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विभिन्न वर्गों की मांगे हैं भारी जिन पर सरकार की लाचारी
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  September 13, 2015

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को पिछले दिनों तीन कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहला, पूर्व सैनिकों की एक रैंक, एक पेंशन की मांग, दूसरी पटेलों की आरक्षण की मांग और तीसरी संसद में बाधा। सरकार पहली मांग के सामने हथियार डाल चुकी है। शेष मसलों की बात करें तो ऐसा लगता नहीं है कि सरकार के पास सही कदम उठाने की ताकत है। विपक्ष भी उसे रोकने की पूरी कोशिश में लगा हुआ है। क्या यहां से कोई राह निकलती है? इसका जवाब हां और ना दोनों ही तरह से दिया जा सकता है।

पेंशन की मांग न केवल आर्थिक लिहाज से अव्यवहार्य है बल्कि वह देश की एक बहुत बड़ी आबादी के साथ भी अन्याय है जिसे पेंशन मिलती ही नहीं। समानता की बात तो छोड़ ही दी जाए। अब जबकि पूर्व सैनिकों को मुंहमांगी मुराद मिल गई है तो वही मांग देश के अन्य सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की ओर से भी सामने आएगी। यह केंद्र में भी होगा और राज्यों में भी। रेल कर्मचारियों के संगठन पहले ही ऐसा कर चुके हैं। भविष्य में सरकार के वित्तीय संसाधनों पर भारी दबाव पडऩे की आशंका है। जिसका बहुत नकारात्मक असर होगा।

साफ कहा जाए तो ऐसे सभी लोगों को पेंशन देने की सख्त आवश्यकता है जिन्होंने अपने कामकाजी वर्षों में जमकर मेहनत की है। खासतौर पर तब जबकि वे गरीब हों। आखिर किसी भूमिहीन श्रमिक या घरेलू सहायिका को न्यूनतम पेंशन क्यों नहीं मिलनी चाहिए ताकि वह अपनी जिंदगी के आखिरी वर्ष सम्मान के साथ बिता सके? आखिर सरकारी नौकरी करने वालों, सेना या अन्य लोगों को अधिक पेंशन क्यों मिलनी चाहिए? केंद्र सरकार की गरीबों के लिए पेंशन योजना (गरीबी रेखा के नीचे), इंदिरा गांधी द्वारा शुरू की गई वृद्घावस्था पेंशन योजना के तहत वर्ष 2014 तक 1.97 करोड़ लोग लाभान्वित हो रहे थे। यह तब था जब 60 वर्ष से अधिक उम्र वालों की संख्या 3 करोड़ से ऊपर थी। यानी देश की अत्यंत गरीब आबादी में से एक तिहाई को कोई पेंशन नहीं मिलती। पेंशन पाने वालों को भी मात्र 200 रुपये प्रति माह की राशि ही मिलती है जबकि कुछ राज्य सरकारें अतिरिक्त राशि भी देती हैं। वर्ष 2014 में सरकार पर इस योजना की लागत 9,100 करोड़ रुपये थी जबकि पूर्व सैनिकों की मांग के कारण साालना 10,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।

यह कहा जा सकता है कि देश के सर्वाधिक गरीब एक करोड़ लोगों को एक न्यूनतम पेंशन तो मिलनी ही चाहिए क्योंकि सरकारी अधिकारियों को अच्छी खासी पेंशन मिल रही है। पूर्वसैनिकों का मामला खासतौर पर अलग है क्योंकि उनमें से अधिकांश युवावस्था में ही सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इसके बाद उनका अपने जीवन के आखिर तक अच्छी खासी पेंशन पाना जरूरी है। ऐसे में उनके पुनर्रोजगार की व्यवस्था को मजबूत बनाना कहीं अधिक आवश्यक है। निजी क्षेत्र से यह पूछा जाना चाहिए कि वह पूर्व सैनिकों की भर्ती के मामले में अपने बही खाते को उसी तरह खंगाले जैसे अब उनकी नौकरियों में लैंगिक समानता का जोर और दबाव लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पूर्व सैनिकों के लिए एक रैंक एक पेंशन का वादा कांग्रेस ने भी किया और भाजपा ने भी जबकि दोनों को ऐसा नहीं करना चाहिए था।

