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मीडिया-मनोरंजन उद्योग के विस्तार पर क्यों लाचार सरकार
मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 09, 2015

एफएम रेडियो नीति के ऐलान के चार साल बाद इस कवायद को और विस्तार देने के मकसद से पिछले सप्ताह एफएम रेडियो लाइसेंस की नीलामी का तीसरा चरण शुरू हुआ। वर्ष 2011 में डिजिटलीकरण को अनिवार्य बनाने के बाद यह सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पहली बड़ी 'पहल' है। आप फिल्म निर्माण, टेलीविजन, केबल या रेडियो उद्योग से जुड़ी भारत की किसी भी शीर्ष कंपनी के मुख्य कार्याधिकारियों से बात कीजिए तो आपको वही सुनने को मिलेगा, जो आप तीन साल से सुनते आए हैं कि कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा है। दीर्घ अवधि में वृद्घि को तेजी देने वाले मनोरंजन कर को तार्किक बनाने जैसे कुछ कारकों के लिए लॉबीइंग करने की कोई बात ही नहीं होती। इसके बजाय प्रसारक और मीडिया फर्म कह रही हैं कि क्या हम कम से कम सामान्य तौर पर कारोबार कर सकते हैं? ऐसे में सवाल पूछने का यह सही समय है कि क्या हमें वास्तव में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की दरकार है? यह भी संभव है कि एक स्वतंत्र संस्था द्वारा प्रिंट, टेलीविजन, फिल्म, रेडियो और डिजिटल सभी माध्यमों का संचालन अच्छी तरह न हो पाए, जैसा कि ब्रिटेन की ऑफकॉम बड़े अलहदा अंदाज में करती है। एक संस्था किसी उद्योग की व्यापक तस्वीर पर गौर कर उसे उसकी संभावनाओं को भुनाने की दिशा में आगे बढ़ा सकती है। ऐसी संस्था कारोबारी नियम, स्वामित्व प्रारूप पर नियंत्रण, एकाधिकार की स्थिति को बनने से रोकना, खराब चलन को रोक मीडिया के लिए एक स्वस्थ माहौल बना सकती है। सरकार और उद्योग जगत दोनों स्तरों पर इसके खिलाफ तमाम तर्क हैं। 

 
मगर इसके पक्ष में एक पुख्ता दलील है: मंत्रालय के साथ दिक्कत यही है कि वह मीडिया और मनोरंजन को पूरी तरह सामग्री/प्रभाव और नियंत्रण के चश्मे से ही देखता है कारोबारी नजरिये से नहीं। दुनिया के किसी भी विकसित देश में सत्तारूढ़ कोई भी राजनीतिक दल मीडिया को एक उद्योग के रूप में स्वीकारने में अक्षम है, जिसकी जरूरतों को पूरा किया जाए और उसे रोजगार सृजन, जीडीपी और स्वस्थ लोकतंत्र बनाने की दिशा में योगदान के लिए उसका विकास किया जाए। उत्कृष्टï बीबीसी के पर कतरने को लेकर ब्रिटेन की कंजरवेटिव सरकार की प्रतिबद्घता यही दर्शाती है कि  कोई भी लोकतंत्र एक हस्तक्षेपकारी राज्य बनने के खतरे से महफूज नहीं है। कांग्रेस की अगुआई वाली पिछली सरकार में मंत्रालय टेलीविजन रेटिंग जैसे मसले को लेकर कुछ ज्यादा ही अड़ा हुआ था। यह दर्शाता है कि सरकार की एक लाख करोड़ रुपये के भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में सुधार को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसकी वृद्घि को बढ़ावा देने या फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के प्रमुख या केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के मुखिया की नियुक्ति को लेकर उपजे संकट से निपटने की कोई कोशिश ही नहीं की गई। विडंबना है कि मंत्रालय के बजट में फिल्मों के लिए बेहद कम आवंटन होता है। उसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी प्रसार भारती की है। वहां जरूरत से ज्यादा कर्मचारी हैं, जिनका उचित उपयोग भी नहीं हो रहा है। 
 
