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पोषक तत्त्वों के अनुपात में सुधार से बढ़ेगी उर्वरता और उत्पादकता
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  July 15, 2015

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) ने अब यह मान लिया है कि उर्वरकों का 4:2:1 का अनुपात आदर्श अनुपात नहीं है और उसे पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। परंतु अभी भी कई ऐसे राज्य हैं जहां खेतों में बेधड़क असंतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है बिना इसके हानिलाभ पर कोई विचार किए। क्या 4.2:1 का अनुपात खेतों में इस्तेमाल करने के लिए नाइट्रोजन (एन), फॉस्फोरस (पी) और पोटाश (के) का संतुलित अनुपात माना जा सकता है और क्या इसका खेतों में बिना हिचक इस्तेमाल किया जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर है नहीं।

वास्तव में यह मानक एक मिथक के सिवा कुछ भी नहीं है। मिथक भी ऐसा जो वर्षों से यूं ही चला आ रहा है। इसकी सच्चाई का परीक्षण करने के लिए कभी कोई आधिकारिक जांच नहीं की गई। शायद कोई नहीं जानता है कि आखिर कब, कैसे और किस आधार पर यह देश में उर्वरकों के इस्तेमाल का मानक बनकर सामने आ गया। बहरहाल आईसीएआर के कथन के बाद अब इस भ्रामक अवधारणा को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए। अब यह बात साफ हो चुकी है कि उर्वरकों का कोई ऐसा मानक मिश्रण नहीं हो सकता है जो पूरे देश पर एकसमान लागू होता हो। अलग-अलग फसल और भिन्न-भिन्न क्षेत्र के लिए यह अलग होता है। इसके निर्धारण के पहले मिट्टïी में पोषक तत्त्वों की मौजूदगी तथा कई अन्य कारकों का ध्यान रखना होता है। 4:2:1 का मानक केवल कुछ ही स्थितियों में लागू हो सकता है जहां फसल की पैदावार पर इस अनुपात में दिए जाने वाले उर्वरक पोषण का सकारात्मक असर दिखता हो। मिसाल के तौर पर पंजाब और हरियाणा में गेहूं और धान की खेती में इसका प्रयोग।

बाकी जगहों पर इसके प्रयोग सफल नहीं हुए। लेकिन इसके बावजूद अधिकांश सरकार प्रकाशनों में 4:2:1 को उर्वरक इस्तेमाल के मानक के रूप में पेश किया जाता है। इन प्रकाशनों में सालाना आर्थिक समीक्षा भी शामिल है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि देश के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान संस्थान आईसीएआर ने अब यह मान लिया है कि उसने 4:2:1 को पोषण का मानक मानकर भूल की थी। आईसीएआर ने वर्ष 2014-15 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि इस मानक को देश भर पर लागू नहीं किया जा सकता है। उसने संकेत दिया है कि इसके बजाय 2.5:1.4:1 का अनुपात कहीं अधिक बेहतर साबित हो सकता है।

बहरहाल, अगर नए मानक के आधार पर देखा जाए तो कई राज्य संतुलित उर्वरक इस्तेमाल में चूकते नजर आते हैं। इनमें पश्चिम बंगाल, हरियाणा, गुजरात, बिहार, राजस्थान और असम आदि शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में इन तीनों उर्वरकों का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो रहा है जबकि देश के कई अन्य राज्यों में इनका इस्तेमाल चौंकाऊ ढंग से कम है। आईसीएआर के मुताबिक, 'नीति निर्माताओं द्वारा उर्वरकों के इस्तेमाल में भारी कमी और असंतुलन की समस्या को जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए।' वर्ष 2009 और 2011 के बीच खेती के लिए वांछित पोषण और वास्तविक अनुपात के आंकड़ों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह असंतुलन आम धारणा के विपरीत चिंताजनक ढंग से ज्यादा है।

उदाहरण के लिए राजस्थान जैसे राज्य में एनपीके अनुपात 25:11:1 है जबकि वहां की कृषि संंबंधी परिस्थितियों को देखते हुए आदर्श स्थिति में इसे 10:5:1 होना चाहिए था। इसी तरह उत्तराखंड में वास्तविक एनपीके अनुपात 10:2:1 है जबकि इसे 3:1.5:1 होना चाहिए था। उर्वरकों के बेतहाशा इस्तेमाल के मामले में पंजाब और हरियाणा भी बहुत पीछे नहीं हैं। पंजाब में जहां एनपीके अनुपात 21:6:1 है वहीं हरियाणा में यह 19:6:1 है। हकीकत यह है कि इन दोनों ही राज्यों में इसे 4:1.6:1 से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

आईसीएआर के दस्तावेज में दिए गए आंकड़े यह साफ इशारा करते हैं कि अधिकांश किसान या तो उर्वरकों के इस्तेमाल के मामले में मनमाने फैसले लेते हैं या फिर उनको इस मसले पर भ्रमित किया गया है। नाइट्रोजन अर्थात यूरिया का इस्तेमाल अधिकांश मामलों में जरूरत से काफी ज्यादा किया गया। सरकार की खराब उर्वरक मूल्य निर्धारण नीति और अन्य उर्वरकों तथा यूरिया की कीमतों में अंतर इसकी अहम वजह दिखती है। किसानों को मृदा परीक्षण पर आधारित उर्वरक प्रयोग सलाह न मिलना भी उर्वरकों के असमान इस्तेमाल की वजह है।

अच्छी बात यह है कि अब सरकार इस समस्या से निपटने का प्रयास कर रही है। इस क्रम में किसानों को मिट्टïी की जांच के परिणामों से अवगत कराया जा रहा है और मिट्टïी की गुणवत्ता का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाओं के नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है। लेकिन दुखद बात यह है कि अब तक विभिन्न उर्वरकों की कीमतों में व्याप्त विसंगति को दूर करने की कोई कोशिश नहीं की गई है।

फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों को नियंत्रणमुक्त कर दिया गया है और अब वे पोषण आधारित सब्सिडी व्यवस्था के अधीन हैं। लेकिन अज्ञात कारणों से यूरिया को नियंत्रणमुक्त नहीं किया गया है। इस विसंगति को जल्दी दूर किया जाना आवश्यक है ताकि यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल को कम किया जा सके और पोषक तत्त्वों के इस्तेमाल को एक हद तक संतुलित बनाया जा सके। फसल उत्पादकता बढ़ाने और मिट्टïी की उर्वरता को कायम रखने के लिए ऐसा करना अत्यंत आवश्यक है।

Keyword: agriculture, jins, food, crop, monsoon, ICAR,
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