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सेहत में सुधार
संपादकीय /  July 21, 2015

कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) में सुधार का विस्तृत ब्योरा अभी सामने आना बाकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित श्रम सम्मेलन में इसे लेकर संकेत दिया। सवाल यह है क्या ईएसआई में होने वाले सुधारों के तहत उन लोगों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा जो अभी तक इससे बाहर हैं? उदाहरण के लिए पहले आई मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों को ईएसआई का लाभ मिल सकता है। अगर ऐसा होता है तो सहयोग की क्या व्यवस्था होगी? क्या सहयोग के तौर तरीकों में बदलाव किया जाएगा?

ये सभी प्रश्न प्रासांगिक हैं लेकिन गहन मसला यह है कि क्या अधिक लोगों को ईएसआई में लाने का जतन देश की खस्ता सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का हिस्सा है? यदि ऐसा है तो फिर वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए। लगातार सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है कि चिकित्सा के मद में होने वाला खर्च कई परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेलने की अहम वजह बन सकता है। निजी क्षेत्र ने चिकित्सा सुविधाओं की कमी पूरी करने में तेजी दिखाई है लेकिन इसके बावजूद हमारे यहां यह पर्याप्त नहीं है। गत वर्ष देश में प्रति 1,000 लोगों पर 1.3 बिस्तर थे। यह आंकड़ा अंतरराष्टï्रीय स्तर पर सुझाई गई न्यूनतम संख्या से कम है। बुरी बात यह है कि इनमें भी कई सुविधाएं ऐसी हैं जो सबकी पहुंच से बाहर हैं। सरकारी अस्पतालों में सेवा का स्तर भी सोचनीय है। इसके लिए काफी हद तक मरीजों की भीड़ भी जिम्मेदार है।

इस बीच निजी अस्पतालों की छवि ऐसी बन गई है कि वे खूब लंबे-चौड़े बिल बनाते हैं। ऐसे में अगर मध्य वर्ग भी अस्पताल में भर्ती होने से घबरा रहा है तो देश की अधिसंख्य आबादी, जो गरीबी रेखा के नीचे या उसके ठीक ऊपर जीवन बिताती है, का यह भय तो समझा जा सकता है कि बीमारी उसकी बचत पर क्या कहर ढाएगी। ईएसआई में और अधिक लोगों को शामिल करने का फैसला समझदारी भरा हो सकता है लेकिन वास्तव में समूची सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार करना अधिक अहम है। इस काम को न्यूनतम लागत और अधिकतम गति से अंजाम देना होगा। यह बात अभी निश्चित नहीं है कि सरकार इस दिशा में क्या योजना बना रही है। डर यह है कि वह केवल तकनीकी और डिजिटल उपायों के भरोसे न रह जाए और औपचारिक बीमा योजना को ही धीमी गति से न बढऩे दे। यह अपर्याप्त साबित हो सकता है। इसके साथ-साथ सरकारी चिकित्सा के बुनियादी ढांचे का तेजी से प्रसार आवश्यक है। ऐसा होने से गुणवत्ता सुधरेगी और लागत कम होगी।

इतना ही नहीं, सबसे प्रभावी हस्तक्षेप तृतीयक चिकित्सा सुविधा तक सीमित नहीं है (अधिकांश निजी निवेश इसी क्षेत्र में है) बल्कि जरूरत इस बात की है कि स्थानीय स्तर पर बेहतर क्लीनिक और डिस्पेंसरी खोली जाएं। दिल्ली का उदाहरण लें जहां प्रति 1000 व्यक्तियों पर देश के औसत के मुकाबले दोगुने बिस्तर हैं। वर्ष 2014 के आंकड़े के मुताबिक प्रति हजार लोगों पर 2.7 बिस्तर हैं। वहां 15 और सरकारी अस्पताल बन रहे हैं हालांकि इस प्रयास में अनुमान से अधिक समय लग रहा है। लेकिन दिल्ली सरकार का अधिक सार्थक हस्तक्षेप वह नजर आ रहा है जिसके तहत वह 1,000 मोहल्ला क्लीनिक बना रही है। इन स्थानों पर चिकित्सा जांच सस्ती दरों पर होगी। कोशिश है कि इन क्लीनिक में चिकित्सक मरीज को कम से कम 10 मिनट तक देखें। यह दर मौजूदा औसत से काफी बेहतर होगी। इन क्लीनिकों में चिकित्सा संबंधी सूचनाओं को क्लाउड पर रखा जाएगा ताकि अलग-अलग जगह के भिन्न-भिन्न समय पर भी चिकित्सक आसानी से सूचनाएं प्राप्त कर सकें। इस प्रयास पर सावधानीपूर्वक नजर रखी जानी चाहिए और सफल होने पर इसका अनुकरण किया जाना चाहिए।

Keyword: health, hospital, clinic, ESIC,,
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