बिजनेस स्टैंडर्ड - ओआरओपी के प्रभाव!
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ओआरओपी के प्रभाव!
संपादकीय /  September 07, 2015

सरकार ने एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) योजना की घोषणा कर दी है। इससे यह तय होगा कि सेना के सभी पेंशनभोगी सेवानिवृत्त सदस्यों को उसी हिसाब से पेंशन मिलेगी जिस पद पर से वे सेवानिवृत्त हुए थे। फिर चाहे सेवानिवृत्ति का वर्ष जो भी रहा हो। अब तक क्रमश: सन 1990 और 2010 में सेवानिवृत्त होने वाले सेना के दो मेजरों की पेंशन में भारी अंतर होता था। निस्संदेह ओरआरओपी एक भावनात्मक मुद्दा था यही वजह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान में बारबार इसका उल्लेख किया और वादा भी। यह मुद्दा कुछ ऐसा बन गया है मानो नागरिक प्रशासन सशस्त्र बलों को उनका बकाया नहीं दे रहा है। यही वजह है कि सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी लगातार इसे लेकर विरोध प्रदर्शन करते रहे। यह भी सच है कि उच्चतम वेतनमान पर सेवानिवृत्त होने वाले सभी (प्रशासनिक सेवा, विदेश सेवा और सशस्त्र बलों के उच्चाधिकारी भी) पहले से ही ओआरओपी का लाभ ले रहे हैं। यह निर्णय बहुत साल पहले लिया गया था। ऐसे में यह घोषणा होनी ही थी। एक बार जब इसका वादा कर लिया गया और पहले ही शीर्षपदस्थ लोग इसका लाभ उठा रहे हैं तो सरकार पीछे नहीं हट सकती थी।

इसके राजकोषीय निहितार्थ अनिश्चित हैं लेकिन उनकी गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री ने रविवार को फरीदाबाद में अपनी सभा में कहा कि इससे करीब 8000-10,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। इसमें कई कारकों को शामिल नहीं किया गया है। सालाना अनुमान में वार्षिक वृद्घि शामिल नहीं है जबकि वह काफी अधिक हो सकती है। इतना ही नहीं सेना के कर्मी निरंतर जल्द सेवानिवृत्त होते रहते हैं। इसका अर्थ हुआ कि किसी भी समय बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी सामने आ सकते हैं। इससे राजकोषीय बोझ का बढऩा लाजिमी है। कुछ अनुमानों के मुताबिक इससे सैन्य बलों की मौजूदा पेंशन का बोझ दोगुना या तीन गुना तक हो सकता है। भारत विकास के जिस दौर में है उसमें उसे सहभागिता वाली पेंशन व्यवस्था की ओर बढऩा चाहिए, बजाय कि पात्रता के। नई पेंशन योजना (एनपीएस) के पीछे यही विचार था। एक के बाद एक कई सरकारें एनपीएस का विस्तार सेना तक करने में विफल रही हैं।

सरकार की वित्तीय स्थिति पर और अधिक बोझ पड़ेगा क्योंकि इस मांग में रियायत बख्शी गई है। खासतौर पर जोरदार विरोध प्रदर्शन के बाद। इससे अन्य समूहों को बल मिलेगा और वे भी ऐसी मांग करेंगे? अन्य सशस्त्र बल भी ऐसी मांग उठाएंगे। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल जैसा अद्घ्र्रसैनिक बल ऐसा करने वालों में अग्रणी होगा। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा चुनावी वादा कर दिए जाने के बाद तो ऐसा होना अनिवार्य ही था और अब सरकार ने राजकोषीय टाइम बम पर हाथ रख दिया है। अब अगर सातवें वेतन आयोग के कारण पड़ऩे वाले बोझ को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो वेतन भत्तों और ओआरओपी पेंशन जवाबदेही के बाद राजकोषीय चुनौती और अधिक कठिन हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिस समय ऐसा लगने लगा था कि देश की राजनीतिक चिंताओं को सीमित कर लिया गया है, ठीक उसी वक्त सरकार ने हालात को नियंत्रण से बाहर हो जाने दिया। जो नुकसान होना था वह हो चुका है। अब सरकार को राजनीतिक प्रबंधन कौशल का इस्तेमाल करके इस मांग को अन्य क्षेत्रों तक फैलने से रोकना चाहिए। एक अन्य विकल्प है एनपीएस जैसी भागीदारी वाली पेंशन योजना को सशस्त्र बलों के लिए लागू करना। वर्ष 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वाले नौकरशाह पहले ही इसका हिस्सा हैं। कम से कम ऐसा करने से भविष्य में सशस्त्र बलों की पेंशन के कारण पडऩे वाला बोझ सीमित होगा। बिना ऐसे विकल्पों को तलाश किए राजकोषीय स्थिरता के लक्षण ठीक नहीं दिखते।

Keyword: OROP, ex army, narendra modi,,
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