के जो कारण तलाशते हैं, वे क्यों भरोसे लायक नहीं। उन्होंने लिखा कि भारत या अमेरिका में या 19वीं शताब्दी के रूस में दंगों और नरसंहार का मंशागत कारकों, तात्कालिकता और नियोजन एवं संगठन सहित तमाम पहलुओं पर विश्लेषण करना बहुत मुश्किल और जटिल है। उन्हें नाटकीय उत्पत्ति के तौर पर देखना ज्यादा मुनासिब होगा, जिसमें निर्देशकों का उन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं होता क्योंकि उनके कुछ पात्रों को भुगतान किया जाता है तो तमाम लूट-खसोट करने के लिए उसमें स्वैच्छिक रूप से शामिल होते हैं और उनके कई हिस्सों का पहले रियाज किया जाता है और कुछ का का नहीं। (पृष्ठï 32) 
इन नाटकीय संस्थागत दंगा तंत्रों को ब्रास धर्मांतरण विशेषज्ञ करार देते हैं, जिन पर नस्लीय पहचान उद्यमियों का ठप्पा लगा हुआ है। वे इसलिए कायम रहते हैं क्योंकि वे व्यक्तियों, समूहों, पार्टियों और राज्य प्राधिकरणों के लिए उपयोगी होते हैं। (पृष्ठ 34) 
 
अगर माकपा को छोड़ दिया जाए, जिसने चुनावों में सांप्रदायिक विमर्श का सहारा नहीं लिया तो सांप्रदायिक दंगों के कायम रहने में राज्य की भूमिका के साक्ष्य दृष्टिïगत होते हैं। माकपा ने हिंदुओं या मुसलमानों को सांप्रदायिक आधार पर लुभाने का नजरिया नहीं अपनाया और उसके बजाय राज्य की सभी शक्तियों का उपयोग यह सुनिश्चित करने में किया कि किसी भी तरह से सांप्रदायिक दंगे नहीं होने चाहिए। इस तरह विभाजन के समय बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक उन्माद के साक्षी रहे पश्चिम बंगाल और 1964 में कांग्रेस राज के दौरान कलकत्ता में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों के उलट माकपा के राज में पिछले तीस वर्षों के दौरान कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। (पृष्ठ 374)
 
बिहार के हालिया चुनावों में सांप्रदायिक मुद्दे को भुनाने की क्षमता में काफी कमजोरी नजर आई। जैसा कि सुरजीत भल्ला (15 नवंबर, 2005 के 'द इंडियन एक्सप्रेस' में) अनुमान लगाते हैं कि बिहार की कुल आबादी में 17 फीसदी मुसलमानों में से 20 फीसदी ने लोकसभा चुनावों में भाजपा को वोट दिया था, उनमें से केवल 3 फीसदी ने ही विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट दिया। अगर मुसलमान उसी तादाद में भाजपा को वोट देते तो महागठबंधन और भाजपा की अगुआई वाले राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच वोटों का अंतर 7.8 फीसदी के बजाय महज 2.9 फीसदी (जिसमें भाजपा को 102 और महागठबंधन को 125 सीटें मिलतीं) होता। उम्मीद की जानी चाहिए कि भाजपा अब सांप्रदायिक मुद्दे को कारगर नहीं मानेगी। 
 
मगर इसका अर्थ यह नहीं कि सांप्रदायिक ङ्क्षहसा का दौर खत्म होने जा रहा है। असल में अब इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है, जैसे ब्रास के मुताबिक 1978 में इंदिरा गांधी ने किया था, जब अलीगढ़ दंगों को कांग्रेस से हमदर्दी रखने वालों की 1977 के चुनावों में सत्ता में आई जनता सरकार को अस्थिर करने की केाशिश के तौर पर देखा गया। श्रीमती गांधी (और उनके बेटे जो अपनी सुविधा के अनुसार हिंदू हितों का चोला भी ओढ़ लिया करते थे) और उनके बेटे ने 1978 में अलीगढ़ दंगों को सरकार के खिलाफ हमला करने के रूप में इस्तेमाल करते हुए दावा किया कि जनता सरकार के शासन में मुस्लिमों और भारतीय समाज के अन्य वंचित वर्गों पर जुल्म ढाए जा रहे हैं और खुद को उनके रहनुमा के तौर पर पेश किया और इसने 1980 के चुनावों में कांग्रेस की सत्ता में वापसी संभव कराई क्योंकि 1977 में कांग्रेस और श्रीमती गांधी से किनारा करने वाले मुसलमानों ने भारी तादाद में उन्हें वोट दिए। (पृष्ठ 308) 
 
अपनी पार्टी द्वारा राजग सरकार के खिलाफ असहिष्णुता की मुहिम चलाने वाली मौजूदा श्रीमती गांधी अब उसी नाटक को दोहरा रही हैं और नैशनल हेरल्ड मामले में अपनी उलझन को अपनी सास की शहादत के साथ जोड़ रही हैं, ऐसी ही कवायद ने 1977 में जबरदस्त हार के बाद इंदिरा की सत्ता में वापसी कराने में योगदान दिया था। यहां तक कि गैर-पेशेवर पुलिस के साथ भी सांप्रदायिक हिंसा के इस नाटक पर विराम लगाने का इकलौता तरीका राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही निकलेगा। मगर इससे जुड़े पहलुओं पर दोषारोपण करने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया और सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण में अंग्रेजी राज के नियमों को लागू करने में नाकामी पर सजा का प्रावधान सही होगा, इससे ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने वाले कारकों पर अंकुश लगेगा। मगर असहिष्णुता पर प्रदर्शन को लेकर हो रहे मौजूदा सांप्रदायिक ड्रामे को देखते हुए मुझे उम्मीद नहीं है। 
Keyword: clash, communal rites,,
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