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पटरी से उतारने में सक्षम है नौकरशाही की अड़चन
विवेक देबराय /  August 13, 2015

रेल मंत्री को इसे लेकर नीति निर्माण करना चाहिए लेकिन वह केवल यह तय करने में उलझे हैं कि यात्री कोचों को बिजली कैसे मुहैया कराई जाए? नौकरशाही की जटिलताओं के बारे में बता रहे हैं विवेक देबराय
रेलगाडिय़ों में बिजली की आपूर्ति कौन करता है? मेरा सवाल उपनगरीय टे्रनों मसलन ईएमयू (इलेक्ट्रिकल मोबाइल यूनिट्स) अथवा मेमू (मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट्स) को लेकर नहीं है। मेरा सवाल दूसरी रेलगाडिय़ों के यात्री डिब्बों से संबंधित है। देश भर की ट्रेनों में ऐसे 50,000 से अधिक डिब्बे होंगे। हर वर्ष भारतीय रेल इनमें 3200 का इजाफा करती है जबकि हर वर्ष तकरीबन 1000 खराब हो जाते हैं। कोच में बिजली से मेरा तात्पर्य लोकोमोटिव इंजन को खींचने के लिए डीजल, बिजली या दुर्लभ मामलों में भाप के प्रयोग से नहीं है। मेरा मतलब यात्री डिब्बों के अंदर बल्ब, पंखों, वातानुकूलन, मोबाइल चार्जर तथा ऐसे अन्य कामों के लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली से। ये कुछ ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में अक्सर लोग नहीं सोचते।
इस बिजली की आपूर्ति के तीन तरीके हैं। पहला, स्वउत्पादन। ट्रेन के पहियों के घर्षण से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा को जाया क्यों होने देना? एक्सल से एक बेल्ट लगाकर उससे बिजली हासिल की जा सकती है। अल्टरनेटर में आने वाली बिजली से डीसी बैटरियों को चार्ज किया जा सकता है। छत पर लगी इकाई डीसी को एसी इन्वर्टर में बदल देती है। यह वातानुकूलित और गैरवातानुकूलित दोनों तरह के डिब्बों के लिए उपयोगी है। दूसरा तरीका है- ऐंड ऑन जनरेशन (ईओजी) मोड। राजधानी, शताब्दी और दुरंतो में यात्रा करने वाले शायद इससे परिचित हों। इनमें दो यान बिजली के होते हैं जो ट्रेन के आगे या पीछे लगे होते हैं। इनमें से प्रत्येक यान मे दो डीजल जेनरेटर लगे होते हैं। तीसरी व्यवस्था होती है हेड ऑन जनरेशन (एचओजी) की। इसमें इंजन से बिजली की आपूर्ति की जाती है। अगर यह डीजल इंजन है तो अल्टरनेटर का इस्तेमाल किया जाता है। उपनगरीय ईएमयू और मेमू इसी तरीके से काम करती है।
आखिर इनमें से कौन सा बेहतर है- एसजी, ईओजी अथवा एचओजी? मैं कोई रेलवे इंजीनियर नहीं हूं लेकिन जहां तक मैं समझ पाता हूं एचओजी सबसे बेहतर है। इसमें बिजली की उत्पादन लागत करीब 25 फीसदी कम होती है। दुर्भाग्यवश, उपनगरीय और मेट्रो ट्रेनों को अपवाद मान लिया जाए तो हमारे पास तयशुद रैक और ट्रेन नहीं हैं। ऐसे में यह संभव है कि अगर लोकोमोटिव को टे्रन से अलग कर दिया जाए तब यात्री कोच के लिए बिजली ही नहीं बचेगी। ऐसे में एचओजी बेमानी साबित हो जाएगा।
वर्ष 1998 (या कहें 2000) से भारतीय रेल ने एलएचबी (लिंक-हॉफमैन-बुश) का इस्तेमाल शुरू किया। ये बेहतर और पुराने आईसीएफ (इंटीग्रल कोच फैक्टरी) कोच की तुलना में बेहतर हैं। सभी नए कोच एलएचबी हैं। इनमें हर साल तैयार होने वाले 3200 नए कोच भी शामिल हैं।
