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'नेताजी' की फाइलों पर राजनीतिक रंग
आदिति फडणीस /  September 20, 2015

सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी 64 गोपनीय फाइलें सार्वजनिक कर दी गईं हैं जिसके 12,000 पन्नों में उनकी गतिविधियों का जिक्र है। 'टाइगर ऑफ बंगाल' कहे जाने वाले सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी इन फाइलों से यह भी अंदाजा होता है कि भारत को स्वतंत्रता आंदोलन, बोस की भूमिका और जर्मनी में उनकी गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है जहां वह मित्र राष्ट्रों के खिलाफ जर्मनी के नेतृत्व वाले धुरी राष्ट्र के साथ बातचीत कर रहे थे ताकि भारत की आजादी के लिए मदद मिल सके। हालांकि इन फाइलों से इस बात की पुष्टि होती है कि बोस की मृत्यु विमान दुर्घटना में हो गई क्योंकि इसमें उनकी साझेदार/पत्नी एमिलि शेंकिल द्वारा मई 1946 में बोस के भाई को लिखी गई एक चि_ïी भी शामिल है जिसमें वह अपना दुख भी जाहिर करती हैं। यह चि_ïी बोस को ले जा रहे विमान के कथित तौर पर दुर्घटनाग्रस्त होने के कुछ महीने बाद लिखी गई थी। इन फाइलों की कुछ टिप्पणियों से बोस के व्यक्तित्व और काम से जुड़ी कुछ और नई जानकारियां मिलती हैं। हालांकि फाइलों को सार्वजनिक करने की भी अपनी राजनीति है जो फाइलों की तरह ही दिलचस्प है। बोस ने जिस राजनीतिक दल, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एआईएफबी) की स्थापना की थी वह 30 सालों से भी ज्यादा वक्त तक वाममोर्चा की सरकार का हिस्सा थी। यह अब तक गठबंधन का हिस्सा है और इस पार्टी ने अपनी प्रतिद्वंद्वी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के फाइलों को सार्वजनिक करने के फैसले का स्वागत किया।

इस अनकहे सवाल को अब बनर्जी पूछ रही हैं, 'फॉरवर्ड ब्लॉक ने जिस वाम मोर्चा के साथ 30 सालों तक साझेदारी की आखिर उसने इन फाइलों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया।' ऐसा करते हुए बनर्जी साफतौर पर बोस की विरासत को माकूल बनाने की कोशिश कर रही हैं। इस तरह वह बोस को भी बंगाल के नेता के तौर पर स्वीकार कर रही हैं। फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना से पहले बोस 1920 और 1930 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्रवादी धड़े के नेता रहे थे और वह 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

फाइलों को गोपनीयता के दायरे से हटा कर सार्वजनिक करने के साथ ही बनर्जी बंगाल में दूसरे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी निशाने पर ले रही हैं। कांग्रेस के लिए यह शर्मिंदाजनक स्थिति है कि पार्टी के प्रतिद्वंद्वी उस व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के तथ्यों को उजागर कर रहे हैं जो कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी समान रूप से ही इस घेरे में हैं। जो फाइलें केंद्र सरकार के पास थीं उन्हें सार्वजनिक न करने और उस नेता के जीवन के राज को गोपनीय रखने की कोई विश्वसनीय वजह भाजपा के पास भी नहीं है जिनकी तारीफ करने का दावा भाजपा करती है और उन्हें सरदार पटेल के बराबर मानती है।

हैदराबाद में संसदीय मामलों के मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा, 'पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी से जुड़ी कुछ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया है। यह अच्छा है। केंद्र सरकार इस तरह का कोई भी फैसला करने से पहले इसका अध्ययन करने की जरूरत को समझती है क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, दूसरे देशों, पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंधों पर पड़ता है।' उन्होंने आगे कहा, 'मैं निजी तौर पर यह महसूस करता हूं कि देश के लोगों का यह अधिकार है कि वे नेताजी के मसले की हकीकत को जानें। सरकार भी इसके बारे में सोचेगी और यह फैसला करेगी कि कब और कैसे इसे किया जा सकता है।'

भाजपा के दूसरे नेताओं का दावा है कि इस मसले पर नरेंद्र मोदी की तरह कोई भी प्रधानमंत्री इतना सक्रिय नहीं हुआ था। उनका कहना है कि भाजपा ने ही अप्रैल में कैबिनेट सचिव के नेतृत्व में एक पैनल बनाया था ताकि वह इस बात की समीक्षा कर सके कि केंद्र सरकार के पास मौजूद बोस की फाइलों को जारी किया जा सकता है या नहीं। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ नाथ सिंह जो बंगाल के प्रभारी भी हैं वह बनर्जी को चेतावनी देते हैं कि फाइलों को सार्वजनिक करने के मुद्दे को कोई राजनीतिक रंग न दें। उनका कहना है, 'अपने वादे पूरा करने का भाजपा का लंबा रिकॉर्ड रहा है। हाल में ही भाजपा की सरकार ने 'वन रैंक वन पेंशन' के मसले पर अपना वादा पूरा किया है। हमें ममताजी या किसी और से कोई सबक लेने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय तृणमूल कांग्रेस को अपने अधूरे वादों पर गौर करना चाहिए क्योंकि अगले साल पश्चिम बंगाल में इसे चुनाव में उतरना है।'

जब भाजपा विपक्ष में थी तब राजनाथ सिंह ने कटक में एक यात्रा के दौरान बोस की सभी फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग की थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद केंद्र ने ऐसे खुलासे के लिए आरटीआई आवेदन लेने से मना कर दिया था। इसके लिए केंद्र सरकार ने विदेशी देशों के साथ भारत के मित्रतापूर्ण हितों का हवाला दिया था। सिद्धार्थ नाथ सिंह ने यह तर्क दिया कि बंगाल की फाइलों और केंद्र की फाइलों में प्रमुख अंतर है। वह कहते हैं, 'पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा रखी गई ज्यादातर फाइलें कांग्रेस सरकार द्वारा कलकत्ता में नेताजी के परिवार के सदस्यों की कराई गई जासूसी पर आधारित है जबकि केंद्र के पास मौजूद फाइलों का संबंध चार देशों से है।' सिंह का कहना है कि केंद्र ने एक पैनल बनाकर वर्गीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री ने जर्मनी और भारत में बोस के परिवार से मुलाकात की है। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री कार्यालय ने नेताजी के परिवार के सदस्यों को एक बैठक के लिए बुलाया था।'

 गोपनीय पत्रों को सार्वजनिक करना हमेशा से मौजूदा राजनीति के ऐतिहासिक प्रमाणीकरण का एक स्त्रोत रहा है। अब अगर विकिलीक्स विवाद को ही लें तो इससे संप्रभु राष्ट्रों के रिश्तों में जटिलताएं बढ़ीं। इसी तरह 1990 के दशक की शुरुआत में मित्रोखिन पेपर्स जारी होने से भारत के कुछ प्रमुख वाम नेताओं और नौकरशाहों की विश्वसनीयता पर अविश्वास बढ़ा। इन खुलासे से सरकार भी सकते में आ गई। उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में विपक्ष ने जांच की मांग की। इस तरह के खुलासे ने उन दिनों की राजनीति को एक आकार देने में अपना योगदान दिया। 

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