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दूरसंचार कारोबार में एक नई जंग के बन गए हैं आसार
कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  October 13, 2015

पिछली बार मुकेश अंबानी ने मोबाइल टेलीफोन के कारोबार में 14 साल पहले कदम रखा था। उस वक्त नियमों और दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं जोरों पर थीं। अब जबकि अंबानी इस क्षेत्र में अपनी दूसरी पारी की तैयारी में हैं तो फिर से वही कहानी दोहराए जाने की संभावना है। इस बार भी बाजार में कब्जे का संघर्ष शुरू होने के पहले नियमों और दिशा निर्देशों को लेकर झंझट शुरू हो चुका है।

इस बात को लेकर किसी के मन में कोई संदेह नहीं है कि रिलायंस जियो के आगमन से खलल पैदा होगा। वर्ष 2009 में कीमतों को लेकर छिड़ी जंग (तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा के नए लाइसेंस देने के कुख्यात पहले आओ, पहले पाओ नियम के चलते) के बाद कंपनियां अभी हाल ही में यानी बमुश्किल एक या दो साल पहले पटरी पर लौट सकी हैं। इस अवधि में उनके प्रतिफल में सुधार हुआ है और डाटा टैरिफ बढ़ा है।

वहीं दूसरी ओर, अधिकांश कंपनियों को स्पेक्ट्रम हासिल करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर धन खर्च करना पड़ा है। अगर रिलायंस जियो कम दरों के साथ इस कारोबार में प्रवेश करती है तो अधिकांश मौजूदा कारोबारियों को एक बार फिर दिक्कत का सामना करना होगा। अंबानी के रिलायंस जियो ने 1800 मेगाहट्र्ज और 2300 मेगाहट्र्ज बैंड के स्पेक्ट्रम खरीदे हैं। लेकिन उसे लगा कि बेहतर संचार के लिए उसे 800 मेगाहट्र्ज बैंड में भी स्पेक्ट्रम चाहिए। इस वर्ष के आरंभ में हुई नीलामी में उसने देश के 22 दूरसंचार सर्किलों में से 10 में स्पेक्ट्रम खरीदे। हाल ही में सरकार स्पेक्ट्रम के कारोबार की राह आसान की है। ऐसे में रिलायंस जियो के लिए अन्य कंपनियों से स्पेक्ट्रम खरीदना आसान हो गया है। स्पेक्ट्रम बेचने वालों में एक नाम अनिल अंबानी की कर्ज में लदी रिलायंस कम्युनिकेशंस का हो सकता है। एक बार ऐसा हो जाने के बाद कंपनी अपनी सेवाएं शुरू कर सकती है।

सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया अथवा सीओएआई ने दो तकनीकी बिंदु उठाए हैं जो 800 मेगाहट्र्ज बैंड में स्पेक्ट्रम साझेदारी से संबंधित हैं। इस बैंड में रिलायंस कम्युनिकेशंस का स्पेक्ट्रम नियंत्रित है। यह स्पेक्ट्रम तयशुदा कीमत पर दिया गया था। अब अगर वह इस स्पेक्ट्रम को रिलायंस जियो को बेचना चाहती है तो इसे नियंत्रणमुक्त करना होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो उसे इस वर्ष के आरंभ में नीलामी के वक्त निर्धारित कीमत और आवंटन के वक्त की कीमत के बीच के अंतर की भरपाई करनी होगी।

सीओएआई का कहना है कि कम से कम 12 दूरसंचार सर्किलों में गत नीलामी में चुकाई गई कीमत स्पेक्ट्रम के वास्तविक मूल्य के अनुरूप नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन सर्किल में नीलामी के लिए रखा गया स्पेकट्रम 5 मेगाहट्र्ज से कम था। यह मात्रा 4जी लाइट जैसी नई सेवा शुरू करने के लिहाज से उपयुक्त नहीं। यही वजह है कि कंपनियों ने इसके लिए जमकर बोली नहीं लगाई। सीओएआई के मुताबिक यही वजह थी कि स्पेक्ट्रम की अंतिम कीमत आरक्षित मूल्य का 1.29 गुना ही रही। इसके विपरीत जिन 10 सर्किल में स्पेक्ट्रम ज्यादा था वहां कीमत आरक्षित मूल्य के 2.06 गुने से भी अधिक रही। ऐसे में उक्त 12 क्षेत्रों के स्पेक्ट्रम के लिए और धनराशि दी ही जानी चाहिए।

यह बहुत रोचक मसला है और इस पर करीबी निगाह रखने की जरूरत है। कम अभिरुचि वाले इन 12 सर्किलों में महाराष्ट्र भी शामिल है जहां अंतिम कीमत आरक्षित मूल्य का 2.36 गुना रही। दिल्ली में यह 1.37 गुना रही। जिन 10 सर्किलों को उच्च अभिरुचि वाला बताया गया है उनकी बात करें तो बिहार में यह आरक्षित मूल्य का 1.01 गुना, जम्मू कश्मीर में 1.01 गुना तथा हिमाचल प्रदेश में 1.03 गुना रही। क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि अंतिम कीमत का संबंध मांग और आपूर्ति से हो सकता है, न कि स्पेक्ट्रम के आकार से?

कई और सवालों के जवाब जरूरी हैं। ऐसे में क्या यह कहना विचित्र नहीं है कि नीलामी में निर्धारित कीमत बाजार कीमत नहीं थी? नीलामी के इतने महीनों बाद इस मसले को उठाने का क्या तुक है? स्पष्टï है कि दूरसंचार विभाग के लिए यह पूरी प्रक्रिया आसान नहीं रहने वाली। सीओएआई ने इस मामले को केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद तक पहुंचा दिया है। अब गेंद उनके पाले में है।

सीओएआई ने जो दूसरा मसला उठाया वह भी तकनीकी ही है। दूरसंचार क्षेत्र के लिए फरवरी 2014 में घोषित विलय एवं अधिग्रहण कहती है कि एक ऑपरेटर किसी एक बैंड में 25 फीसदी से अधिक स्पेक्ट्रम और एक सर्किल में 50 फीसदी से अधिक स्पेक्ट्रम नहीं रख सकता। 800 मेगाहट्र्ज के स्पेक्ट्रम के मामले में 10 मेगाहट्र्ज की सीलिंग है। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि चुनिंदा कारोबारियों वाले इस बैंड में कुछ समावेशन आए।

सीओएआई का कहना है कि 10 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम कुल स्पेक्ट्रम के 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता है। लेकिन उसका यह भी कहना है कि सभी 22 सर्किल में पहले से मौजूद कारोबारियों के पास 10 मेगाहट्र्ज (800 मेगाहट्र्ज के बैंड में) से अधिक स्पेक्ट्रम मौजूद है। यह कुल तरंगों के 62 से 80 फीसदी तक है। दूरसंचार विभाग को इस मसले पर भी स्थिति स्पष्टï करनी होगी। मामला यहां भी आसान नहीं है।  सीओएआई ने यह मसला अभी क्यों उठाया? दरअसल सीओएआई ने दूरसंचार विभाग को लिखे एक पत्र में कहा था कि उसके एक सदस्य ऑपरेटरों में से एक उपरोक्त मामलों में भिन्न राय रखता है। इसके बाद कल्पना करने को कुछ खास नहीं रह जाता।

Keyword: mukesh ambani, mobile, telephone, reliance,,
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