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संविधान के इस प्रावधान से कमजोर पड़ती कमान
टीसीए श्रीनिवास राघवन /  September 07, 2015

भारतीय संविधान का एक प्रावधान औद्योगीकरण की राह को कुंद करने का काम कर रहा है। इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डाल रहे हैं टीसीए श्रीनिवास राघवन

औद्योगीकरण की राह को रफ्तार देने की नरेंद्र मोदी सरकार की कोशिशों में एक और बाधा सामने आ गई है। इस बार यह अवरोध मजदूरों और उनके मजदूर संगठनों की ओर से खड़ा किया गया है। 2 सितंबर को इन मजदूर संगठनों के करोड़ों सदस्यों ने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 5बी और ठेका मजदूर अधिनियम में प्रस्तावित सुधारों के विरोध में हड़ताल में हिस्सा लिया।

यह संभवत: शुरुआत भर है क्योंकि मजदूर संगठनों ने देखा है कि जब भी राह मुश्किल होती नजर आती है तो नरेंद्र मोदी कदम पीछे खींच लेते हैं। स्वाभाविक है कि वे अपने हकों में किसी भी तरह की कटौती का विरोध करेंगे, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण तो उन प्रतिष्ठïानों का पैमाना तय करने को लेकर है, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम के दायरे में आएंगे। सरकार उनकी संख्या घटाने की कोशिश कर रही है।

किसी अन्य की तुलना में मजदूर संघ अर्थशास्त्रियों को कहीं अधिक उत्तेजित करते हैं। वे कहते हैं कि श्रम बाजार में अडिय़ल रुख बाजार से निवेश को दूर रखता है। वे कई दशकों से ऐसा कहते आ रहे हैं। अब यह काफी उबाऊ हो चला है।

इस प्रकार, तकरीबन छह वर्ष पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने दो युवा प्रवासी भारतीय अर्थशास्त्रियों द्वारा दिए जाने वाले प्रस्तुतिकरण में उनके नजरिये को सुनने के लिए कुछ लोगों को आमंत्रित किया। तब से वे दोनों आर्थिक नीति प्रतिष्ठïान में और ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते गए। प्रस्तुतिकरण का मर्म वही था, जैसी कि उससे उम्मीद थी। उन्होंने भारतीय श्रम कानूनों को 'गुजरे जमाने' का करार देते हुए उन कानूनों में बदलाव की मांग की। मैंने उनसे सवाल किया कि क्या उन्होंने भारतीय संविधान, मजदूर संगठन अधिनियम और औद्योगिक विवाद अधिनियम को पढ़ा है। उन्होंने जवाब दिया-नहीं। इसलिए आगे उनसे यह पूछने का सवाल ही नहीं उठता था कि उन्हें किसमें कितना सुधार चाहिए। मुझे अपनी हल्की भूरी आंखों को घुमाकर ही संतुष्टï होना पड़ा।

वही पुराना राग

तकरीबन एक साल बाद एक और प्रवासी भारतीय अर्थशास्त्री, जो अब और महत्त्वपूर्ण हो गए हैं, ने एनसीएईआर संस्थान में अगर बहुत सारगर्भित नहीं तो उसी विषय पर अपना पक्ष रखा। भारतीय मजदूरों को जो अधिकार मिले हुए थे, उन्हें लेकर वह इतने बिफरे हुए थे मानो बोलते-बोलते उनके मुंह से झाग आने को तैयार हो। मैंने उनसे भी वही सवाल दोहराया। क्या आपने भारत का संविधान, मजदूर संगठन अधिनियम और औद्योगिक विवाद अधिनियम पढ़ा है। उन्होंने जवाब दिया-हां।
मैंने सवाल किया कि तो फिर आप बताइए कि किस मोर्चे पर आपको सुधार की जरूरत महसूस होती है। पेचीदगी भरे अंदाज में उन्होंने जवाब दिया कि दरअसल मेरे जैसे लोग ही सुधारों की राह में बाधक बने हुए हैं और उनके जैसे लोग सुधारों के सूत्रपात को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम की खामियों को जानते हैं। अफसोस की बात है कि उन्होंने संविधान और मजदूर संघ अधिनियम के बारे में ऐसा दावा नहीं किया, जो मुख्यत: प्रक्रियाओं को लेकर है।
फिर दो वर्ष पहले एक अन्य मंच पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व उपाध्यक्ष ने भी कमोबेश वही बातें दोहराईं। मगर उन्होंने बेहद शालीनता और घुमा फिराकर अपना पक्ष रखा और उनमें उन आक्रामक भावावेश का अभाव था, जिसके बारे में कुछ प्रवासी भारतीय अर्थशात्रियों का मानना है कि जब वे भारतीय श्रोताओं से रूबरू हो रहे हों तो उन भावों का प्रदर्शन करना लाजिमी है।

