बिजनेस स्टैंडर्ड - अमल से 'पहल' होगी सफल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, May 21, 2022 07:57 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

अमल से 'पहल' होगी सफल
आदिति फडणीस /  August 10, 2015

भारत सरकार और एनएससीएन-आइजक मुइवा गुट के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते में तमाम जटिलताएं हैं, ऐसे में इसकी सफलता इसी पहलू पर निर्भर करेगी कि उसे जमीनी स्तर पर कैसे अमल में लाया जाता है। बता रही हैं आदिति फडणीस

ब्रेड स्लाइस के आविष्कार के बाद इसे सबसे बड़ी चीज करार दिया जा रहा है। थुइंगलेंग मुइवा की तुलना भी ऑटो वॉन बिस्मार्क, चेयरमैन माओ, नेल्सन मंडेला, ईसा मसीह और इतिहास की ऐसी ही तमाम विभूतियों के साथ हो रही है। तकरीबन 60 साल बाद नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या कहें कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं के साथ संधि कर पूर्वोत्तर के इतिहास को फिर से लिखने की तैयारी कर रही है और हमें भी उसमें मीनमेख नहीं निकालने चाहिए। मगर यह संधि है क्या?

सरकार और नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-आइजक मुइवा (एनएससीएन-आईएम) गुट के बीच जो 'ऐतिहासिक' संधि हुई, वह सात पर्दों के रहस्य में ढंकी हुई है। आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि इस संधि की शर्तों को सार्वजनिक करने में तीन महीने लग सकते हैं। मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने स्पष्टï कहा है कि अगर मणिपुर की सीमा के साथ कोई छेड़छाड़ की गई तो उनकी सरकार यह संधि कभी स्वीकार नहीं करेगी। राजधानी इंफाल में सिंह ने कहा, 'हम सरकार और एनएससीएन-आईएम के बीच हुए शांति समझौते का स्वागत करते हैं लेकिन अगर इससे मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचता है तो किसी भी सूरत में इस शांति समझौते को स्वीकार नहीं किया जाएगा।' कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी संधि को लेकर संदेह जता चुकी हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि इसमें नगालैंड के मुख्यमंत्री टी आर जेलियांग को क्या अंधेरे में नहीं रखा गया? मणिपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद थोकचोम मेन्या का कहना है कि भाजपा की अगुआई वाली सरकार और एनएससीएन-आईएम को पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की परवाह किए बिना अपनी समस्याएं सुलझाने की जल्दबाजी है। मेन्या का कहना है, 'सरकार संधि के मसौदे को गुप्त रखने की जैसी कोशिश कर रही है, उससे यह स्पष्टï होता है कि इसमें कुछ तो ऐसा है, जो नगालैंड के पड़ोसी राज्यों के हित में नहीं।' कई रूपों में यही समस्या की जड़ है। पूर्वोत्तर में पहचान और जमीन को लेकर छिड़े संघर्ष में कोई विजेता नहीं बन सकता। इसमें केवल नुकसान ही नुकसान है।

बदला वक्त

नगाओं के कुछ वर्ग के एनएससीएन-आईएम से मोहभंग के सवाल पर कुछ वर्ष पहले मुइवा से पूछे गए सवाल पर उन्होंने यही टिप्पणी की थी, 'विरोधी हालात का फायदा उठाने की भरपूर कोशिश करेंगे। मगर लोग आसानी से अपनी मुहिम नहीं छोड़ेंगे। भारत ने नगाओं के सफाये और उनके राष्ट्रवाद की ताकत को तोडऩे में कोई कमी नहीं छोड़ी है। अब वे नई तिकड़में भिड़ा रहे हैं। मगर नगा जानते हैं कि उनका हित भारत के साथ नहीं है।' तब से आखिर क्या बदल गया? जानकार कहते हैं कि बदलाव के मोर्च पर बहुत कम घटित हुआ है। संसदीय गतिरोध में फंसी सरकार को एक रामबाण नुस्खे की दरकार थी, जिसे वह अपने हक में इस्तेमाल कर सके। वहीं पूर्वोत्तर भारत में बदलते हालात के बीच मुइवा को एक राजनीतिक उत्प्रेरक की जरूरत थी, मिसाल के तौर पर म्यांमार और बांग्लादेश में सियासी शक्तियों के संतुलन के लिए।

