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कृषि बाजार सुधार
संपादकीय /  July 07, 2015

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने नये 'राष्टï्रीय कृषि बाजार' के निर्माण की योजना की घोषणा की है। इस बाजार के अंतर्गत 585 बड़ी और नियमित मंडियों को तीन साल की अवधि में इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म की मदद से जोड़ा जाएगा।
फिलहाल कृषि उत्पाद विपणन समितियों (एपीएमसी) द्वारा संचालित मौजूदा कृषि विपणन व्यवस्था में कई समस्याएं हैं। अगर नई व्यवस्था कामयाब रही तो ये समस्याएं दूर हो सकती हैं। मिसाल के तौर पर मंडी शुल्क की बहुलता और विभिन्न बाजारों में कारोबार के लिए लाइसेंस इसके उदाहरण हैं।
मूल्य निर्धारण में तकनीक के सीमित इस्तेमाल के चलते देश के अलग अलग हिस्सों में मूल्य में भारी अंतर पाया जाता है। इसके अलावा किसानों को मिलने वाली कीमत तथा अंतिम उपभोक्ता द्वारा कृषि जिंस के लिए चुकाई जाने वाली कीमत में भी भारी अंतर होता है। उत्पादक और उपभोक्ता दोनों इससे प्रभावित होते हैं। नया विचार है एक इलेक्ट्रॉनिक और खुली मूल्य निर्धारण व्यवस्था कायम करने का, जिसमें एपीएमसी तथा तथा अन्य बिचौलियों की बहुत सीमित भूमिका हो।
ऐसा करने से समस्या दूर हो सकती है। नए बाजार में एकल कारोबारी लाइसेंस जारी करने तथा बाजार शुल्क को एक जगह वसूलने की प्रक्रिया को अधिक सामान्य बनाया जाएगा। यह लाइसेंस विभिन्न राज्यों में लागू होगा। लघु कृषक कृषि कारोबार संकाय (एसएफएसी) एग्री-टेक इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड और सरकारी अनुदान की मदद से इस बाजार की स्थापना करेगा। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि निजी बाजारों को भी मूल्य निर्धारण के लिए इस ई-प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की मंजूरी हो लेकिन वे किसी तरह की सरकारी मदद के पात्र नहीं होंगे।
यह वास्तव में एक बड़ा कदम है लेकिन इसमें भी वही समस्याएं बरकरार हैं, जो कृषि बाजार में सुधार के पिछले प्रयासों में सामने आई थीं। उदाहरण के लिए कृषि विपणन राज्य का मसला है, इसलिए नई व्यवस्था की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों के सहयोग पर निर्भर करेगी जो अतीत में बहुत मनोनुकूल नहीं रहे हैं। राज्यों के राजनेता नहीं चाहते कि मंडी से आने वाला राजस्व और कृषि विपणन से जुड़े राजनीतिक दबदबे का नियंत्रण उनके हाथ से निकले। समस्या इसलिए भी है क्योंकि केंद्र सरकारें राज्यों को उनके एपीएमसी अधिनियम में संशोधन के लिए मनाने में विफल रही हैं, जबकि यह सबसे बेहतर उपाय हो सकता था। काफी दबाव के बाद कई राज्यों ने अपने विपणन कानूनों में बदलाव किया है लेकिन वे बदलाव शायद ही उस आदर्श एपीएमसी कानून के आसपास भी हों, जैसा केंद्र चाहता है।
कुछ राज्यों ने तो संशोधित कानूनों के प्रवर्तन के लिए नियम तक नहीं बनाए हैं। कई राज्यों ने केंद्र के इस अनुरोध पर भी ध्यान नहीं दिया है कि सब्जियों और फलों जैसे खराब होने वाले उत्पादों को एपीएमसी मंडी के जरिये अनिवार्य कारोबारी वस्तुओं की सूची से हटा दिया जाए। इसके अलावा एपीएमसी में अक्सर उन राजनेताओं का दबदबा होता है जो सत्ताधारी वर्ग से होते हैं। ऐसे में वे राज्य सरकारों को एकीकृत राष्टï्रीय बाजार में शामिल होकर अपना कद कम नहीं करने देंगे। इस नई व्यवस्था में बिचौलिये काफी हद तक अपनी प्रासंगिकता खो देंगे।
वे भी इस अहम बाजार सुधार को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि नई व्यवस्था चिह्निïत गोदामों से एक निश्चित गुणवत्ता वाले सामान की आपूर्ति सुनिश्चित करने की बात कहती है लेकिन जब बहुत अधिक उत्पाद हों और उनमें काफी अंतर हो तो ऐसा करना आसान नहीं होगा। याद रखिये इस मोर्चे पर विफलता नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) की नाकामी की एक बड़ी वजह थी। अगर एसएफएसी को कृषि सुधार का काम शुरू करना है तो इन पुराने मसलों से सीधे निपटना होगा।

Keyword: agriculture, jins, CCEA,
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