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रक्षा खरीद की प्रक्रिया में सुधार लाना जरूरी
नितिन पई /  July 07, 2015

सरकारी खरीद की अग्रिम योजनाएं बनाई जानी चाहिए और उनको कैबिनेट की मंजूरी दिलानी चाहिए। केवल सेवाओं और रक्षा मंत्रालय की मंजूरी अपर्याप्त है। विस्तार से बता रहे हैं नितिन पई
चंद रोज पहले भारतीय सेना ने घोषणा की कि वह दुनिया की सबसे बड़ी असॉल्ट राइफल खरीद की योजना को रद्द कर रही है। इस योजना के तहत 65,000 मल्टी कैलिबर हथियार खरीदे जाने थे और घरेलू स्तर पर 113,000 हथियारों का उत्पादन किया जाना था। इसकी कुल लागत करीब 4,850 करोड़ रुपये थी। इस तरह देश के सैनिकों को आधुनिक राइफल दिलाने की सात साल पुरानी कवायद बिना सकारात्मक निष्कर्ष के समाप्त हो गई।
इस वर्ष मई में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की जिसमें उसने सशस्त्र बलों के गोला-बारूद प्रबंधन की समीक्षा की थी। उसने पाया कि सेना जरूरी 40 दिन के बजाय केवल 20 दिनों का ही हथियार जुटाकर रखने में सक्षम थी। मार्च 2013 तक सेना के पास जरूरी हथियारों में कम से कम आधे की कमी थी। सीएजी की राय के मुताबिक, 'इस कमी ने सेना की कार्रवाई और प्रशिक्षण की तैयारी को प्रभावित किया।'
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हथियार फैक्टरियों से पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पा रहा था जबकि रक्षा मंत्रालय बाहर से पर्याप्त खरीदारी नहीं कर पा रहा था। गुणवत्ता नियंत्रण भी पर्याप्त नहीं था और आपूर्ति शृंखला का प्रबंधन भी समुचित तरीके से नहीं हो पा रहा था।
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सशस्त्र बलों के पास पर्याप्त बंदूकें और गोलियां ही नहीं थे। हमारे सैनिकों से यह कहा तो जाता है कि वे दो मोर्चों पर लड़ाई की पूरी तैयारी रखें लेकिन हकीकत यह है कि हम आधे मोर्चे पर लड़ाई के लिए भी सही तरीके से तैयार नहीं हैं। यह ध्यान देने की बात है कि यहां पर जिक्र किसी उच्च तकनीक वाले एयरक्राफ्ट कैरियर या लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम प्रक्षेपास्त्र की नहीं हो रही है। बल्कि हम इनफैन्ट्री के हथियारों की बात कर रहे हैं जहां उन्हें समुचित हथियार मुहैया कराया जाना तक बाकी है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सुरक्षित गोलाबारूद की स्थिति में अहम सुधार लाने और इस अंतर को वर्ष 2016 के अंत तक पाटने का इरादा जताया है लेकिन केवल आपूर्ति शृंखला की समीक्षा करके यह विश्वास बहाल नहीं किया जा सकता है कि इस कमी को समय रहते दूर ही कर लिया जाएगा।
ऐसा नहीं है कि देश के लिए टैंकों, प्रक्षेपास्त्रों, बंदूकों, एयरक्राफ्ट और कैरियर की खरीद और उत्पादन में ही गड़बड़ी है। ऐसा लगता है कि हम राइफल और गोलाबारूद जैसी अपेक्षाकृत सामान्य चीजों की खरीद में भी निहायत कमजोर हैं। इस दौर में हर चीज के लिए भ्रष्टïाचार, बिचौलियों और घोटालों को जिम्मेदार ठहरा देना आसान है। आमतौर पर यह बात सही भी है लेकिन भ्रष्टïाचार हमेशा से भारी गड़बड़ी का लक्षण मात्र रहा है। चूंकि हर सरकार समस्या से निपटने के लिए इसी ढर्रे पर चलती है इसलिए व्यवस्थागत खामी की हमेशा अनदेखी कर दी जाती है।
