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अच्छे दिनों के आगमन के लिए करनी होगी लंबी प्रतीक्षा!
मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  July 01, 2015

लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के चुनावी वादे वाले अच्छे दिनों के आने के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होगी। लेकिन उससे पहले देसी और वैश्विक मोर्चे पर आ रहे संकेत नकारात्मक ही हैं। सबसे सकारात्मक संकेत यही मिला है कि मॉनसून आ गया है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि मौसम का मिजाज ही कुछ ऐसा हो चला है कि वह आंखमिचौली खेलता रहता है। घरेलू मोर्चे पर देखा जाए तो महंगाई कम होने से वृहद आर्थिक स्थिरता में सुधार हुआ है लेकिन अगर मॉनसून बेहतर बना रहता है तो भी भविष्य में राजकोषीय स्थिरता बरकरार रखने में कई तरह की दिक्कतें आएंगी। राजकोषीय स्थिरता को प्रभावित करने वाले दो कारक हो सकते हैं-किसानों को राहत की राजनीतिक रूप से संवेदनशील मांग तथा सरकारी बैंकों को आर्थिक मदद पहुंचाने की जरूरत। नया निवेश जुटाने के लिए सरकारी बैंक ऋण देते रहें, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें पूंजी मुहैया कराई जाए।

परंतु वृहद स्थिरता में सुधार के बावजूद अब तक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि कारोबारियों का आत्मविश्वास बहाल नहीं हो सका है। अगर ऐसा हो पाता तो नए निवेश को बढ़ावा देने और विकास दर को मजबूत बनाने में भरपूर मदद मिलती। बहरहाल, अगर कुछ महीनों में निवेश की भावना बहाल हो भी जाती है तो भी कारोबारी मुनाफे में कमी तथा बढ़े हुए ऋण के कारण बनी कमजोरी कुछ और तिमाहियों तक अर्थव्यवस्था को परेशान करती रहेगी। बिना औद्योगिक निवेश को गतिशील किए विकास दर में इजाफा तथा अच्छे दिन के आगमन की बात दूर की कौड़ी है।

घरेलू स्थिति न तो बहुत अच्छी है न बुरी। असल चिंता वैश्विक अर्थव्यवस्था के मोर्चे से पैदा हो रही है। ग्रीस संकट के बाद तो हालात और बुरे ही होंगे। इन हालात ने वृद्घि दर में सुधार की संभावनाओं को ठेस पहुंचाई है। सबसे बुरी बात यह प्रतीत हो रही है कि मौजूदा वैश्विक हालात में कोई ऐसा प्राधिकार नहीं नजर आ रहा है जो अपने दम पर यह सुनिश्चित करे कि दुनिया के देश ऐसी नीतियों का पालन करें जो हालात को बेहतर बनाने वाली हों। इसी बात ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को मजबूर किया और उन्होंने हाल ही में लंदन में दिए गए अपने भाषण में मंदी की आहट की ओर संकेत करते हुए कहा था, 'डर है कि एक ऐसी दुनिया में जहां मांग कमजोर है, हमें मांग के लिए जोखिमभरी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है...ऐसे में जब अपारंपरिक नीतियां (मसलन शून्य ब्याज दर और आर्थिक प्रोत्साहन) भी समाप्त हो जाएंगी तब वित्तीय क्षेत्र के लिए भी जोखिम पैदा हो जाएगा।' स्पष्टï है कि दुनिया के सामने जोखिम यह है कि घरेलू मांग कैसे तेज की जाए। वह भी ऐसी स्थिति से बचते हुए जहां दुनिया भर के देश लगातार प्रत्यक्ष विनिमय दर हस्तक्षेप अथवा अपारंपरिक मौद्रिक नीति के जरिये अपनी विनिमय दर कम करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

इस परिदृश्य में सरकार यही कोशिश कर रही है कि कारोबारी माहौल को आसान बनाया जाए और बुनियादी क्षेत्र में निवेश सुनिश्चित किया जाए। कारोबारी माहौल में सुधार से जहां उत्पादकता बढ़ेगी वहीं बुनियादी निवेश मांग बढ़ाने और लंबी अवधि में आकर्षक प्रतिफल हासिल करने में मददगार साबित होगा। लेकिन समस्या यही है कि इन क्षेत्रों में शनै:शनै: बढऩा ही बुद्घिमानी है। प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाया जा सकता है। उनका प्रशासनिक कामकाज आसान किया जा सकता है लेकिन नियामकीय विशेषाधिकार को कम किया जाना जरूरी है। यद्यपि इसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। शौचालयों की जांच के लिए फैक्टरी इंस्पेक्टर की आवश्यकता नहीं है लेकिन विनिर्माण क्षेत्र के श्रमिकों को न्यूनतम वेतन मिल रहा है या नहीं, यह पता करना आवश्यक है। पारदर्शिता की बात करें तो महाराष्टï्र में कई करोड़ के सरकारी ऑर्डर बिना ई-निविदा के जारी किया जाना अभी हाल की ही घटना है।

चूंकि बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश निजी सार्वजनिक उपक्रम के जरिये हो रहा है इसलिए मजबूती से तैयार परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में वक्त लगता है। कई अनुभवों के मामले में हमें कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा है। गजेंद्र हल्दिया ने खामी रहित आदर्श अनुबंध तैयार करने की कोशिश की है, फिलहाल चीजों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मानकों को शिथिल किया गया है लेकिन भविष्य में विवादों का पैदा होना तय है। दो कारक ऐसे हैं जो अच्छे दिन को प्रभावित करते हैं। पहला, शुरुआत में अच्छी बारिश ने सब्जियों की कीमत कम करने में मदद की है और किसानों द्वारा फसल बुआई तेज करने की खबर ने बाजार के रुझान बेहतर किए हैं। इस बीच वैश्विक वृद्घि दर में गिरावट आई है और भारतीय निर्यात का खराब प्रदर्शन जारी रहा है। उधर ग्रीस संकट ने नए किस्म की अस्थिरता को जन्म दिया है। देखना होगा कि यह संकट समाप्त होता है या लीमन ब्रदर्स के पतन की तरह एक और मंदी की वजह बनता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था से भारतीय अर्थव्यवस्था का संबंध भी एक अहम पहलू है। ऐसे यह कहा जा सकता है कि संप्रग के पहले कार्यकाल के दौरान हासिल बेहतरीन विकास दर और संप्रग दो की विफलताओं का संबंध काफी हद तक वैश्विक आर्थिक माहौल से भी था। जब वैश्विक स्तर पर हालात बढिय़ा थे तो सभी देशों के साथ भारत को भी इसका फायदा मिला। बाद में इसका ठीक उलटा भी हमारे सामने आया। अगर यही मध्यम अवधि की हकीकत है तो अल्पावधि की हालत वास्तव में बहुत खराब मानी जा सकती है। कर प्रशासन को अपनी भृकुटियां टेढ़ी करने की देर है और शेयर बाजार धराशायी हो जाएंगे। शेयर बाजार में विदेशी पूंजी की आवक लगातार बढ़ रही है और इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता की आशंका भी। अगर आप अच्छे दिनों की शीघ्र आगमन की संभावना पर यकीन करते हैं तो अच्छी बात है लेकिन इस बीच आप योग करके अपनी हड्डिïयों को मजबूत बनाए रखें ताकि किसी भी तरह के मानसिक झटके को समभाव से झेल सकें।

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