बिजनेस स्टैंडर्ड - कारों पर रोक... न मनाएं शोक
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कारों पर रोक... न मनाएं शोक
तिनेश भसीन /  December 27, 2015

सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में बड़े डीजल इंजन वाली कारों की बिक्री पर जो रोक लगाई है, उससे कई खरीदार परेशानी में पड़ गए हैं। उन खरीदारों के लिए दिक्कत ज्यादा बड़ी है, जिन्होंने इसके लिए कर्ज लिया है। यदि उन्होंने उस कार के लिए कर्ज लिया है, जिस पर अब रोक लग चुकी है और यह कर्ज डीलर को उस वक्त दिया गया था, जब रोक लगाई जा रही थी तो उन्हें कार अब नहीं मिल पाएगी। यह छोटी-मोटी दिक्कत नहीं है क्योंकि उनकी ओर से कर्ज डीलर को मिल चुका है और वे डीलर के पास से कार नहीं उठा सकते। ऐसे ग्राहकों को कितनी फिक्र करनी चाहिए? आपकी साख या क्रेडिट की जांच करने, उसे सुधारने और कर्ज दिलाने में मदद करने वाली कंपनी क्रेडिटमंत्री के मुख्य कार्य अधिकारी और सह-संस्थापक रंजीत पंजा कहते हैं कि ऐसे कर्ज आसानी से रद्द कराए जा सकते हैं और ग्राहक को उनमें किसी तरह का जुर्माना चुकाने की जरूरत नहीं होगी। वह कहते हैं, 'डीलरों का विभिन्न वित्तीय संस्थानों के साथ तालमेल होता है और उन संस्थानों के नुमाइंदे डीलरशिप पर बैठे रहते हैं। ज्यादातर ग्राहक उन्हीं से कर्ज लेना पसंद करते हैं क्योंकि कर्ज सस्ता बैठता है, कर्ज लेने के लिए कहीं जाना भी नहीं पड़ता और डीलर के साझेदार संस्थान से कर्ज लिया जाए तो डीलर ग्राहकों को छूट भी दे देता है।'

अगर खरीदार कर्ज के लिए पूरी तरह योग्य होता है तो डाउन पेमेंट होते ही बैंक या वित्तीय संस्थान कर्ज की रकम डीलर के खाते में डाल देता है। कार का पंजीकरण यानी रजिस्ट्रेशन होने से पहले ही कर्ज की रकम डीलर के पास पहुंच जाती है। आम तौर पर वित्तीय संस्थान यानी फाइनैंसर से रकम मिलने के बाद एक या दो दिन में डीलर रजिस्ट्रेशन का काम शुरू कर देता है। अगर कार की बुकिंग कर्ज मिलने लेकिन रजिस्ट्रेशन होने से पहले ही रद्द कर दी जाती है तो ग्राहक पर किसी तरह की देनदारी नहीं बनती है। पंजा कहते हैं, 'इस कर्ज में दरअसल ग्राहक अपनी कार को ही गिरवी रखता है। यदि रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है तो खरीदार का कार पर मालिकाना हक ही नहीं है। इसलिए उस पर किसी तरह की देनदारी नहीं बन रही है।' दिल्ली और एनसीआर में यानी अगल-बगल के इलाकों में उन डीजल कारों का रजिस्ट्रेशन बंद कर दिया गया है, जिनमें 2,000 सीसाी से अधिक क्षमता वाले इंजन लगे होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर फिलहाल 31 मार्च, 2016 तक उनका पंजीकरण नहीं होगा। अगर आप भी इस आदेश की वजह से उसी परेशानी में फंस गए हैं, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है तो आप एकदम बेफिक्र रहें। जो रकम फाइनैंसर ने डीलर को दे दी है, उसकी वापसी का जिम्मा भी उन दोनों का ही होगा।

