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नदिया: खुले में शौच से मुक्त स्वच्छ भारत की पेश की मिसाल
कमलिका घोष /  September 24, 2015

प्राचीन समय से ही नदिया ने सफाई एवं स्वच्छता को काफी अहमियत दी है। जिले में बहुत से गांव नामाशुद्रों के हैं, जो बांग्लादेश के खुलना, फरीदपुर और जेस्सोर क्षेत्रों से आए हैं। वे मतुआ समुदाय से संबंधित हैं, जिसकी सामाजिक सुधारों और शिक्षा में अहम भूमिका रही है। इस समुदाय का सफाई एवं स्वच्छता में हमेशा से विश्वास रहा है, इसलिए नदिया का भारत में खुले में शौच मुक्त पहला जिला बनना आश्चर्यजनक नहीं है।

पिछले साल अक्टूबर में पश्चिम बंगाल सरकार राज्य सरकार द्वारा संचालित सभी स्वच्छता कार्यक्रमों को मिशन निर्मल बांग्ला के तहत लाई थी। इस परियोजना के लिए वित्तीय मदद केंद्र के स्वच्छ भारत अभियान के तहत राज्यों की स्वीकृत योजनाओं के तहत मिल रही है। एक साल से भी कम समय में नदिया खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) प्रमाणपत्र हासिल करने वाला देश का पहला जिला बन गया है।

जिले के दूर-दराज का एक गांव बगुला आपको सरकार के स्वच्छता मिशन की झलक दिखलाता है। तुलनात्मक रूप से वित्तीय रूप से सक्षम परिवारों के पास पहले ही अपने आवास के बाहर एक शौचालय था। एक ग्रामीण का कहना है कि यह हमने बनाया है, सरकार द्वारा बनाए गए शौचालय सड़क के दूसरी तरफ हैं। इसका पता क्षेत्र के पंचायत कार्यालय से भी चलता है। बगुला 2 के पंचायत अधिकारी ने बताया, 'ज्यादातर आदिवासी बगुला 1 में आते हैं। परियोजना के तहत बनाए गए ज्यादातर शौचालय वहां मिलेंगे।'

बगुला 1 से बगुला 2 की दूरी करीब पांच मिनट की है। लेकिन उसकी तस्वीर बिल्कुल अलग है। बगुला 1 में ज्यादातर आदिवासी हैं और वहां राज्य सरकार की योजना के तहत ज्यादातर शौचालय गांव के किनारे पर बने हैं। बगुला 1 ग्राम पंचायत के प्रधान कुणाल बिस्वास ने बताया, 'बगुला 1 में ही 2,290 शौचालय हैं, जिनका निर्माण निर्मल बांग्ला परियोजना के तहत किया गया है।'

गांव के दौरे से प्रधान के दावे की पुष्टि होती है। गलियों के दोनों तरफ शौचालय बने हुए हैं और बहुत सी जगहों पर एक से ज्यादा शौचालय हैं। स्वच्छता की जरूरत न केवल व्यस्क लोगों के दिमाग में पैठ बनाए हुए है बल्कि गांव के युवा बच्चे भी स्वच्छता को लेकर इतने ही जागरूक हैं। तीन बच्चों की एक मां कहती हैं, 'हमारे बच्चे भी हमारे लिए बनाए गए शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं। मैं अपने 6 साल के बच्चे को खुले में शौच नहीं करने देती और वह भी जानता है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए।' यह कार्य आसान नहीं था। ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति जागरूक बनाने के लिए योजना बनाने और अभियान में कई साल लग गए।

लोगों को खुले में शौच की आदत छोडऩे की खातिर राजी करने के लिए गांव के स्कूलों और विभिन्न स्वयं सहायता समूहों की मदद ली गई। जिला परिषद के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट दीपंजन भट्टाचार्य ने बताया, 'हमने अभियान में अनोखे तरीके अपनाए। उदाहरण के लिए हर सोमवार को गांव के बच्चे खुले में शौच न करने की शपथ लेंगे।' वह कहते हैं कि योजना के तहत पूरे जिले में करीब 3,35,000 शौचालय बनाए गए हैं।

किसी भी परियोजना की सफलता और असफलता उसकी एक समयावधि में निरंतरता पर ज्यादा निर्भर करती है। इसे सफल बनाने के लिए प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग फिर से पुरानी आदतों को न अपनाने लगें। इसका पता लगाने के लिए प्रशासन एवं पंचायत कुछ तरीके अपना रही हैं। इसमें एक 'पारा नजरदारी कमेटी' बनाना है। इस समूह के सदस्य (पंचायत सदस्य एवं ग्रामीण शामिल होते हैं) नियमित रूप से गांवों पर नजर रखते हैं और यह देखते हैं कि क्या कोई खुले में शौच करता है।

भट्टाचार्य ने बताया कि परियोजना लागू करने के बाद शुरुआती नतीजे अच्छे रहे हैं। जलजनित बीमाारियों में तेजी से कमी आई है। कुपोषण का स्तर भी घटा है। वह कहते हैं,'वर्ष 2014-15 के लिए अभी स्वास्थ्य संकेतकों का विश्लेषण नहीं किया गया है। हम यह बहुत जल्द करेंगे और उम्मीद करते हैं कि ये आंकड़े हमारे सामने वास्तविक तस्वीर पेेश करेंगे।'

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