जरा इस बात पर विचार कीजिए कि सरकारी खरीद की प्रक्रिया कैसे काम करती है। रक्षा मंत्रालय दीर्घावधि की एकीकृत परिप्रेक्ष्य योजना (एलटीआईपीपी) बनाता है जिसका दायरा करीब 15 वर्ष का होता है। यह वास्तव में थल सेना, नौसेना और वायुसेना की जरूरतों का योग होता है। एलटीआईपीपी के तहत पंचवर्षीय योजना तैयार होती है। इसके तहत सालाना खरीद की योजना बनती है। जरूरतों का खाका तीनों सेनाओं द्वारा तैयार किया जाता है। रक्षा अधिग्रहण परिषद एलटीआईपीपी और पंचवर्षीय योजना को मंजूरी देती है। इसके बाद रक्षा खरीद बोर्ड सालाना अधिग्रहण योजनाओं को मंजूरी देता है। सरकारी खरीद जिन नीतियों के तहत की जाती है वे अत्यंत जटिल और विवादास्पद हैं तथा उनमें प्राय:संशोधन किया जाता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति इस प्रक्रिया में शामिल नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि वित्त मंत्रालय इस पूरी प्रक्रिया में कहीं नहीं है।
अगर योजना प्रक्रिया इच्छा के मुताबिक काम करती है तो भी इसका अर्थ यही हुआ कि रक्षा मंत्रालय निजी तौर पर जरूरतों को चिह्निïत करता है और उनकी खरीद की दिशा में आगे बढ़ जाता है। अब जरा इस बात पर विचार कीजिए: हर कोई यह मानता है कि देश को पूरी तरह तैयार रहने की आवश्यकता है।
सेना, नौसेना और वायुसेना को तब अपनी-अपनी नीतियां और कार्ययोजना तैयार करनी होंगी। उसके लिए उन्हें जरूरतों की एक सूची तैयार करनी होगी। हालांकि अपने स्तर पर उनको यह पता है कि रक्षा बजट मोटे तौर पर उनके बीच एक तयशुदा अनुपात में बंटा हुआ है। उसके बाद रक्षा मंत्रालय इन सभी चीजों को खरीदने का प्रयास करता है। ऐसे तमाम नियम बनाए गए हैं ताकि भ्रष्टïाचार को कम किया जा सके और स्वदेशीकरण को अपनाया जा सके लेकिन विभिन्न सेवाओं के बीच खरीद की तैयारी को लेकर बहुत अधिक तालमेल देखने को नहीं मिलता है। एकीकृत रक्षा मुख्यालय विभिन्न सेवाओं के निजी मुख्यालयों की तुलना में काफी कमजोर है और वह इन खरीद योजनाओं में तालमेल नहीं बना पाता।
इसका अर्थ यह हुआ कि कुलमिलाकर देश के सशस्त्र बल समुचित तालमेल के अभाव में बड़ी संख्या में एक समान हथियार खरीदते हैं और देश की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर एक समान हथियारों की कमी से दो-चार होते हैं। उपरोक्त तरीके में हम कभी जान ही नहीं पाते हैं कि हमारे पास किन हथियारों की कमी है। इसे दूर करने के लिए योजना के स्तर से ही चीजों को एक साथ जोडऩा होगा।
जैसा कि हम व्यवहार में देखते हैं मौजूदा प्रक्रिया के निष्कर्ष असंतोषजनक हैं। इसलिए क्योंकि सरकारी खरीद प्रक्रिया पेचीदा है और घरेलू रक्षा उत्पादन का माहौल ऐसा नहीं है कि उससे जरूरतें पूरी की जा सकें। नतीजा: जरूरी उपकरणों की कमी और भ्रष्टïाचार में इजाफा।
इकलौता तरीका यही है कि एलटीआईपीपी को तीनों सेनाओं द्वारा मिलकर तैयार किया जाए और इसके लिए रक्षा स्टाफ प्रमुख की नियुक्ति का इंतजार भी नहीं किया जाना चाहिए। एलटीआईपीपी को यह बताना चाहिए कि आखिर देश यह कैसे सुनिश्चित करेगा कि रक्षा क्षमताएं इस क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए पूर्णतया तैयार रहें और वह भी समय से पहले। इस संबंध में बनने वाली योजना को कैबिनेट द्वारा आगे बढ़ाया जाना चाहिए। योजना प्रक्रिया में सुधार की बदौलत देश की रक्षा तैयारी  में पूरा बदलाव आएगा। देश के नागरिकों की असल चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि असॉल्ट राइफल की खरीद का दुनिया का सबसे बड़ा सौदा रद्द हो गया। उनकी चिंता यह होनी चाहिए कि यह निविदा एक ऐसी राइफल के लिए थी जो अब तक बनी ही नहीं है।

Keyword: Defence procurement, weapons, cabinet,
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