बिजनेस स्टैंडर्ड - ऑनलाइन धोखाधड़ी से निपटने के उपाय जरूरी
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ऑनलाइन धोखाधड़ी से निपटने के उपाय जरूरी
देवाशिष बसु /  July 15, 2015

डिजिटल इंडिया पहल के बीच हम ऑनलाइन बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों को होने वाली परेशानी को अनदेखा नहीं कर सकते। देश को डिजिटल बनाने की राह में यह एक अहम चुनौती है। बता रहे हैं देवाशिष बसु

बैंक खातों के हैक होने और उनमें पैसों की हेराफेरी की खबरें आम हैं। लेकिन ऐसी ऑनलाइन धोखाधड़ी के शिकार होने वाले ग्राहकों की समस्या का आसान निवारण अक्सर नहीं होता। आमतौर पर बैंक ग्राहकों को ही दोषी ठहरा देते हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से दिसंबर 2014 के बीच क्रेडिट कार्ड, एटीएम कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग से जुड़ी धोखाधड़ी की 9,300 से अधिक घटनाएं सामने आईं। इसकी वजह से करीब 60 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि साइबर धोखाधड़ी के विशेषज्ञों की मानें तो यह आंकड़ा वास्तविक से बहुत कम है।

इसकी वजह एकदम साधारण है: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों से यह नहीं कहा है कि उनको ऑनलाइन धोखाधड़ी का वर्गीकरण किस प्रकार करना है। हां, मेरे सूत्रों के मुताबिक आईसीआईसीआई बैंक ऐसे मामलों को धोखाधड़ी की वास्तविक शिकायतों की तरह दर्ज करता है। एचडीएफसी बैंक केवल उन्हीं मामलों को दर्ज करता है जिनमें धोखाधड़ी साबित हो जाती है। वह शिकायतों को दर्ज नहीं करता।

जाहिर है एक ओर जहां दोनों बैंकों के एटीएम और कार्ड की संख्या कमोबेश बराबर है वहीं शिकायतों की बात करें तो एचडीएफसी ऑनलाइन धोखाधड़ी की बहुत कम शिकायतें दर्ज करता है। मेरे सूत्रों के मुताबिक इस हालत को देखते हुए आईसीआईसीआई बैंक ने आरबीआई से अनुरोध किया कि वह ऑनलाइन फ्रॉड की व्याख्या करते ताकि सभी बैंक उस परिभाषा के आधार पर मामलों को रिपोर्ट कर सकें। लेकिन आरबीआई ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। अब जबकि यह काम पूरी तरह बैंकों के हवाले है तो उन्होंने ऑनलाइन मामलों को दबाने का तय किया। इसका परिणाम यह हुआ कि फिलहाल हमारे पास ऑनलाइन धोखाधड़ी के विश्वसनीय आंकड़े तक नहीं हैं।

यह भी स्वीकार करना होगा कि इस धोखाधड़ी से प्रभावित ग्राहकों का आंकड़ा बैंकों के ऑनलाइन बैंकिंग, एटीएम या डेबिट कार्ड का प्रयोग करने वाले ग्राहकों की तुलना में काफी कम होता है। लेकिन यह बात परेशान करने वाली है कि आरबीआई, बैंकों की आंतरिक नीतियों, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, आचार संहिता और न्याय प्रक्रिया, इन सबके बीच कोई ऐसी स्पष्ट नीति नहीं है जिसकी मदद से ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के पीडि़तोंं की समस्याओं को जल्दी दूर किया जा सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डिजिटल इंडिया अभियान इस धारणा पर आधारित है कि आने वाले दिनों में हमारे जीवन में इंटरनेट का दखल लगातार बढ़ता जाएगा। लेकिन उसके उलट अभी भी ऑनलाइन मामलों में सुरक्षा और समस्या निवारण को उतनी तवज्जो नहीं दी जा रही है जितनी कि डिजिटल इंडिया में जरूरी होगी। अगर बैंकों के भरोसे छोड़ दिया जाए तो वे ऑनलाइन धोखाधड़ी के हर मामले को दबा देंगे। सबसे पहले वे ग्राहकों को दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने अपने एटीएम, क्रेडिट कार्ड को सुरक्षित क्यों नहीं रखा? यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा। उसके बाद जून 2014 में एक कारोबारी समाचारपत्र ने अपने आलेख में लिखा कि आरबीआई ऑनलाइन धोखाधड़ी के शिकार बैंक ग्राहकों को राहत देने जा रहा है। कहा गया कि जिन लोगों को भी अपने पासवर्ड के चलते ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले में अपने बैंकों से दिक्कतदेह लड़ाई लडऩी पड़ी है उन सभी को एक नए दिशानिर्देश के बाद ऑनलाइन धोखाधड़ी से कहीं अधिक बेहतर बचाव मिलेगा। हालांकि बैंक बदलाव को अपनाने के बहुत अधिक उत्सुक नहीं हैं और उनमें से अधिकांश को अभी इसे औपचारिक रूप से स्वीकार करना है लेकिन उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है। रिजर्व बैंक के पास बैंकिंग नियमों को तय करने का अधिकार है और संबंधित निर्देश भी बैंकिंग कोड ऐंड स्टैंडर्ड बोर्ड ऑफ इंडिया (बीसीएसबीआई) द्वारा तैयार की गई संहिता का एक हिस्सा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्राहकोंं को नुकसान न उठाना पड़े।

