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मिले-जुले संकेत
संपादकीय /  December 22, 2015

मौद्रिक नीति हस्तांतरण में सक्षमता की कमी केंद्रीय बैंक के लिए दबाव का खास पहलू रही है। जनवरी, 2015 से अब तक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीतिगत दरों में 125 आधार अंकों की कटौती की है (100 आधार अंक यानी एक फीसदी) लेकिन इस दौरान बैंकों ने अपनी कर्ज की दरों में केवल 60 आधार अंकों की कटौती की। बैंकरों ने तर्क दिया कि जब नीतिगत दरों में बढ़ोतरी हो रही थी, तब भी ऐसा ही हुआ था और उन्होंने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के अनुपात में कर्ज की दरों में कम ही इजाफा किया था। शायद ऐसा ही हो लेकिन अब आरबीआई ने बदलाव का फैसला किया है। संक्षिप्त मौद्रिक हस्तांतरण को सुलझाने के लिए उसने पिछले हफ्ते ऐलान किया कि अब बैंक कर्ज की दरों को तय करने में औसत लागत के मौजूदा चलन के बजाय कोष की सीमांत लागत से इसे निर्धारित करेंगे और उन्हें मासिक आधार पर इन दरों की सूचना भी देनी होगी। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इससे कर्ज बाजार में पारदर्शिता आने और प्रतिस्पर्धा बढऩे की उम्मीद है, खासतौर पर आवास जैसे लंबी अवधि के ऋणों में दरों में परिवर्तन की यह नई व्यवस्था परिलक्षित होगी। हो सकता है कि वाहन और वैयक्तिक जैसी श्रेणियों में भी बैंक फिलहाल इसका लाभ देने से थोड़ा कतराएं। वर्ष 2010 में प्रधान उधारी दर से आधार दर की ओर मुखातिब होने के  दौरान भी इसी तरह के तर्क पेश किए गए थे। संभवत: नई व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी। 

 
हालांकि सवाल यह भी है कि क्या मौद्रिक नीति की प्रभावोत्पादकता सुनिश्चित करने में आरबीआई सभी जरूरी कदम उठा रहा है? आरबीआई द्वारा की गई 125 आधार अंकों की कटौती के दो खास पहलू हैं। पहला तो यह कि दरों में कटौती और मुद्रास्फीति एवं ब्याज दरों की अनुमानित तस्वीर को लेकर मौद्रिक नीति की टिप्पणियों में स्पष्टï रूप से निरंतरता का अभाव रहा। दूसरा यह कि 125 आधार अंकों में 50 आधार अंकों की कटौती मौद्रिक नीति समीक्षाओं से इतर की गई। ब्याज दरों में परिवर्तन बैंकों के लिए अरसे से एक जटिल मसला रहा है। उन्हें सभी उत्पादों की समीक्षा करनी पड़ती है, व्यापक आर्थिक तस्वीर देखी जाती है और निदेशक मंडल को भी फिर से फैसले लेने पड़ते हैं। ये कवायद तब और उलझाऊ हो जाती हैं, जब केंद्रीय बैंक दरों में कटौती करने के साथ ही अपने बयान में दरों में बढ़ोतरी को लेकर चेतावनी देता है। बैंकों के लिए इसमें मिश्रित भाव होते हैं। वह यह कि केंद्रीय बैंक हेजिंग को लेकर अपना दांव चल रहा है और भविष्य में दरों में कटौती को निष्प्रभावी कर सकता है। ऐसे में बैंक उस स्थिति में दरों में कटौती को उपयोगी नहीं मानते, जब उन्हें लगता है कि ब्याज दरों में कटौती की तस्वीर पलट भी सकती है और वे दरों का लाभ आम ग्राहक तक पहुंचाने में झिझकते हैं।
 
मौद्रिक नीति से इतर घोषणाओं का भी मौद्रिक नीति हस्तांतरण पर भी वही प्रभाव होने की उम्मीद है। मिश्रित मौद्रिक नीति संकेतों की तरह समीक्षा से इतर कटौती भारी अनिश्चितता को दर्शाती है। लिहाजा बैंक उस पर त्वरित कार्रवाई करने से बेहतर इंतजार करने में भलाई समझते हैं। बॉन्ड बाजार की कमी और कर्ज कारोबार में अपर्याप्त प्रतिस्पर्धा के साथ ये समस्याएं मौद्रिक नीति हस्तांतरण की पुरानी दिक्कतों में नया जुड़ाव हैं। अंतरराष्टï्रीय स्तर पर बढिय़ा मौद्रिक नीति का यही कथन है, 'वही कहो जो तुम करोगे और फिर वही करो जो तुमने कहा।' आरबीआई को अवश्य ही अपने मुद्रास्फीतिक लक्ष्य के वादे पर खरा उतरना चाहिए और उचित रूप से बनाई संवाद रणनीति के जरिए इस पर अमल करना चाहिए।  
Keyword: RBI, repo rate, bank,,
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