मुझे उनसे यह सवाल करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि क्या उन्होंने संविधान, मजदूर संगठन अधिनियम और औद्योगिक विवाद अधिनियम पढ़ा है। निश्चित रूप से उन्होंने पढ़ा होगा। फिर भी वह उन बातों को दोहराकर खुश थे जो अब लगभग एक परंपरागत बुद्घिजीवी धारणा बन गई है कि श्रम सुधारों में सुधार की शिद्दत से दरकार है। हालांकि मैंने उनसे वह सवाल जरूर किया कि उन्हें किस स्तर पर सुधार की जरूरत लगती है। अगर उनके जवाब को परीक्षा में लिखा जाता तो उसके लिए उन्हें 33 फीसदी अंक मिलते क्योंकि वह उसी स्तर तक उसे सही पकड़ पाए थे। उन्होंने ऐसे कोई संकेत भी नहीं दिए कि उन्हें शेष 66 फीसदी का कोई अंदाजा भी था।

इसलिए मुझे यह समझाने दीजिए कि उस शेष दो तिहाई में क्या-क्या आता है। यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि श्रम कानून सुधारों का मसला बुनियादी रूप से आर्थिक नहीं है जैसा कि अर्थशास्त्रियों को लगता है। यह पूरी तरह से राजनीतिक और यहां तक कि दार्शनिक मुद्दा है। मतदाताओं के रूप में राजनीतिक पहलू तो सभी के सामने स्पष्टï है। कोई भी राजनीतिक दल कर्मचारी संगठनों के सदस्यों और उनके परिवारजनों के भारी मतों को गंवाना नहीं चाहेगा। सरकारी कर्मचारियों को अनुशासित करने के फेर में पिछले 20 वर्षों के दौरान दो मुख्यमंत्री बुरी तरह मुंह की खा चुके हैं। उनमें से एक ने 1990 के दशक के मध्य में हिमाचल प्रदेश में यह अनुभव किया तो दूसरे का इस अनुभव से सामना एक दशक पहले तमिलनाडु में हुआ।

ढांचागत खामियां

इसका दार्शनिक पहलू और भी ज्यादा जटिल है क्योंकि उसका संबंध संवैधानिक अधिकारों से है। संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (सी) मूल अधिकार के तौर पर मजदूर संगठन गठित करने की इजाजत देता है। इस प्रकार हमारे पास मजदूर संगठन अधिनियम है, जो इन कर्मचारी संगठनों के गठन और परिचालन के लिए प्रक्रियाएं निर्धारित करता है। हालांकि कोई भी कर्मचारी संगठन गठित करने के लिए आपको नेता की दरकार होती है। सभी नेता अपने सदस्यों को ज्यादा से ज्यादा फायदों का सब्जबाग दिखाते हैं। लेकिन अगर फायदों या पात्रता की परिभाषा की बात करें तो ये किसी न किसी की कीमत पर ही मिलते हैं, इस मामले में यह नियोक्ताओं की कीमत पर मिलना है।

इससे विवाद पैदा होते हैं। फिर औद्योगिक विवाद अधिनियम की बारी आती है। मगर इसमें तीन भारी विरोधाभास भी हैं। एक तो यही कि मुख्यधारा की तमाम राजनीतिक पार्टियां केवल चुनावी फायदे के लिए पूंजीपति नियोक्ताओं से रकम लेती हैं और मजदूरों के अधिकारों में बढ़ोतरी करती हैं। दूसरी स्थिति यही होती है कि चुनाव जीतने के बाद नेताओं पर चंदा देने वाले पूंजीपतियों का दबाव बढ़ जाता है कि वे अनुच्छेद 19 (1) (सी) का दायरा सीमित करें लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि यह मूल अधिकार का मामला है। तीसरा इन दोनों विरोधाभासों का नतीजा है: यही कि सरकार किसानों और अफसरशाहों जैसे कम उत्पादक वर्गों के लिए पात्रताओं का विस्तार करती है, जबकि श्रमशक्ति के अधिक उत्पादक हिस्से यानी औद्योगिक मजदूरों के अधिकारों को सीमित करती है। यह सब अनुच्छेद 19 (1) (सी) की वजह से होता है। अगर आप इसे बेदखल करना चाहते हैं और आपमें ऐसा करने की हिम्मत तो खुलकर कहिए। अगर हिम्मत नहीं है, तो चुप रहिए, और काम करिए।

Keyword: labour unions, strike, labour reforms, banking and road transport,,
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