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हरियाणा में बदल तो गई सरकार मगर दिख नहीं रहे खास सुधार
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 23, 2015

'जब मैं मुख्यमंत्री बना तो मुझे कुछ भी अनुभव नहीं था। अब अगर कोई मुझसे पूछता है तो मैं कहूंगा कि मुझे एक वर्ष का अनुभव है....मैं पूरी प्रक्रिया से वाकिफ हो गया हूं और जानता हूं कि समस्याओं का समाधान कैसे होता है, मैं इसे अच्छी तरह जान गया हूं।' ये उद्गार हैं हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के, जिनके कार्यकाल का पहला वर्ष 26 अक्टूबर को पूरा हो रहा है। वाकई? असल में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस हुड्डा ने इस पर शानदार टिप्पणी की। जब उनसे पूछा गया कि खट्टर सरकार के एक साल को आप किस तरह आंकते हैं तो उन्होंने संक्षेप में कहा, 'यह सरकार? मैं इसे शून्य में से शून्य देता हूं।'

हरियाणा के पूर्व अफसरशाहों से जब एक साल के दौरान खट्टïर सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी जाती है तो वे इस पर सोचते हुए सर खुजलाने लगते हैं। उनमें से एक बड़ी उम्मीद के साथ कहते हैं, 'सरस्वती नदी की खोज?' वह गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के साथ त्रिवेणी बनाने वाली उस नदी की तलाश की ओर संकेत कर रहे थे, जो गुम हो गई है। माना जा रहा है कि यमुनानगर के नजदीक उसके कुछ संकेत हो सकते हैं। इस नदी को तलाशने के लिए सरकार ने 50 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। एक अन्य नौकरशाह बालिका शिक्षा और जन्म पूर्व लिंग निर्धारण को रोकने के लिए शुरू की गई 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान का नाम लेते हैं। मगर यह योजना तो केंद्र सरकार ने शुरू की है। तथ्य यही है कि कि अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ का बेहतरीन जश्न मनाने के लिए खट्टïर सरकार के पास उपलब्धियों की कमी है। पिछली हुड्डा सरकार के दौरान भी हरियाणा में दलितों पर हमले बेहद आम थे, इस मामले में शर्मनाक मिर्चपुर कांड भुलाए नहीं भूलता है। मगर जब खट्टïर सरकार अपनी पहली वर्षगांठ मनाने जा रही है, उससे चंद दिनों पहले फरीदाबाद में दलित परिवार पर हमला यही बताता है कि कुछ भी नहीं बदला।

और वास्तव में बदलाव को लेकर ही सबसे बड़ा जुमला पेश किया जा रहा है। मगर कुछ भी नहीं बदला है। जुलाई, 2014 में सत्ता खोने से कुछ महीनों पहले हुड्डïा सरकार ने राज्य में नए सूचना आयुक्त की नियुक्ति की। उस नियुक्ति को वैधता देने के फेर में हुड्डïा सरकार इतनी जल्दबाजी में थी कि उसने नए राज्यपाल की नियुक्ति तक उसे टालना गवारा नहीं समझा, हुड्डïा ने उन्हें घर बुलाया और उन्हें खुद ही शपथ दिला दी। हरियाणा के प्रशासनिक सुधार सचिव प्रदीप कासनी ने फाइल में उल्लेख किया कि नियुक्तियों में नियमों का उल्लंघन किया गया और उनकी सिफारिशें किनारे कर दी गईं।

उनकी शपथ विधि के एक दिन बाद अंबाला से विधायक और तब भाजपा विधायक दल के नेता अनिल विज ने आरोप लगाया, 'अपने करीबियों को पदों पर बिठाने में मसरूफ हुड्डïा सरकार ने कल बेहद जल्दबाजी का नमूना पेश किया। जिसे शपथ दिलानी थी, उसे कल मुख्यमंत्री ने अपने घर बुलाया और छुट्टïी के दिन ही शपथ दिला दी। यहां तक कि उन्होंने नए राज्यपाल की नियुक्ति तक धीरज रखना मुनासिब नहीं समझा।'

खट्टïर सरकार की बात करते हैं। यह क्या कर रही है? इसने न केवल हुड्डïा सरकार के दौरान मुख्यमंत्री सचिवालय में रहे अधिकारियों को बरकरार रखा बल्कि ओमप्रकाश चौटाला के दौर के अधिकारियों पर भी मेहरबानी दिखाई। इस सरकार ने कासनी के संज्ञान को भी नजरअंदाज किया। राज्य सूचना आयुक्त भी अपने पदों पर बने हुए हैं। इस बीच इन नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए जनहित याचिका के जरिये मामला जब पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंचा तो हरियाणा सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि नियुक्तियां नियमों के तहत ही हुई हैं और उनमें कोई खामियां नहीं मिल सकतीं-उसके इस जवाब पर हैरत हुई कि उसने यह रुख क्यों अपनाया?

चंडीगढ़ के अटकलों वाले गलियारे में इसे आम चलन ही कहा जा रहा है। हालांकि वे खट्टïर की निजी ईमानदारी के कायल हैं लेकिन उनका कहना है कि उनके सहयोगियों के बारे में यही बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती। इन सहयोगियों में राज्य और दिल्ली दोनों मोर्चों पर काबिज लोगों का जिक्र है। अफसरशाहों की नियुक्तियों और तबादलों में पैसों के लेनदेन की बातें हो रही हैं।

भूमि उपयोग में परिवर्तन (सीएलयू) मामले में भी यही बात लागू होती है। हुड्डा सरकार के दौरान लगभग 18,000 एकड़ जमीन को इसके तहत मंजूरी दी गई। ऐसा क्यों किया गया? क्या ऐसा नियमों के तहत किया गया था? क्या खट्टर सरकार को कुछ भनक भी है? सरकार को सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा से यह पूछने में एक साल लग गया कि उनकी कंपनी स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी को आवंटित जमीन उन्होंने डीएलएफ को क्यों बेची और क्या इसके लिए वैट अदा किया गया था?

मगर वह निश्चित रूप से मुद्दा नहीं था। उस समय भाजपा ने आरोप लगाया था कि जमीन अवैध रूप से आवंटित की गई थी और अंदरखाने की एक जानकारी भी थी कि यह जल्दी ऊंचे भाव के साथ बिक जाएगी। इस तरह यह ऊंचे मुनाफे के साथ फिर से बेची गई। मगर खट्टïर सरकार सिर्फ इतना सवाल कर रही है क्या स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी ने सभी कर अदा किए थे या नहीं।

सीएलयू से जुड़ी कोई भी फाइल दोबारा नहीं खोली गई है। वहीं पिछली सरकार द्वारा मंजूर किए गए सीएलूयू की बात करें तो उस लिहाज से वाड्रा का मामला बहुत बड़ा नहीं है। बुनियादी रूप से कहें तो जाति को छोड़कर कुछ नहीं बदला। पिछली सरकार के दौरान सचिवालय में जाटों का बोलबाला था। अब वहां पंजाबी छाए हुए हैं। सेवानिवृत्त अफसरशाहों का कहना है कि सरकार और लोगों के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। बीता साल हरियाणा की जनता के लिए बहुत खुशगवार नहीं रहा।

Keyword: haryana, manohar lal khattar, crime,,
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