बिजनेस स्टैंडर्ड - खाद्य संरक्षा नियामक के नियमन पर उठते सवाल
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खाद्य संरक्षा नियामक के नियमन पर उठते सवाल
अर्णव दत्ता /  September 06, 2015

हर बार जब स्वाति अपने पड़ोस के स्टोर से नूडल, पास्ता, बिस्कुट या कोई भी दूसरा स्नैक्स खरीदती हैं तो वह अपनी संतुष्टिï के लिए पैकेट पर भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की मुहर जांचती है। जून में पूरे देश में नेस्ले की मैगी को लेकर मचे बवाल के बाद खाद्य नियामक की अनुमति और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है। नियामक ने मोनोसोडियम ग्लूटामेट और अतिरिक्त सीसा होने की वजह से नूडल्स को मानव उपभोग के लिए खतरनाक बताया था। हालांकि किसी भी खाद्य सामग्री को विनियामक की स्वीकृति से काफी लोगों को बल मिलता है, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि बाजार में हर बार उत्पाद पेश करने से पहले एफसएसएआई की मंजूरी लेनी जरूरी नहीं है, यह परिपाटी इंस्पेक्टर राज की याद दिलाती है। उनका तर्क है कि यूएसएफडीए जैसे अंतरराष्टï्रीय विनियामक खाद्य उत्पादों को मंजूरी नहीं देते हैं इसलिए एफएसएसएआई को क्यों ऐसा करना चाहिए? 

 
26 अगस्त को उच्चतम न्यायालय के एक आदेश का उल्लेख करते हुए आश्चर्यजनक रूप से एफएसएसएआई ने घोषणा की कि वह स्वीकृति देने का काम नहीं करेगा। तो क्या इसका मतलब है कि स्वाति जैसे लोगों को अब खाने पीने की चीजों के पैकेटों पर वह भरोसा नहीं मिलेगा जिसकी तलाश में वे रहते हैं? इतनी ही महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि क्या खानपान की कंपनियां बाजार में कोई भी उत्पाद विनियामक के पास गए बगैर जारी कर सकेंगी? कुछ दिनों तक तो ऐसा ही लगा। वर्ष 2013 के पहले उद्योग के प्रतिनिधि कहते थे कि किसी भी खाद्य कंपनी को विनियामक की अनुमति लेने की जरूरत नहीं। इसलिए उनका कहना है कि अगर एफएसएसएआई यह कहता है कि अब से उसके लिए खाद्य पदार्थों को मंजूरी देना संभव नहीं होगा तो इसमें कुछ भी असाधारण नहीं है। 
 
उनके इस नजरिये को उस वक्त और बल मिला जब बंबई उच्च न्यायालय ने नेस्ले को उसके मैगी नूडल्स के नमूनों का परीक्षण कराने के लिए छह हफ्तों का वक्त दिया और कंपनी को एक नया जीवनदान मिल गया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद एफएसएसएआई ने वापसी की। 31 अगस्त को नियामक ने एफएसएसएआई के लिए नियम बनाने के लिए कानूनी सहायता के लिए एक सार्वजनिक सूचना जारी की। इस सूचना के बाद भारत के खाद्य संरक्षा विनियामक की कानूनी स्थिति के बारे में लोग चकित रह गए। इसे भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) या केंद्रीय बिजली विनियामक आयोग (सीईआरसी) जैसे विनियामकों के मुकाबले अलग क्यों माना जा रहा है? जैसे ही एफएसएसएआई ने नेस्ले इंडिया के मैगी के कारोबार को बंद कराने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया वैसे ही क्यों न्यायालय ने एफएसएसएआई के पर कतर दिए? क्या खाद्य नियामक के पास इस क्षेत्र पर नजर रखने और इसे निर्देशित करने के पर्याप्त अधिकार हैं?  क्या यह क्षेत्र परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाओं की कमी, पर्याप्त कुशल मानव संसाधन और बेहतर कानूनी ढांचे की कमी के बावजूद ऐसे किसी नियामक के बगैर अच्छी तरह काम कर सकता है? वर्ष 2011 में बने एफएसएसएआई को खाद्य संरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 को लागू कराने का काम सौंपा गया। 
 