लेकिन अगर आपने 2,000 सीसी से अधिक ताकत वाली डीजल गाड़ी के लिए कर्ज की अर्जी दी थी, जो मंजूर हो गई है। लेकिन अभी तक फाइनैंसर ने कर्ज की रकम डीलर तक नहीं भेजी है तो आप कोई दूसरी गाड़ी खरीद सकते हैं। विशेषज्ञ भी यही बता रहे हैं कि खरीदार भी 31 मार्च को प्रतिबंध खत्म होने का इंतजार करने के बजाय अपनी मनचाही गाड़ी के बजाय कोई दूसरी कार खरीदना पसंद कर रहे हैं। अगर आप उसी डीलर से कोई दूसरी कार खरीदना चाहते हैं तो आपको कर्ज हासिल करने की पूरी कवायद एक बार फिर दोहरानी पड़ेगी। डील4लोन्स के सह-संस्थापक ऋषि मेहरा कहते हैं कि फाइनैंसर कर्ज देने का फैसला करते वक्त कई पहलुओं पर नजर दौड़ाते हैं। इनमें कार का मॉडल भी शामिल होता है और उसका वैरिएंट भी देखा जाता है। इसका मतलब है अलग-अलग गाड़ी के लिए कर्ज की रकम और ब्याज दर अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी भी ग्राहक को नई गाड़ी के लिए कर्ज लेने के वास्ते एक बार फिर अर्जी देनी होगी। अगर आप उसी डीलर से कोई दूसरी गाड़ी लेने जा रहे हैं तो कर्ज को जल्दी और आसानी से मंजूरी मिल सकती है क्योंकि फाइनैंसर कंपनी पहले ही देख चुकी है कि आप कितना कर्ज चुका सकते हैं और कितनी आसानी से चुका सकते हैं। विश्लेषकों को लगता है कि बड़ी डीजल कार खरीदने जा रहे लोगों के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। उन्हें बेहतर विकल्प तभी मिलेंगे, जब वे समझौता करने के लिए तैयार होंगे। प्राइस वाटरहाउस में पार्टनर और वाहन विश्लेषक अब्दुल मजीद कहते हैं कि बड़ी कार बनाने वालों ने आम तौर पर उनके पेट्रोल इंजन वाले मॉडल बंद कर दिए हैं क्योंकि पेट्रोल की कारें डीजल कारों जैसी ताकत नहीं दिखा पातीं और न ही उनका प्रदर्शन उतना बेहतर रहता है। ऑनलाइन कार कम्युनिटी टीम-बीएचपी के संस्थापक रुश पारेख को लगता है कि मारुति की सात सीटों वाली अर्टिगा को इस प्रतिबंध का जबरदस्त फायदा मिलेगा क्योंकि उसमें उतनी ही जगह है, जितनी प्रतिबंधित गाडिय़ों में होती थी। इसी तरह होंडा की मोबिलियो और रेनो की लॉजी को भी फायदा मिल सकता है, लेकिन इसकी गुंजाइश कुछ कम होगी क्योंकि ये मॉडल बहुत लोकप्रिय नहीं हैं।

पारेख को लगता है कि क्रेटा और डस्टर जैसे स्पोट्र्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) को भी इसका फायदा मिल सकता है और जनवरी-मार्च तिमाही में बाजार में उनकी पैठ बढ़ सकती है। वह कहते हैं, 'आप देखेंगे कि महिंद्रा टीयूवी 3ओओ का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करेगी क्योंकि उसमें 1.5 लीटर का छोटा टर्बो-डीजल इंजन लगा है, जिसका दिल्ली में रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है।' हालांकि छोटी डीजल कारों की बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है, लेकिन न्यायालय का कहना है कि इन पर एकमुश्त प्रदूषण कर लगेगा। डीजल गाडिय़ां उन लोगों के लिए अच्छी होती हैं, जिन्हें रोज लंबा सफर करना होता है। ये कारें कम ईंधन में ज्यादा दूरी तय कर लेती हैं। इसके अलावा डीजल की कीमत भी पेट्रोल के मुकाबले कम है, जिसकी वजह से डीजल कार चलाने पर पैसा बचाने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी डीजल कार खरीदने की मंशा रखने वाले जिन लोगों को दिन में 50-60 किलोमीटर से कम दूरी ही नापनी होती है, वे पेट्रोल इंजन वाली कार खरीदने पर भी विचार कर सकते हैं। डीजल कारें ईंधन के मामले में कम खर्चीली होती हैं, लेकिन उनकी कीमत ज्यादा होती है। अगर ऊंची कीमत वाली डीजल गाड़ी का इस्तेमाल कम हो यानी उस पर सफर काफी कम करना हो तो उसे लेने की कोई तुक ही नजर नहीं आती। ऐसी कार को अगर कर्ज लेकर खरीदा जाएगा तो उसकी मासिक किस्त निश्चित रूप से महंगी पड़ेगी और पेट्रोल के मुकाबले इसमें ब्याज भी ज्यादा जाएगा।

