बिजनेस स्टैंडर्ड - पेंशन फंड के धन का पीई में निवेश का मन
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पेंशन फंड के धन का पीई में निवेश का मन
देवाशिष बसु /  July 28, 2015

सरकार की मंशा सेवानिवृत्ति फंड के पैसे को वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी फंड में निवेश करने की है। इस योजना के स्याह-सफेद पक्ष का विस्तार से विश्लेषण कर रहे हैं देवाशिष बसु

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वित्त मंत्रालय भविष्य निधि के साथ-साथ पेंशन फंड और ग्रैच्युटी फंड जैसे तमाम सेवानिवृत्ति फंड को वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी फंड में निवेश करने का मन बना चुका है। भविष्य निधि के वृद्घिशील कोष की 5 से 15 फीसदी तक की राशि को पहले ही इक्विटी और अन्य संबंधित योजनाओं में निवेश किया जा सकता है। इन योजनाओं में एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ), भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा विनियमित म्युचुअल फंड इकाइयां, इंडेक्स फंड और डेरिवेटिव्स और परिसंपत्ति समर्थित प्रतिभूतियां एवं बुनियादी निवेश ट्रस्ट की इकाइयां आदि सभी शामिल हैं।
यह बदलाव एकदम सहज ढंग से पूरा हो गया और किसी हलके से प्रतिरोध का कोई स्वर सुनने को नहीं मिला। इसके विपरीत भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन को लेकर हमें बहुत अधिक खींचतान देखने को मिली। याद कीजिए, हर राजनीतिक दल और उससे जुड़े श्रम संगठन ने भविष्य निधि के पैसे को शेयर बाजार में लगाने के प्रस्ताव का 20 वर्षों तक लगातार विरोध किया। लेकिन अब जबकि यह हो चुका है, असहमति का कोई स्वर शायद ही सुनने को मिला हो। मुझे तो सरकार के इस कदम के मायनों को लेकर कोई खास विश्लेषण भी पढऩे को नहीं मिला। सबसे पहली बात, बाजार से जुड़े उत्पादों मसलन शेयर इत्यादि और बाजार से संबंध न रखने वाले उत्पादों मसलन बॉन्ड (परिपक्वता अवधि तक)आदि में काफी अंतर हैं। वास्तव में बेहद चतुर लोगों को भी इसके असल प्रभाव का आकलन करने में वक्त लगेगा। बाजार से जुड़े उत्पादों मसलन सोना और शेयर आदि में प्रतिफल की कोई गारंटी नहीं होती। उनकी कीमत रोज बदलती है। अच्छे से अच्छा शेयर किसी बुरे दिन अचानक 20-30 फीसदी तक गिर सकता है। हममें से अधिकांश लोग इस अस्थिरता से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं रहते। हम सब निश्चितता पर यकीन करने वाले लोग हैं।
हमें अनिश्चित भविष्य पसंद ही नहीं है। अच्छी बात यह है कि ऐसी अस्थिरता और यदाकदा तेज गिरावट के बाद भी सेंसेक्स और तय अवधि वाली सुरक्षित मानी जाने वाली जमा योजनाओं से हासिल होने वाले प्रतिफल में बमुश्किल 3-4 फीसदी का अंतर है। ऐसे में अगर ईटीएफ में लंबे समय तक निवेश किया जाए तो वह वाकई फायदेमंद साबित हो सकता है। 5 से 15 फीसदी का वृद्घिशील निवेश हालांकि बहुत कम है लेकिन इसे अच्छी शुरुआत माना जा सकता है।
बहरहाल, ऐसा लगता है कि अब सरकार सेवानिवृत्ति फंड के पैसे को वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी फंड में लगाने पर जोर दे रही है। यह एक बहुत बड़ी त्रासदी का सबब बन सकता है। बाजार से जुड़ी योजना खरीदने और चुनिंदा फंडों पर दांव लगाने में बहुत बड़ा अंतर है। वेंचर फंड या निजी इक्विटी फंड में निवेश को लेकर दो बड़ी समस्याएं हैं।
