बिजनेस स?टैंडर?ड - वैश्विक तापमान घटाने की कवायद के मायने
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वैश्विक तापमान घटाने की कवायद के मायने
अरुणाभ घोष और वैभव चतुर्वेदी /  December 22, 2015

पेरिस में जलवायु परिवर्तन समझौता न तो संपूर्ण है और न ही निष्पक्ष। लेकिन यह समझौता नए हल तलाशने के लिए सही दिशा में बढऩे का संकेत देता है। बता रहे हैं अरुणाभ घोष और वैभव चतुर्वेदी

 
जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते को इस समस्या से निपटने की दिशा में सामूहिक कदम का प्रस्थान बिंदु माना जा रहा है जो कि सही है। यह न तो एक संपूर्ण समझौता है और न ही निष्पक्ष। लेकिन महत्त्वाकांक्षा, ऐच्छिक कदम, निगरानी और समीक्षा को लेकर तथा नए हल तलाश करने के लिए एकजुट होकर काम करने को लेकर यह सही दिशा में बढऩे की ओर संकेत देता है। बहरहाल समझौते का सबसे कठिन हिस्सा है तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना और यह सबसे मुश्किल काम होगा।
 
यह समझौता स्वघोषित ऐच्छिक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता (आईएनडीसी) को बहुपक्षीय वैधता प्रदान करता है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के क्रम में वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए भी सहमति बनी है। गत अक्टूबर में 147 देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कमी के अपने अनुमान पेश करने के बाद (तब से अब तक तकरीबन सभी देश ऐसा कर चुके हैं) संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन संबंधी मसौदे (यूएनएफसीसीसी) में अनुमान जताया गया था कि वर्ष 2030 तक दुनिया का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 56.7 गीगाटन (अरब टन) कार्बन डाय ऑक्साइड गैस के समान होगा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने इसके 41.9 गीगाटन के बराबर रहने का अनुमान जताया है। यह अनुमान 150 से अधिक देशों की ऊर्जा खपत और औद्योगिक प्रक्रिया पर आधारित है। आईएनडीसी के पहले के परिदृश्य से तुलना करें तो यूएनएफसीसी ने अनुमान लगाया था कि वर्ष 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन में 5.9 फीसदी की कमी आएगी।
 
लेकिन वैश्विक औसत ताप वृद्धि को औद्योगिक युग के पूर्व के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य के हम कितना करीब पहुंच सकते हैं? यूएनएफसीसीसी के विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वर्ष 2030 तक 41.6 गीगाटन तक होना चाहिए। वर्ष 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन अंतर (2 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करने के क्रम में आईएनडीसी की तुलना) 15.1 गीगाटन होना चाहिए। आईईए के परिदृश्य के हिसाब से यह अंतर 6.1 गीगाटन है क्योंकि इसमें केवल ऊर्जा और औद्योगिक प्रक्रिया का आकलन किया गया। यह अंतर बताता है कि उत्सर्जन के चरम पर पहुंचने के अनुमान अलग-अलग हैं। इतना ही नहीं तकनीकी क्षमताएं और आर्थिक वृद्धि की दर भी अलग-अलग है। यानी आईएनडीसी के सार्थक प्रभाव के बावजूद वैश्विक प्रयास उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य से खासे पीछे रह जाएंगे।
 
पेरिस समझौते के बाद भी चीजें आसान नहीं होने वालीं। विभिन्न सरकारों ने ताप वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम करने के प्रयासों पर सहमति जता दी है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता नजर नहीं आ रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल की पांचवीं आकलन रिपोर्ट स्पष्ट रूप से यह बताती है कि वातावरण में होने वाले उत्सर्जन को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। एकीकृत आकलन मॉडलों पर काम कर रहे शोधकर्ताओं को अब ऐसे तरीके तलाश करने चाहिए जिनसे वैश्विक ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस करने संबंधी तकनीक विकसित की जा सके और संबद्ध उत्सर्जन कटौती की राह प्रशस्त की जा सके।
 
