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2015 ने दिखाई धुंधले भविष्य की तस्वीर, लेकिन न हों नाउम्मीद
जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  January 04, 2016

वर्ष 2015 समाप्त हो गया है। बीता साल ऐसी घटनाओं से भरा रहा जो पूरी तरह एक दूसरे से संबंधित थीं। इतना ही नहीं उसने भविष्य की जो छवि हमें दिखाई है वह अत्यधिक चिंतित करने वाली है। उम्मीद की जानी चाहिए कि हम सभी इन चुनौतियों से पार पाने के लिए एकजुट होंगे और उठ खड़े होंगे। गत दिसंबर में पेरिस में आयोजित जलवायु परिवर्तन वार्ता का समापन एक ऐसे समझौते के साथ हुआ जिसे कतई महत्त्वाकांक्षी नहीं कहा जा सकता है और समता से जिसका दूरदूर तक नाता नहीं। इस समझौते ने दुनिया को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। इसके चलते वंचित वर्ग मूलभूत मानव विकास से और दूर रह जाएगा। 

 
चेन्नई की आपदा भला कौन भूला होगा। आमतौर पर सूखा और पानी की किल्लत झेलने वाला शहर जलाशय बन गया था। इस उदाहरण ने न केवल चेन्नई बल्कि तमाम बड़े शहरों में रहने वाले लोगों को इस बात का अहसास करा दिया कि जलवायु परिवर्तन के खतरे के बीच हम कितने जोखिम भरे समय में रह रहे हैं। यह उदाहरण हमें यह समझा गया कि अगर इसी दर्जे का कुप्रबंधन जारी रहा तो मौसम में अतिरंजित बदलाव हम सभी को परेशानी में डाल देगा। 
 
दिल्ली हद दर्जे के वायु प्रदूषण की शिकार है। यहां सांस लेना दूभर है। अब दिल्लीवासियों को अहसास हो रहा है कि उनको अपने आवागमन के तौरतरीकों में जरूरी बदलाव करते हुए तकनीकी बदलाव और जीवनशैली में बदलाव का ऐसा तरीका विकसित करना होगा ताकि कम से कम शहर की हवा सांस लेने लायक तो रह जाए। स्पष्टï है कि वर्ष 2015 हमारे लिए कई सख्त संदेश लेकर आया है। पहला, अगर हम सुरक्षित स्वास्थ्य और जीवन चाहते हैं तो पर्यावरण संबंधी मसलों की अनदेखी नहीं की जा सकती। दूसरी बात, विकास का एक अलग तरीका तलाश करना होगा क्योंकि कार्बन उत्सर्जन के नकारात्मक परिणाम हमारे सामने आने लगे हैं। तीसरी बात, चूंकि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां चेतावनी का दौर बीत चुका है इसलिए हमें जो भी करना है बहुत जल्दी और तीव्र गति से करना होगा। निश्चित तौर पर वर्ष 2015 ने हमें भविष्य की स्पष्टï तस्वीर दिखा दी है। हमें इन गंभीर चेतावनियों पर ध्यान देना होगा वरना इसका खमियाजा हमें उठाना होगा। 
 
पेरिस समझौते की बात करते हैं। मौजूदा विश्व दो तरह की आपदाओं से जूझ रहा है। पहली आर्थिक वृद्घि की हमारी जरूरतों से पैदा हुई हैं और दूसरी ऐसी भोगवादी प्रवृत्ति के कारण जिसके चलते वातावरण में असीमित उत्सर्जन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों का यह उत्सर्जन हमारी ऊर्जा संबंधी जरूरतों के कारण होता है। इसने हमारे भविष्य के लिए कई खतरे पैदा कर दिए हैं। हम पहले ही देख चुके हैं कि मौसम में किस तरह के अचानक बदलाव आ रहे हैं। इनका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। वर्ष 2015 में मौसम की मार ने लाखों किसानों की आजीविका को बुरी तरह प्रभावित किया। किसानों में हताशा इस कदर बढ़ गई है कि वे आत्महत्याएं तक करने लगे हैं। फसलों की नाकामी के लिए खराब नीतियां तो जिम्मेदार हैं ही, अब मौसम की मार ने उनका कष्टï और अधिक बढ़ा दिया है। 
 