हकीकत में बीसीएसबीआई आरबीआई द्वारा स्थापित एक सफेद हाथी है जो स्वैच्छिक रूप से आचार संहिता तैयार करता है। बैंक उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। बीसीएसबीआई की संहिता यही कहती है कि अगर आप धोखाधड़ी करते हैं या तार्किक ढंग से अपने खाते का ध्यान नहीं रखते हैं तो अपने खाते में होने वाले तमाम नुकसान के लिए आप खुद जवाबदेह होंगे। इसमें नया क्या है और कौन यह तय करेगा कि ग्राहक ने जवाबदेही दिखाई है अथवा नहीं? पहले की तरह अभी भी सीधे सीधे पूरा दोष ग्राहकों पर डाला जा सकता है। संहिता में यह भी कहा गया है कि कार्ड का दुरुपयोग होने की स्थिति में उपभोक्ता केवल उतना ही दावा कर सकेगा जितना कि कार्ड के साथ उल्लिखित शर्तों में अंकित होगा। सच तो यह है कि कार्डों के साथ नियम एवं शर्तें इतने छोटे अंकों में अंकित होती हैं कि शायद ही कोई ग्राहक उनको पढ़ पाता हो। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ऐसे नियमों से ग्राहकों की स्थिति में कोई भी बदलाव आएगा?

विडंबना यह है कि आज कई एजेंसियां ऑनलाइन फ्रॉड से निपटने के काम में लगी हुई हैं लेकिन सैद्धांतिक तौर पर उनके कामकाज में कोई तालमेल नहीं है। आप बैंक से, बैंकिंग लोकपाल से और पुलिस से शिकायत कर सकते हैं। महाराष्ट्र में आप चाहें तो साइबर अपराध न्यायालय भी जा सकते हैं। पुलिस के पास इस तरह के अपराधों से निपटने का वक्त कम ही होता है क्योंकि इसमें दौड़भाग वाले बहुत सारे काम होते हैं जिसके लिए भारी शारीरिक कवायद और बजट दोनों चाहिए। आरबीआई ऑनलाइन लेनदेन की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने का प्रयास कर रहा है लेकिन इसके बावजूद धोखाधड़ी के मामलों में जवाबदेही बैंकों पर नहीं डाली जाएगी। विचित्र बात यह है कि मुंबई में साइबर अपराध अदालत ने ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा किया है।

ऐसे में क्या किया जा सकता है? बीसीएसबीआई के उलट ब्रिटेन में फाइनैंशियल रिड्रेस एजेंसी ने ऐसे नियम बनाए जो बैंकों को मजबूर करते हैं कि वे गलत भुगतान या निकासी को तत्काल वापस लौटाएं। केवल उन्हीं स्थितियों में पैसा लौटाने से बचा जा सकता है जब इसकी ठोस वजह मौजूद हो। एजेंसी के मुताबिक बैंक केवल यह कहकर नहीं बच सकते कि उपभोक्ता अपने कार्ड, पासवर्ड आदि का सही ढंग से इस्तेमाल करें बल्कि उनको यह साबित करना होगा कि उपभोक्ता ने धोखाधड़ी की या वह वाकई में लापरवाह था। एजेंसी ने उपभोक्ताओं को किसी अवैध लेनदेन की जानकारी देने के लिए 13 माह का समय भी दे रखा है।

ये नियम एकदम सामान्य सिद्घांत पर आधारित हैं। जो पक्षकार समस्या को सही ढंग से हल करने की स्थिति में है उसे साइबर धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। जाहिर है बैंक ही पक्ष होता है। आरबीआई के लिए ऐसा करना कितना कठिन है? उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी के डिजिटल भारत के बारे में जोरशोर से चल रही बातों में ऐसी सामान्य और समझदारी भरी बातें भी शामिल हों।

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