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कैसे बढ़े मिठास?
संपादकीय /  November 26, 2015

सरकार द्वारा हाल के वर्षों में चीनी क्षेत्र को दिए गए तमाम राहत पैकेजों में एक और पैकेज जुड़ गया है। नवीनतम पैकेज अपनी प्रवृत्ति और भुगतान प्रक्रिया के लिहाज से पिछले पैकेजों से एकदम अलग है। इसके मुताबिक प्रति क्विंटल गन्ने पर 4.50 रुपये की उत्पादन सब्सिडी सीधे गन्ना उत्पादकों को दी जाएगी। इससे चीनी उद्योग को भी लाभ होगा क्योंकि उसे किसानों को उसी अनुपात में कम धनराशि देनी होगी। यह देश में उत्पादन से जुड़ी फसल सब्सिडी के भुगतान की एक नई शुरुआत है। अब तक कृषि सब्सिडी को उर्वरक, बिजली, बीज या खेती के उपकरण आदि के माध्यम से ही जारी किया जाता था।

उल्लेखनीय है कि उत्पादन सब्सिडी विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत ही है जब तक कि वह कुल उत्पादित फसल के मूल्य के 10 फीसदी से अधिक न हो जाए। इससे पहले सरकार ने चीनी उद्योग को प्रति टन 4,000 रुपये की निर्यात सब्सिडी दी थी ताकि कच्ची चीनी को बाहर भेज कर किसानों को देने के लिए नकदी जुटाई जा सके। अप्रैल 2014 तक ऐसा करने से 21,000 करोड़ रुपये की राशि आई थी। लेकिन इस कदम को वापस लेना पड़ा क्योंकि चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों ने इस पर आपत्ति प्रकट की। उन्होंने कहा कि कारोबारी विसंगति पैदा करने वाले ऐसे उपाय डब्ल्यूटीओ के मानकों का उल्लंघन करते हैं।

चीनी उद्योग को गन्ने की कीमतों का बकाया निपटाने में मदद करने के क्रम में सरकार ने 6,000 करोड़ रुपये मूल्य का आसान ऋण उपलब्ध कराने की बात भी कही। यह राशि चीनी मिलों की ओर से सीधे गन्ना उत्पादकों के बैंक खाते में जानी थी। बहरहाल, इन उपायों के बहुत सीमित परिणाम हुए। पिछले सीजन की गन्ना कीमतों का बकाया अभी भी 7,000 करोड़ रुपये के अत्यधिक उच्च स्तर पर है। जबकि नए गन्ने की पेराई शुरू भी हो चुकी है। शायद इसीलिए सरकार को लगा कि वह सीधे किसानों को सब्सिडी का भुगतान कर सकती है।

सरकार को इस प्रक्रिया में करीब 1,000 करोड़ रुपये की लागत आ सकती है। गन्ना किसान और चीनी उद्योग दोनों ने इसका स्वागत किया है लेकिन वे पूरी तरह संतुष्टï नहीं हैं और उनको लग रहा है कि सरकार को गन्ना कीमतों के बकाये की बार-बार सामने आने वाली समस्या से निपटने के लिए कुछ और करना चाहिए। उनको लगता है कि प्रति क्विंटल गन्ने के 230 रुपये के उचित एवं लाभकारी मूल्य की तुलना में यह सब्सिडी कुछ खास नहीं।

सरकार को ऐसे अनुरोधों से निपटने में सावधानी से काम लेना चाहिए। एक खतरा यह भी है कि उत्पादन से जुड़ी सब्सिडी गन्ने जैसी पानी की भारी खपत वाली फसल के अति उत्पादन को बढ़ावा दे सकती है। इसकी वजह से भूजल स्तर में भारी कमी आती है। वहीं चीनी उद्योग में नकदी संकट भी इसकी वजह से गहरा हो सकता है। इसके बजाय सरकार को चीनी क्षेत्र की चिंताओं की जड़ों पर वार करना चाहिए। यानी गन्ने और चीनी की कीमतों में कोई तालमेल नहीं होना।

इसके लिए राजस्व साझेदारी का मॉडल अपनाना चाहिए जिसकी वकालत सी रंगराजन की अध्यक्षता वाली चीनी क्षेत्र की विशेषज्ञ समिति ने की थी। इसके तहत मिलों को चीनी की बिक्री से आने वाला 75 फीसदी राजस्व अथवा चीनी और उसके सह उत्पादों से हासिल कुल राजस्व का 70 फीसदी किसानों के साथ साझा करना चाहिए। ऐसा करने से चीनी और गन्ने के मांग आधारित उत्पादन की राह आसान होगी। इससे उपभोक्ताओं समेत चीनी क्षेत्र के सभी पक्षकारों के हित सुरक्षित होंगे।

Keyword: गन्ना, sugarcane, चीनी मिल,,
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