इसके अलावा कई अन्य बातें भी हैं, जहां पेट्रोल गाडिय़ां डीजल गाडिय़ों से बेहतर साबित होती हैं। पेट्रोल के इंजन डीजल इंजनों के मुकाबले ज्यादा फुर्तीले और क्षमतावान माने जाते हैं क्योंकि इनमें कम वजन के पुर्जे लगे होते हैं। इस वजह से इनमें रिवॉल्यूशन तेज होता है और ये बेहद फुर्ती से काम करते हैं। इसके अलावा डीजल कारों के रखरखाव में भी आपको पेट्रोल कार के मुकाबले ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है क्योंकि उनके कल पुर्जे आम तौर पर कुछ महंगे होते हैं। एक पहलू यह भी है कि कार जितनी महंगी होगी, उसके इंश्योरेंस का प्रीमियम भी आपको उतना ही ज्यादा देना पड़ेगा।

पर्यावरण भी बचे और जेब भी

अगर आप पर्यावरण की इतनी अधिक फिक्र करते हैं और खर्च भी कम रखना चाहते हैं तो इलेक्ट्रिक कारें या हाइब्रिड कारें आपके लिए एकदम मुफीद हैं। लेकिन पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन के उलट बैटरी पर चलने वाली इन कारों को भारत में ज्यादा पसंद नहीं किया जाता है। मजीद कहते हैं कि उन्हें सड़क पर जो भी इलेक्ट्रिक वाहन नजर आते हैं, उनमें से ज्यादातर का स्टीयरिंग व्हील महिलाओं के हाथ में ही होता है। वह इसे इस तरह समझाते हैं, 'महिलाओं के लिए बड़ा मसला है कहीं आने-जाने की सहूलियत। लेकिन पुरुषों के लिए गाड़ी का प्रदर्शन अहम होता है और उनके लिए यह भी मुद्दा होता है कि गाड़ी दिखती कैसी है।' भारत में अभी एक ही इलेक्ट्रिक कार बिकती है - महिंद्रा की रेवा। बैटरी पूरी तरह चार्ज होने के बाद यह कार 120 किलोमीटर तक दौड़ सकती है। बैटरी पूरी तरह चार्ज होने में पांच घंटे लग जाते हैं। यह ज्यादा से ज्यादा 81 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ सकती है। इस कार की कीमत सब जगह अलग-अलग होती है और दिल्ली में इसके लिए सबसे ज्यादा 5.93 लाख रुपये अदा करने पड़ते हैं। अगर आप यही कार जयपुर में खरीदते हैं तो आपको महज 4.72 लाख रुपये चुकाने होंगे। कंपनी का दावा है कि अगर कोई शख्स इस कार को रोजाना 50 किलोमीटर चलाता है तो बैटरी चार्ज करने पर महीने में केवल 525 रुपये खर्च होंगे। इस कार का रखरखाव भी सस्ता है क्योंकि पेट्रोल या डीजल से चलने वाली कारों के मुकाबले इसमें कल पुर्जों की संख्या कम है।

लेकिन महिंद्रा रेवा लोकप्रिय नहीं है क्योंकि इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचे की बेहद कमी है। आपके पास अगर पेट्रोल या डीजल इंजन वाली कार है तो आप कहीं भी उसकी टंकी भर सकते हैं। लेकिन इलेक्ट्रिक कार के लिए चार्जिंग स्टेशनों की जरूरत पड़ती है, जो हर जगह नहीं मिलते। इसीलिए अगर आपको लंबे सफर पर जाना हो तो ये कार आपके काम नहीं आ पाएंगी। पेट्रोल और डीजल कारों के मुकाबले इन कारों को चलाने का खर्च बहुत कम होता है, लेकिन खरीदते वक्त आपको इनकी ऊंची कीमत अदा करनी पड़ती है। इसके अलावा जब कार 50,000 किलोमीटर दौड़ लेती है तो इसकी बैटरी बदलनी पड़ती है, जो बहुत महंगी पड़ती है। अगर पर्यावरण के लिए फायदेमंद लक्जरी गाड़ी चाहिए तो आप टोयोटा प्रियस जैसी हाइब्रिड कारों का रुख कर सकते हैं। प्रियस के फिलहाल दो मॉडल हैं। इनमें जेड 5 38.10 लाख रुपये की आती है और जेड 6 की कीमत 39.80 लाख रुपये है। इस कार में एक साथ दो इंजन होते हैं - पेट्रोल इंजन और इलेक्ट्रिक इंजन। इससे यह कार ताकतवर बन जाती है और उसमें माइलेज यानी ईंधन की खपत भी हैचबैक कार जितनी ही होती है। इसमें क्लाइमेट कंट्रोल, सोलर रूफ, मल्टी इन्फॉर्मेशन डिस्प्ले जैसे फीचर होते हैं और पूरी तरह रंगीन टचस्क्रीन वाला इंटरफेस होता है। अगर आपको पैसे खर्च करने में कोई हिचक नहीं हॅै तो आप बीएमडब्ल्यू की आई 8 हाइब्रिड स्पोट्र्स कारा पर भी नजर दौड़ा सकते हैं। इस कार की कीमत 2.30 करोड़ रुपये जरूर है, लेकिन इसे देखकर लगता है मानो विज्ञान कथा पर आधारित किसी साई-फाई फिल्म के पर्दे से निकलकर सड़क पर आ गई है। इस कार में इलेक्ट्रिक मोटर भी है और कंबश्चन इंजन भी है, जिनकी वजह से कार 1 लीटर ईंधन में 47.5 किलोमीटर दौड़ जाती है। केवल इलेक्ट्रिक इंजन चलाया जाए तो कार की अधिकतम रफ्तार 120 किमी प्रति घंटा हो सकती है। लेकिन पेट्रोल इंजन भी साथ में चालू हो यानी कार हाइब्रिड मोड पर हो तो केवल 4.4 सेकंड में यह 100 किमी प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ सकती है।