चूंकि हम एचओजी को खारिज कर चुके हैं इसलिए एलएचबी कोच में किसका इस्तेमाल होना चाहिए- एसजी अथवा ईओजी? अधिकंाश रेलवे इंजीनियरों की राय इस मसले पर बंटी हुई है और जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि सवाल किससे पूछा जा रहा है। आर्थिक लिहाज से देखा जाए तो एसजी का पक्ष मजबूत लगता है। आखिरकार ट्रेन के किसी भी सिरे पर दो बिजली यान लगाने का क्या औचित्य है? उनकी जगह पर दो अतिरिक्त यात्री डिब्बे जोड़े जा सकते हैं। बहरहाल, कई वर्षों के प्रयास के बाद भी एसजी तकनीक को पूरी तरह अपनाया नहीं जा सका है। यहां हम भारतीय रेल द्वारा फिलहाल कपूरथला और चेन्नई संयंत्रों में बनाए जा रहे रेल डिब्बों की बात नहीं कर रहे हैं। कई अन्य इकाइयां भी होंगी जहां भारतीय रेल, राज्य सरकार के साथ संयुक्त उद्यम, निजी कंपनियों के साथ साझेदारी और पूरी तरह निजी स्तर पर भी डिब्बे बनाए जाएंगे। अगर यात्री रोलिंग स्टॉक का स्वामित्व रखने वाली निजी संस्थाएं हों और निजी सवारी गाड़ी चलाई जाएं तो वे किस माध्यम का चयन करते हैं, यह उनका निजी मसला है। लेकिन अभी ऐसा होने मे काफी वक्त है। ऐसे में चाहे जैसे भी कोच बनाए जाएं और उनका स्वरूप चाहे जैसा हो, उनका इस्तेमाल तो भारतीय रेल को ही करना है। ऐसे में डिजाइन, तकनीक और तमाम अन्य मसलों पर फैसला भारतीय रेल और आरडीएसओ (रिसर्च डिजाइन और स्टैंडर्ड ऑर्गनाइजेशन) को करना चाहिए। एसजी को ईओजी में कभी नहीं मिलाया जा सकता है। चूंकि भारतीय रेल में तयशुदा रैक या ट्रेनों की व्यवस्था नहीं है, ऐसे में एक कोच जो आज एक ट्रेन में है, वह अगले दिन किसी और ट्रेन में लगाया जा सकता है। अतएव, एसजी या ईओजी का उपयोग हो सकता है लेकिन दोनों का नहीं।
चीजों को और अधिक स्पष्टï करें तो बैटरी, अल्टरनेटर और इन्वर्टर के लिए अलग वेंडर होंगे। ऐसा नहीं है कि वे ईओजी के बजाय एसजी को प्राथमिकता देंगे। मैं किसी किस्म की पक्षधरता नहीं दिखा रहा हूं। मैं इसमें सक्षम नहीं हूं। लेकिन यह प्रकरण मुझे फ्रेडरिक बैस्टियट (1801-1850) की उस यादगार याचिका की याद दिलाता है जिसमें मोमबत्ती, लालटेन, माचिस, स्ट्रीट लैंप, आदि बनाने तथा तेल, रेजिन अल्कोहल आदि का उत्पादन करने वालों ने सूर्य और उसकी रोशनी के विरुद्घ याचिका दायर करते हुए कहा था कि इससे उनका कारोबार बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है। स्पष्टï है कि जहां बहुत अधिक पैसा शामिल होगा वहां निहित स्वार्थ वाले लॉबीइंग अवश्य करते हैं।
रेलवे बोर्ड की बात करें तो आज रेलवे बोर्ड में एक चेयरमैन (सीआरबी) के अलावा इलेक्ट्रिकल, इंजीनियरिंग, ट्रैफिक, स्टाफ और मेकेनिकल आदि विभागों के सदस्यों के अलावा वित्तीय आयुक्त भी होता है। सीआरबी को वीटो का अधिकार नहीं होता। वह मुख्य कार्याधिकारी नहीं होता। रेलवे कमेटी की मंशा सीआरबी को पूर्ण मुख्य कार्याधिकारी बनाने की थी और उसने ट्रैक्शन ऐंड रोलिंग स्टॉक, पैसेंजर ऐंड फ्रेट बिजनेस, एचआर ऐंड स्टोर्स, फाइनैंस ऐंड पीपीपी तथा बुनियादी ढांचा क्षेत्र के सदस्यों की नियुक्ति का सुझाव भी दिया था। कमेटी के ढांचे में एक ही सदस्य के पास टै्रक्शन और रोलिंग स्टॉक का प्रभार होता तो वह एसजी बनाम ईओजी का फैसला कर सकता था। लेकिन समाचार पत्रों में आ रही खबरों के मुताबिक भारतीय रेल और मौजूदा रेलवे बोर्ड को ऐसे किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं महसूस होती। यहां यथास्थिति ही बरकरार है।
मौजूदा ढांचे में परिवहन सदस्य ही ऐसे मसले को लेकर चिंतित नजर आता है। इलेक्ट्रिकल और मेकेनिकल सदस्य भी इसमें प्रासांगिक हैं। अगर वे असहमत होते हैं तो सीआरबी न तो हस्तक्षेप कर सकता है न कोई फैसला। ऐसे में एक रेल मंत्री जिसे रेलवे क्षेत्र के नीति निर्माण का काम करना चाहिए वह केवल यह तय करने तक सीमित रह गया है कि यात्री डिब्बों में बिजली की आपूर्ति कैसे की जाए। मुझे जिम हैकर्स की डायरी को उद्घृत करना ही होगा, 'नौकरशाही अपने आप में ही एक प्रतिपक्ष है।'

लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं और रेलवे सुधार समिति के प्रमुख रह चुके हैं।

Keyword: Rail, Bureaucracy, Trains,
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