बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकिंग में बंधन
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बैंकिंग में बंधन
संपादकीय /  August 26, 2015

हाल ही में जो दो नए बैंकिंग लाइसेंस दिए गए, बंधन उनमें से पहला है। गत 23 अगस्त को इसकी शुरुआत हो गई। बंधन बैंक का जनक इसी नाम का एक सूक्ष्म वित्त संस्थान है जिसे चंद्रशेखर घोष ने वर्ष 2001 में कोलकाता के निकट एक कस्बे से शुरू किया था। वह बंधन बैंक के भी मुख्य कार्याधिकारी बने रहेंगे। बतौर सूक्ष्म वित्त संस्थान बंधन बहुत सफल रहा। इसका विस्तार 2,000 से अधिक शाखाओं में हुआ और 60 लाख से अधिक लोग इसके उपभोक्ता बने। बंधन बैंक की भी करीब 501 शाखाएं होंगी। भारतीय बैंकिंग के लंबे इतिहास में यह पहला अवसर है जब कोई ऐसा बैंक सामने है जिसने अपना कारोबारी मॉडल ही उन लोगों के इर्दगिर्द तैयार किया है जो इस समय वित्तीय समावेशन के एजेंडे के केंद्र में हैं। यानी कृषि, उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र के छोटे ऋणकर्ता।

चूंकि वित्तीय समावेशन कुछ वर्ष पहले एक नीतिगत स्तर पर सामने आया इसलिए इसे लेकर रुख भी ऊपर से नीचे की ओर ही देखने को मिला। मौजूदा बैंकों से कहा गया कि वे उपरोक्त समूहों को अपनी ऋण सेवाएं मुहैया कराएं। उन्होंने ऐसा किया भी लेकिन इसमें उपकार का भाव स्पष्टï नजर आता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनका मूल ढांचा और उनकी प्रोत्साहन व्यवस्था ऐसी बनी ही नहीं थी कि वे इस आदेश को एक व्यवहार्य कारोबारी अवसर में तब्दील कर सकें। थोड़ा और पीछे चलें तो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की अपेक्षाकृत कम सफलता भी इन बैंकिंग क्षेत्रों के लिए समुचित सांगठनिक और लागत ढांचे के महत्त्व को रेखांकित करती है। जैसे ही इन बैंकों के कर्मचारियों और वेतनमान को वाणिज्यिक बैंकों के अनुरूप किया गया वैसे ही इस मिशन का अंत हो गया।

वास्तव में नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने की पूरी प्रक्रिया की जड़ इस आकलन में निहित थी कि मौजूदा बैंक समावेशन के लक्ष्य को सार्थक ढंग से पूरा नहीं कर पा रहे। लाइसेंस का आवेदन करने वालों से कहा गया कि समावेशन के लिए विस्तृत कारोबारी योजना पेश करें। समावेशन के लिहाज से देखा जाए तो बंधन की विशेषज्ञता उसे एक योग्य उम्मीदवार बनाती है। एमएफआई से बैंक के रूप में उसके बदलाव पर करीबी नजर रखी जाएगी और उसकी उपलब्धियां और उसके कष्टï नीति निर्माताओं और बैंकिंग क्षेत्र के अन्य कारोबारियों के लिए सबक होंगे। निश्चित तौर पर उसे कई चुनौतियों का सामना करना होगा। उसे नियमनों का अनुपालन करना होगा और भारतीय रिजर्व बैंक की जबरदस्त निगरानी से गुजरना होगा। इसके लिए उसे अंकेक्षण और नियंत्रण व्यवस्था के साथ-साथ मानव संसाधन में भी जमकर निवेश करना होगा। बैंक जिस कारेाबार में जा रहा है वहां पिछले कुछ माह में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा का माहौल है। प्रधानमंत्री की जनधन योजना ने नए खाते खोलने के रूप में बैंकिंग की पहुंच में जमकर इजाफा किया है।

कई ऐसे लोग जिन्होंने अपना पहला खाता खोला होगा वे बंधन के संभावित ग्राहक हो सकते थे। अब उसे इनमें से कई लोगों को दूसरा खाता खोलने के लिए प्रेरित करना होगा। इतना ही नहीं। भुगतान बैंकों का प्रवेश उस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के दबाव को और अधिक बढ़ा देगा जहां बंधन की जड़ें मजबूत हैं। सफल होने और अपने अस्तित्व के लिए उसे किसानों, उद्यमियों और कारोबारियों के साथ अपने रिश्तों का भरपूर दोहन करना होगा। ये रिश्ते ही उसे अपना कारोबार बढ़ाने और परिसंपत्ति की गुणवत्ता का प्रबंधन करने में मदद करेंगे। परंतु जैसे-जैसे बैंक अपने मौजूदा ग्राहकों के दायरे के बाहर विस्तार करेगा, उसके पास इस परिसंपत्ति का भरोसा बरकरार नहीं रह जाएगा। परंतु तमाम चिंताओं को दरकिनार करके देखें तो यह देश के बैंकिंग क्षेत्र का पथप्रदर्शक साबित होगा। यह सामूहिक बधाई और शुभकामनाओं का पात्र है।
(स्पष्टीकरण: कोटक महिंद्रा ऐंड एसोसिएट्स की बिजनेस स्टैंडर्ड लिमिटेड में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी है।)

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