तेज और खासियत भरी ई-कारें

गुल पनाग, अभिनेत्री और वाहन प्रेमी

मेरे पास इलेक्ट्रिक कार महिंद्रा रेवा ई2ओ है, जो मेरे पति ने मेरी सालगिरह पर मुझे तोहफे में दी थी। इसमें तमाम फीचर मौजूद हैं, जैसे पॉवर स्टीयरिंग, ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन, नेविगेशन, ब्लूटूथ, रियर यानी पीछे की ओर कैमरा और रिवर्स पार्किंग सेंसर। मुझे यह कार रखे करीब साल भर पूरा हो गया। शुरू में मैंने सोचा था कि कम दूरी तक जाना हो तभी इस कार का इस्तेमाल करूंगी। लेकिन मैं हैरत में पड़ गई क्योंकि यह कार दूरी तय करने के मामले में मेरी उम्मीद से भी बेहतर निकली। अगर 25-30 किलोमीटर के दायरे में घूमना है तो यह कार सबसे उम्दा है। मैं इस कार से शहर में करीब 70 किलोमीटर का सफर आराम से कर लेती हूं और वह भी तब, जब इसका एयरकंडीशनर चलता रहता है। इसके रखरखाव पर भी मुझे बहुत कम खर्च करना पड़ता है। सबसे बड़ा अचंभा तो मुझे इस बात से हुआ कि यह कार बेहद तेज और फुर्तीली है। पेट्रोल या डीजल के इंजन हों तो गाड़ी में गियर डालते वक्त आपको रफ्तार कुछ धीमी होती लगती है। लेकिन इलेक्ट्रिक कारों में रफ्तार में किसी तरह की कमी नहीं आती। ये तो फुर्र से दौडऩे लगती हैं।

मुझे कार चलाना यूं भी बहुत पसंद है और आम तौर पर मैं ऑडी क्यू 5 में सफर करती हूं। लेकिन यह गाड़ी बहुत लंबी-चौड़ी है, इसलिए पार्किंग तलाशने और गाड़ी को पार्किंग में लगाने में दिक्कत होती है। लेकिन ई2ओ के साथ यह समस्या कभी नहीं आती। मुंबई और दिल्ली जैसे भीड़ भरे शहरों में इलेक्ट्रिक वाहन बहुत कारगर साबित हो सकते हैं। बस एक ही दिक्कत आती है और वह है चार्जिंग स्टेशन तलाशना। मैं जहां भी रहती हूं, मुझे इसके लिए चार्जिंग पॉइंट वहीं रखना पड़ता है।

मुझे लगता है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की ओर से भारी सब्सिडी दिए जाने की जरूरत है। ऐसा हुआ तो यह बी सेगमेंट की कारों यानी मारुति सुजूकी सेलेरियो, वैगन आर और हुंडई आई 10 जैसी कारों के बदले बेहतर और व्यावहारिक विकल्प साबित हो सकती हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों के बारे में लोगों की समझ भी ठीक नहीं है। लोगों को इसके फायदे पता ही नहीं हैं और अक्सर वे इसके बारे में गलतफहमी के शिकार रहते हैं। लेकिन हकीकत यही है कि कल की रफ्तार इलेक्ट्रिक वाहनों में ही छिपी है।

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