इसकी जड़ें तलाशी जाएं तो नजर अंगामी जापु फिजो पर जाती है, जो नगा पर्वतीय जिलों के दिग्गज नेता हुआ करते थे। वर्ष 1956 में उन्होंने यहां तक ऐलान कर दिया कि उनकी संघीय स्वतंत्र संप्रभु सरकार ही 'कार्यकारी सरकार है।' जाहिर है इसने भारत और नगालैंड के बीच संघर्ष अपरिहार्य बना दिया। जब 1975 में फिजो समूह ने भारत सरकार के साथ शिलंग शांति समझौता किया तो उससे टकराव के आसार और बढ़ गए। उस वक्त फिजो के दो युवा सहयोगी आइजक चिसी सू और थुइंगलेंग मुइवा चीन में हथियार खरीद रहे थे। जब वे लौटे तो उन्होंने फिजो धड़े की 'सौदेबाजी' को मानने से इनकार कर दिया। फिर 1980 में नगालैंड की आजादी के मकसद से बर्मा में एनएससीएन की बुनियाद रखी गई।

तब से बर्मा, जो अब म्यांमार हो गया है, नगा अलगाववाद की राजनीति का केंद्र रहा है। उस समय एनएससीएन का नेतृत्व नगालैंड की प्रमुख जनजातियों का प्रतिनिधित्व करता था, जिसमें एस एस खापलांग बर्मा की होमी जनजाति, जबकि मुइवा मणिपुर की तंगखुल से ताल्लुक रखते थे। नगालैंड में अंतर-जनजातीय बैर की खाई इतनी गहरी है कि दो अलग-अलग जनजातियों के लोग अगर सड़क पर साथ मिलेंगे तो एक दूसरे से नजरें नहीं मिलाएंगे। इसलिए संदेह गहरा गया। वर्ष 1988 में खापलांग और मुइवा में संघर्ष हो गया। आंदोलन एनएससीएन-आईएम और एनएससीएन (खापलांग) के बीच में बंट गया।

उनके इलाके भी बंट गए। केंद्र सरकार, विशेषकर खुफिया एजेंसियों ने देखा कि इन दो धड़ों का भारत के साथ-साथ देश की सीमा से परे भी प्रभाव है। ऐसे में खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने जहां मुइवा समूह पर नजर रखना शुरू किया, वहीं विदेशों में प्रभाव रखने वाली रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) ने म्यांमार के मद्देनजर खापलांग धड़े पर नजरें गड़ा दीं। वर्ष 1997 तक दोनों समूहों को एहसास हो गया कि खूनखराबे से उन्हें कुछ हासिल नहीं हो रहा। भारत सरकार ने संघर्ष विराम का ऐलान कर दिया। इससे एक नई दिशा मिली। मुइवा जिन तंगखुल नगाओं से ताल्लुक रखते हैं, उन्होंने मुख्यधारा में आने की कोशिश की। उन्होंने देखा कि राजनीति पर दूसरे धड़ों का वर्चस्व है, जो उसमें उनके लिए गुंजाइश बनाने के लिए तैयार नहीं। फिर खूनखराबे का दौर शुरू हुआ, जिसमें नगालैंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस सी जमीर पर किया गया हमला भी शामिल था। जमीर एओ समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और उनके हित तंगखुल नगाओं को हाशिए पर रखने से जुड़े थे और इसी वजह से वह खापलांग धड़े का समर्थन कर रहे थे।

संघर्ष विराम का इन दो समूहों पर क्या असर होगा, यह साफ हुआ। मोकोकचंग, दीमापुर और कोहिमा जैसे नगालैंड के बड़े शहरों में एनएससीएन-आईएम बहुत मजबूत हो गया। साथ ही यह अजेय होता गया, फिरौती कोई नई चीज नहीं थी लेकिन महिलाओं का अपहरण और उत्पीडऩ बेहद आम हो गया। शिकायतें मुइवा तक पहुंचनी शुरू हुईं। इससे चिंतित मुइवा ने वर्ष 2004 में नगालैंड का दौरा किया, जहां उनका शिकायती अंदाज में स्वागत हुआ। उन्होंने गांव के बुजुर्गों की बैठक बुलाई (जिसमें चेतावनी दी गई थी कि अगर वे उसमें शामिल नहीं हुए तो उन्हें 35 लाख रुपये का हर्जाना देना होगा।)