पटेलों की आरक्षण की मांग और उसे लेकर होने वाला हो हल्ला जाटों के आरक्षण आंदोलन की याद दिलाता है। दोनों ही पिछड़ों में अगड़े हैं और आजाद भारत में उनको कभी किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। आरक्षण के लिए या उसके खिलाफ होने वाली बातों तथा उठाए जाने वाले सख्त कदमों के बारे में सभी जानते हैं लेकिन वंचित समुदायों के लिए भी मदद का हाथ अनंतकाल तक तो नहीं बढ़ाया जा सकता है। खासतौर पर यह देखते हुए कि कई लोग ऐसे हैं जिनके पास सरकार में या संगठित क्षेत्र में बढिय़ा नौकरी है। ऐसे लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर निकालने की आवश्यकता है। परंतु कोई बड़ा राजनीतिक दल इस डर से यह फैसला नहीं करता है कि चुनावों के दौरान इसका बुरा असर होगा।

आखिर में बात करते हैं संसद में गतिरोध की। इससे केवल भारतीय लोकतंत्र की छवि ही नहीं प्रभावित हो रही है बल्कि अगर संसद को इसी तरह बाधित किया जाता रहा तो भारतीय गणतंत्र का आधार ही हिल जाएगा। दुर्भाग्यवश इस समय कांग्रेस भी विपक्ष में वही कर रही है जो भाजपा अपने दौर में किया करती थी। अगर दोनों प्रमुख दलों में से किसी एक ने भी सही फैसला किया होता तो तीनों समस्याएं सुलझाई जा सकती थीं। सरकार ने पेंशन और आरक्षण की मांग को ठुकरा दिया होता और कांग्रेस ने संसद को बाधित करना बंद कर दिया होता तो यह संभव था लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि एकमत से निर्णय लेना राजनीतिक दृष्टिï से व्यवहार्य नहीं लग रहा।

अगर दोनों प्रमुख राजनीतिक दल एक समान एजेंडे पर सहमत हो जाएं तो इस कमी को भी दूर किया जा सकता है। भाजपा और कांग्रेस को एक साथ सामने आकर कहना चाहिए कि एक रैंक एक पेंशन का वादा करना गलत था, पटेलों या जाटों को आरक्षण नहीं मिलेगा और संसद को बाधित नहीं किया जाएगा। सत्तापक्ष को संवाद शुरू करना चाहिए और विपक्ष को उसका जवाब देना चाहिए। लेकिन दोनों दलों के बीच के रिश्ते अभूतपूर्व रूप से कटु बने हुए हैं। संसद में गतिरोध को लेकर विपक्ष के साथ हुए संवाद को भी अगंभीर करार दिया गया।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नरेंद्र मोदी और उनकी टीम में की ख्वाहिश, कर्ता की भूमिका में रहने की है। सत्ता का केंद्रीकरण करने की खुली चाह उनकी पहचान है। निजी तौर पर मोदी की बात करें तो गुजरात में उनके शासनकाल को एकहद तक निष्ठïुरता के लिए भी जाना जाता है। ऐसे में उनकी छवि सांमजस्य बिठाने और समझौते करने वाले व्यक्ति की नहीं है। यह सारा कुछ आरएसएस के मूल्यों के अनुरूप ही है जहां सत्ता का केंद्रीकरण और शक्ति में विश्वास अहम हैं। समायोजन की बात करें तो वह वाजपेयी की छवि से मेल खाती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि समस्या का हल तो है लेकिन...

Keyword: OROP, ex army, narendra modi,,
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