अधिनियम के तहत इसे खाद्य पदार्थों के विनिर्माण और बिक्री पर नजर रखने और विनियमन करने, खाद्य उत्पादों के लिए मानक तय करने और उन्हें लागू करने, खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले पदार्थों और भारी धातुओं की सीमा तय करने, लेबलिंग के मानक तय करने, पदार्थों को बाजार से वापस मंगाने से संबंधित दशाएं और दिशा निर्देश तय करने, खाद्य उत्पाद जुटाने और उनका निरीक्षण करने का अधिकार दिया गया। विभिन्न प्रकार की सलाह या दिशा निर्देश जारी करने की जिम्मेदारी एफएसएसएआई के पास हैं लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नियामक मर्जी के मुताबिक ऐसा नहीं कर सकता है। इकनॉमिक लॉ प्रैक्टिस के साझेदार आशिष प्रसाद का कहना है, 'ऐसी सलाह जारी करने से पहले विनियामक को उन्हें सार्वजनिक टिप्पणी के लिए प्रकाशित करना होगा और उन्हें संसद से मंजूर कराना होगा ताकि दिशा-निर्देशों को वैधानिक आधार दिया जा सके।'
 
निशीथ देसाई एसोसिएट्स में साझेदार गौरी गोखले का कहना है कि 'प्रक्रियागत खामियां' कानूनी लिहाज से एफएसएसएआई को काफी महंगी पड़ती हैं। हालांकि अमेरिका में नए उत्पादों को जोडऩे के लिए एफडीए की अनुमति की जरूरत होती है, अनुमतिप्राप्त सामग्रियों का इस्तेमाल कर तैयार किए जा रहे अंतिम खाद्य उत्पादों के लिए कोई अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनुमतिप्राप्त सामग्रियों की सूची न होने की वजह से इस क्षेत्र में भ्रम की स्थिति है। गोखले के मुताबिक मानक प्रक्रिया के तहत दो सूचियां होनी चाहिए। एक सूची अनुमतिप्राप्त सामग्रियों की होनी चाहिए जिसमें स्वीकृत सीमा और लेबलिंग के दिशा निर्देशों का जिक्र होना चाहिए और दूसरी सूची प्रतिबंधित सामग्रियों की होनी चाहिए। उनका कहना है कि इससे खाद्य क्षेत्र की सभी श्रेणियों पर नजर रखने में मदद मिलेगी जिसमें रेस्तरां और सड़क के रेहड़ी वाले तक सभी शामिल होंगे। लेकिन भारत में एफएसएसएआई द्वारा हाल तक इस्तेमाल की जाने वाली 'उत्पाद स्वीकृति' की पद्घति अंतिम उत्पादों की बात करती है न कि खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों की। 
 
इसके तहत एफएसएसएआई को प्रत्येक खाद्य उत्पाद पर स्वीकृति देनी होती है, भले ही वह सिर्फ स्वीकृत सामग्रियों का प्रयोग कर रहा हो या नहीं। खेतान ऐंड कंपनी के साझेदार जाकिर मर्चेंट का कहना है कि सामग्री आधारित स्वीकृति पद्घति का रुख करना एफएसएसएआई पर निर्भर करता है जो अब तक अंतिम उत्पादों को स्वीकृति देता आया है। उन्होंने कहा, 'मेरे विचार में अधिनियम की धारा 22 पूर्ण प्रतिबंध या निषेध नहीं है, यह केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वह किसी उत्पाद पर प्रतिबंध लागू करे।' अधिनियम की धारा 22 विभिन्न खाद्य पदार्थों के विनिर्माण, वितरण, बिक्री या आयात पर प्रतिबंध लगाती है जिसमें केंद्र सरकार द्वारा सूचीबद्घ नए, जेनेटिकली मॉडिफाइड खाद्य उत्पाद शामिल हैं।  क्षेत्रों के मुताबिक विनियामक भारत में नए नहीं है। हालांकि ट्राई या सीईआरसी के पास अपने-अपने क्षेत्र में भरपूर शक्तियां हैं। अगर एफएसएसएआई अधिनियम के मुताबिक पारदर्शी तरीके से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करे तो वह परेशानियों से बच सकता है। हालांकि विनियम तैयार करना एफएसएसएआई के समक्ष एक विकल्प है, उसे बड़े पैमाने पर खाद्य उत्पादों को दायरे में लाने के लिए अधिक मानकों पर संसद की मंजूरी लेनी होगी। मौजूदा विनियमों में महज 377 खाद्य उत्पादों के लिए मानक तय किए गए हैं। विभिन्न नए उत्पादों के लिए एफएसएसएआई मानक तैयार करता है तो ऐसे उत्पादों के लिए मंजूरी की जरूरत खत्म हो जाएगी। 
Keyword: FSSAI, food,,
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