अपनी आवाज बुलंद करने से कभी पीछे नहीं हटने वाले बुजुर्गों ने मुइवा के शागिर्दों की कारगुजारियों की पूरी दास्तान सुनाई। बंद कमरे में हुई बैठक में मुइवा ने इसके लिए माफी मांगी और वादा किया कि ये कारगुजारियां दोहराई नहीं जाएंगी। उन्होंने अपने मातहतों की जिम्मेदारी बदल दी और पैसे इक_ïे करने का जिम्मा सैन्य प्रभाग से छीनकर नागरिक प्रभाग को सौंप दिया। इस बीच सरकार लगातार उनसे बात करती रही। सरकार की ओर से वार्ताकारों में पूर्व गृह सचिव के पद्मनाभैया का नाम प्रमुख रहा। वह कहते हैं कि संप्रभुता का मसला नगाओं के दिमाग में बैठ गया है मगर वह यह भी कहते हैं कि संधि के प्रभावों का अध्ययन करना होगा। उन्होंने कहा, 'एनएससीएन के लिए यह लंबी लड़ाई है। वक्त बदल गया है। नगा युवाओं का शेष भारत के साथ ज्यादा जुड़ाव हो रहा है। उन्हें भी वही चीजें चाहिए, जो भारत के किसी और कोने में रहने वाले युवाओं को चाहिए।'

म्यांमार पहलू

कई और पहलू भी बदल गए हैं। म्यांमार में नवंबर में चुनाव होने हैं और आंग सान सू की को न केवल भारत बल्कि चीन भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। हालांकि म्यांमार अभी लोकतंत्र की राह पर ही है, जहां सेना से जुड़े राजनीतिक दल के लिए संसद में सीटें आरक्षित हैं, वहीं म्यांमार सेना को चीन के समर्थन में कुछ कमी भी आ रही है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के मुखपत्र 'द पीपल्स डेमोक्रेसी' में सेवानिवृत्त राजनयिक एम के भद्रकुमार ने लिखा है, 'सू की 10 जून, 2015 को अपने पहले पांच दिवसीय चीन दौरे के लिए पेइचिंग पहुंची और दूसरे दिन चीनी राष्टï्रपति शी चिनफिंग ने ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल पर उनकी आगवानी की। तब तक उन्होंने चीनी विदेश नीति के स्टेट काउंसलर यांग जियेची से काम की बातें कीं।' इस पर पश्चिम में यही प्रतिक्रिया हुई कि सू की पश्चिमी नियंत्रण से बाहर जा रही हैं। उनके पेइचिंग आगमन से पहले चीनी मीडिया ने उन्हें लेकर अपना आकलन यही किया कि वह म्यांमार का राजनीतिक भविष्य हैं, अब उन्हें पश्चिम के पदचिह्नों पर चलने वाले के तौर पर नहीं देखा जा सकता और नवंबर में होने वाले आम चुनाव के बाद म्यांमार में आकार लेने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था से ताल मिलाने की दिशा में चीन को तत्काल जरूरी संतुलन साधना शुरू करना चाहिए।

स्वाभाविक है कि म्यांमार के राजनीतिक पटल पर इस बदलाव का मतलब यही है कि पूर्र्वोत्तर की ताकतें भी नए सिरे से सोचें। ऐसे में बेचैनी बढऩा लाजिमी है। यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथईस्ट एशिया नाम से एक नया संगठन खड़ा हुआ है। हालांकि उसे एनएससीएन जैसी स्वीकार्यता या गुरिल्ला लड़ाई का उसके जैसा अनुभव नहीं है। मगर खापलांग का दांव इस समूह से जुड़ा हुआ है। उन्हें और उनके लोगों को कैसे पटरी पर लाया जाएगा? क्या वे इस 'सौदेबाजी' के खिलाफ जाएंगे? यह संधि, जो भले ही कैसी हो, पूर्वोत्तर के लोगों के लिए बेहतर साबित होगी या बदतर? कम से कम कागजों पर तो आ गई है। यह कारगर होगी या नहीं, यह इस पर निर्भर होगा कि उसे जमीनी स्तर पर कैसे अमल में लाया जाता है।

Keyword: india, NSCN, nagaland,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या टैक्सी सेवा प्रदाताओं पर सीसीपीए को करनी चाहिए कार्रवाई?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.