ऐसे में मीडिया की राजनीति हमेशा कारोबार और विकास संबंधी कवायदों पर भारी पड़ती है। मगर जब तक हम दूसरे पहलू का समाधान नहीं तलाशेंगे, तब तक गुणवत्ता और सामग्री के मसले को सुलझाने की उम्मीद नहीं कर सकते, जिसके इर्द गिर्द ही सभी तरह की बहसं हो रही हैं। डिजिटलीकरण की ही मिसाल लें। लगभग 47,500 करोड़ रुपये का भारतीय टेलीविजन उद्योग बेहद कम मुनाफे पर काम कर रहा है, जिसमें मौलिकता का भी अभाव है। डिजिटलीकरण का अर्थ है अधिक मुनाफा, भुगतान-राजस्व समर्थित टीवी उद्योग, अधिक नौकरियां, कर और दर्शकों के लिए विकल्प। डिजिटलीकृत बाजारों से मिले आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है।  क्या चीज पीछे जा रही हैं? भारत में लगभग एक तिहाई केबल ऑपरेटर राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं, जिससे यह उद्योग राजनीतिक चंदे के एक स्रोत के रूप में उभरा हुआ है और पारदर्शिता की दिशा में किसी भी कदम के विरोध में एक अवरोध बन जाता है। 
 
खबरिया चैनलों का उदाहरण लें। भारत में हर कोई खबरों की गुणवत्ता को लेकर शिकायत कर रहा है। क्या मंत्रालय कोई सकारात्मक दखल दे सकता है। इसके लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी किया जा सकता है। इससे अगर उन रणनीतिक निवेशकों को प्रोत्साहन मिलता है तो यह एक अच्छी खबर होगी, जिन निवेशकों ने अभी तक इस भारतीय बाजार में अपनी कम दिलचस्पी दिखाई है। कोई डाऊ जोंस या ब्लूमबर्ग बेहद जरूरी प्रक्रियाओं और प्रशिक्षण को धार दे सकती हैं। इसके साथ ही प्रसार भारती को भारत का बीबीसी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं, भारतीय प्रेस परिषद को कुछ वास्तविक शक्तियां प्रदान की जाएं और समाचार मीडिया के सभी मालिकों के स्वामित्व और वित्तीय आंकड़ों में पूर्ण पारदर्शिता अनिवार्य की जाए।  भारत में प्रति 10 लाख की आबादी पर 10 सिनेमा स्क्रीन हैं, जो एक सृजनात्मक फिल्म उद्योग की विकास की राह में बाधा हैं, जबकि अमेरिका में यही आंकड़ा 125 स्क्रीन प्रति दस लाख है। 
 
पांच साल पहले चीन में भी कमोबेश यही स्थिति थी लेकिन अब वहां 24 स्क्रीन प्रति 10 लाख का आंकड़ा हो गया है। अमेरिका के बाद यह अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म बाजार है। क्या मंत्रालय इसे अवसंरचना का दर्जा देकर मल्टीप्लेक्सों के निर्माण को बढ़ावा और थियेटरों के डिजिटलीकरण को प्रोत्साहन दे सकता है? ऐसे तमाम कदम हैं, जिन्हें उठाकर इस उद्योग को भी अमेरिकी मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के समान ही बलवान और गतिमान बनाया जा सकता है। लगभग 1.2 अरब से ज्यादा की आबादी, दुनिया में फिल्मों का सबसे बड़ा बाजार, (वॉल्यूम के लिहाज से) समाचार और टेलीविजन के दूसरे सबसे बड़े बाजार को पत्रकारों की गालियों और इन बहसों से ऊपर उठकर देखना चाहिए कि फिल्म संस्थान की कमान किसके हाथ में होनी चाहिए। 
Keyword: FM radio, licence,,
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