पहली, ऐसे कम ही निवेशक हैं जो निवेश के प्राथमिक नियम का पालन कुशलतापूर्वक करते हों: परिसंपत्ति को सस्ता होने पर खरीदना और महंगा होने पर बेच देना। मैकिंजी ऐंड कंपनी के मुताबिक वर्ष 2001 से 2013 के बीच देश में निजी इक्विटी फंडों द्वारा किए गए 103 अरब डॉलर के निवेश में करीब एक चौथाई राशि वर्ष 2007 और 2008 में उस समय निवेश की गई जब बाजार एकदम चरम पर था। यह वास्तव में बहुत गलत समय था। कंपनियों का विकास उम्मीद के अनुरूप नहीं हुआ और डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में भी 25 फीसदी की गिरावट आई।  इसका प्रभाव पीई फंड के परिणामों पर भी नजर आया।
मैकिंजी के मुताबिक जनवरी 2007 से दिसंबर 2013 के बीच निजी इक्विटी फंडों का औसत सालाना प्रतिफल करीब 7 फीसदी रहा। जबकि इस अवधि में सेंसेक्स ने 11 फीसदी की कमाई की। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी निजी निवेशक ने जिसने ईटीएफ में निवेश किया और सेंसेक्स को ट्रैक किया हो उसको उन फंडों की तुलना में अधिक बेहतर प्रतिफल हासिल हुआ होगा जिन्हें वित्तीय जगत के दिग्गज प्रबंधित करते हैं। मैकिंजी का अध्ययन 600 से अधिक निजी इक्विटी फंडों के लेनदेन पर आधारित था। फर्म के मुताबिक सन 1998 और 2006 के बीच यानी बाजार में तेजी के पहले किए गए पीई निवेश का प्रदर्शन अच्छा रहा और उसने 21 फीसदी की आय अर्जित की। उस अवधि में सेंसेक्स का प्रतिफल 18 फीसदी रहा।
लेकिन वर्ष 1998 से 2006 के बीच निवेश का आकार बहुत छोटा था। निवेश में तेजी तो 2000 के दशक के मध्य में उछाल वाले वर्षों में ही आई। पीई फंड वर्ष 1998 से ही भारत में बहुत चुनिंदा निवेश कर रहे थे लेकिन वर्ष 2006 के बाद उनमें बाढ़ ही आ गई। इसके लिए काफी हद तक शेयर बाजार में आ रही उछाल जिम्मेदार थी। खुदरा निवेशकों की प्रकृति भी एकदम ऐसी ही होती है।
मैकिंजी के अनुमान के मुताबिक पिछले 15 साल के दौरान देश में आए तमाम निजी इक्विटी निवेश में 65 फीसदी उस वक्त हुआ जब सेंसेक्स ऐतिहासिक उछाल पर था। जाहिर है जब शेयर दर ऊंची हो उस समय निवेश का अर्थ ही यह है कि प्रतिफल अच्छा नहीं रहेगा। निजी इक्विटी निवेश से जुड़ा एक अन्य अहम मसला नकदी की स्थिति का है। बीते सालों के दौरान भारत सरकार और बाजार नियामकों ने शायद ही देश के पूंजी बाजार के विकास पर ध्यान दिया हो। इसके लिए प्रभावी प्रशासन सुनिश्चित करने और बाजार में हस्तक्षेप को नियंत्रित करने के लिए समुचित कदम नहीं उठाए गए। अगर ऐसा किया गया होता तो बाजार में कंपनियों की संख्या बढ़ी होती, निवेशकों का दायरा और अधिक व्यापक हुआ होता। ऐसे में विलय एवं अधिग्रहण कारोबार भी खूब फलता-फूलता। लेकिन इसकी कमी की वजह से कई निजी इक्विटी फंडों को अपने निवेश से निकलने का अवसर ही नहीं मिला।
अंतत: अनेक निजी इक्विटी फंड का पूरा चक्र ही सात साल का होता है। यह बात उनको लंबी अवधि के निवेश के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बना देती है। उम्मीद की जाती है कि सात साल (कई बार 10 साल) की अवधि में वे अपने निवेशकों को 25 फीसदी का कुल प्रतिफल मुहैया कराएंगे। बहरहाल, इनके निर्गम की घटनाएं कम ही देखने को मिली हैं। इस वजह से नए निवेशक देखने को नहीं मिले हैं।
क्या देश की सरकार अपने कामगारों और कर्मचारियों के लिए लंबी अवधि के फंड का निर्धारण करते समय इन बातों पर पूरा ध्यान दे रही है?

Keyword: retirement, fund, Private equity fund,
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