इस लिहाज से देखा जाए तो विकास का लाभांश गंवाया जा चुका है। अभी तो बहुत कुछ सामने आना बाकी है। पेरिस समझौते की कमजोर और अस्पष्टï शब्दावली ने निराश किया है। पहले से ही समृद्घ और ज्यादा समृद्घ होते जा रहे देशों ने स्पष्टï संकेत दे दिया है कि वे अपनी वृद्घि के मामले में कोई समझौता नहीं करने वाले हैं। न ही वे अपनी खपत में कोई कटौती करेंगे। 
 
एक और आपदा हमारी प्रतीक्षा कर रही है। यह है दुनिया में बढ़ती असमानता, असुरक्षा और असहिष्णुता। पेरिस समझौता हमें बताता है कि अमीर देशों ने खुद को सुरक्षित कर लिया है और लग रहा है कि उनके सुरक्षा घेरे में कोई सेंध नहीं लगा सकता। निश्चित तौर पर इस सुरक्षा घेरे में उनकी बातचीत का विषय भी वही होता है जिसमें वे सुरक्षित महसूस करते हैं। इंटरनेट की उपलब्धता वाले इस सूचना युग में यह विडंबना ही है कि दुनिया में संवेदनशीलता कम होती जा रही है। सूचनाओं का दायरा सुने जाने की क्षमता के मुताबिक सीमित हो गया है। यह चकित करने वाली बात नहीं है। ऐसे में बात जलवायु परिवर्तन वार्ता की हो, व्यापार वार्ता की या अंतरराष्टï्रीय संबंध की, हर मामले में एक ही सशक्त बहस होती है।
 
सबसे ताकतवर मुल्क यही मानना पसंद करेंगे कि दूसरा कोई देश है ही नहीं जिसके हितों की बात की जाए। जैसा कि मैंने पेरिस से भी लिखा था, दूसरा कोई पक्ष वहां नहीं था। मान्यता यही है कि दूसरा पक्ष या तो आतंकी है या वामपंथी या फिर भ्रष्टï और अक्षम। दरअसल सोच से इतर सच या विचार को खारिज करने का विचित्र दौर चल रहा है। इन तमाम बातों के बीच दुनिया में असमानता भी बढ़ रही है। वृद्घि या आर्थिक समृद्घि का कोई स्तर अंतिम नहीं रह गया है क्योंकि आकांक्षाओं की कोई सीमा नहीं है। हमारे नए विश्व में विफलता की कोई जगह ही नहीं है। अब जो सक्षम है वही रहेगा बाकी की परवाह नहीं।
 
आश्चर्य नहीं कि भारत में भी हमें यही परिलक्षित होता दिख रहा है। पिछले साल गरीबों और वंचितों, बाढ़ पीडि़तों, सूखाग्रस्त और अकाल पीडि़तों की खबरें हमारे टेलीविजन के परदे और अखबारों के आलेखों में नहीं नजर आईं। अगर हम उनके अस्तित्व से इनकार करेंगे तो हमें उनके भविष्य या वर्तमान की भी चिंता नहीं करनी होगी। हम ऐसे जीवन के बारे में सोच सकते हैं जो केवल हमारे फायदे के बारे में सोचता हो। यह एक असमान विश्व में पनपती असहिष्णुता का नमूना है। इससे भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। इससे भीषण संग्राम की पृष्ठïभूमि तैयार हो रही है। हमें इसे बदलना होगा। मैंने अभी उम्मीद नहीं खोई है। आप भी न खोएं। वर्ष 2016 शुभ हो।
Keyword: parish, climet change,,
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