यह बात स्पष्ट है कि अगर हम 1.5 डिग्री सेल्सियस की कटौती का प्रयास करते हैं तो पहले से ही सीमित कार्बन स्पेस आगे चलकर और तेजी से कम होगा। ताप वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की 66 फीसदी संभावना के लिए वर्ष 2011 से 2100 तक 1000 गीगाटन कार्बन बजट उपलब्ध है। हमारा विश्लेषण बताता है कि आईएनडीसी के तहत वर्ष 2011 से 2030 तक चीन, यूरोपीय संघ और अमेरिका का उत्सर्जन क्रमश: 218, 68 और 96 गीगा टन होगा। 2 डिग्री सेल्सियस कमी के लक्ष्य के साथ हमने पाया कि वर्ष 2011 से 2030 के बीच ये तीनों क्षेत्र मिलकर वर्ष 2100 तक की मान्य वैश्विक उत्सर्जन सीमा का 38 फीसदी प्रयोग कर लेंगे। 1.5 डिग्री सेल्सियस के संशोधित लक्ष्य के साथ वैश्विक कार्बन स्पेस घटकर 550 गीगा टन रह जाएगा (केवल 50 फीसदी संभावना के साथ)। वहीं 66 फीसदी संभावना के साथ यह घटकर 400 गीगाटन हो जाएगा। संक्षेप में कहें तो मौजूदा नीतियों के तहत वर्ष 2030 तक चीन, यूरोपीय संघ और अमेरिका मिलकर सारी दुनिया के सदी भर के कार्बन बजट का 95 हिस्सा खत्म कर देंगे। 
 
इसके क्या निहितार्थ हैं? पहला, वर्ष 2030 के बाद उत्सर्जन में कमी को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड या 2 डिग्री सेंटीग्रेड के दायरे में रखने का कड़ाई से पालन करना होगा। स्वघोषित ऐच्छिक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता (आईएनडीसी) के बावजूद सकल वैश्विक कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जन वर्ष 2030 तक स्वीकृत सीमा से ऊपर चला जाएगा। भले ही भारत अपने हिस्से से ज्यादा कर रहा हो, लेकिन सबसे बड़े उत्सर्जनकर्ताओं को योगदान बढ़ाना होगा। वहीं वर्ष 2030 के बाद उत्सर्जन एजेंडे में अफ्रीका जैसे कम आय वाले क्षेत्र अहम बन जाएंगे, जिन्हें प्रभावी उत्सर्जन कारोबार प्रणाली और तकनीकी हस्तांतरण की जरूरत होगी। 
 
दूसरा उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों की अहमियत बढ़ती जाएगी। सीईईडब्ल्यू के मॉडल से पता चलता है कि 2 डिग्री सेंटीग्रेड कमी के रास्ते के तहत वैश्विक कार्बनडाइ ऑक्साइड उत्सर्जन वर्ष 2030 में 36 गीगाटन हो जाएगा और अगर 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड का पालन किया गया तो यह इस स्तर पर पहले ही पहुंच जाएगा। वहीं इस शताब्दी के बाद उत्सर्जन ऋणात्मक करना होगा, जिसके लिए अभी सिद्ध साबित नहीं हुई तकनीकों जैसे बायो-एनर्जी कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तकनीक का इस्तेमाल करना होगा। अगर सीसीएस को इच्छा के पोर्टफोलियो से हटाया गया तो एनर्जी सिस्टम्स के लिए वर्ष 2050 के बाद कम उत्सर्जन एक बड़ी चुनौती होगी। 
 
तीसरा पहले ही जयवायु परिवर्तन के असर के प्रमाण बढ़ रहे हैं। सीईईवी, आईआईएम अहमदाबाद और आईआईटी गांधीनगर द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि भारत के 447 जिलों में पहले ही तापमान 2 डिग्री सेंटीग्रेड की रफ्तार से बढ़ रहा है। इससे 80 करोड़ आबादी प्रभावित हो रही है और इन जिलों में से 36 में तापमान में 4 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा का इजाफा हो रहा है। जलवायु परिवर्तन से हम बुरी तरह प्रभावित होंगे और भविष्य में होने वाले जलवायु सम्मेलनों में क्रियान्वयन को केंद्र बिंदु बनाया जाना चाहिए। 
 
आखिर में 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था संसाधनों के कुशलतम उपयोग, विकेंद्रीकरण और उपभोक्ताओं के सशक्तिकरण पर आधारित होगी। यहां तक कि जब हम निष्पक्षता और न्याय के सिद्वांतों के लिए लड़ते हैं तो भारत का प्राथमिक राष्ट्रीय हित (राष्ट्रीय विकास एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए) भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए निवेश होगा। विश्व ऐतिहासिक जलवायु समझौता करने के लिए एक मंच पर आया है। लेकिन यह महज एक शुरुआत है। तापमान में थोड़ी बढ़त और घटत से आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों का भाग्य तय होगा। 
 
(डॉ. अरुणाभ घोष और डॉ. वैभव चतुर्वेदी ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद में क्रमश: मुख्य कार्याधिकारी और रिसर्च फैलो हैं।)
Keyword: parish, climet change,,
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