बिजनेस स्टैंडर्ड - हीरा कारोबार में अब इकरारनामा
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हीरा कारोबार में अब इकरारनामा
सोहिनी दास / अहमदाबाद June 16, 2015

देश में हीरा कारोबार की राजधानी सूरत में कारोबारियों को सैकड़ों करोड़ रुपये के डिफॉल्ट और धोखाधड़ी के मामलों से जूझना पड़ रहा है। अब यहां 'चिट्ठी' की जगह कारोबारी पक्षों के बीच औपचारिक इकरारनामा होने लगा है। सूरत के बाद हीरा कारोबार के एक अन्य प्रमुख केंद्र मुंबई में यह उद्योग कुछ समय पहले ही ऐसी पहल शुरू कर चुका है। वहां करीब 50 फीसदी कारोबारी लेन-देन में औपचारिक इकरारनामा करने लगे हैं।

सूरत डायमंड एसोसिएशन (एसडीए) के अध्यक्ष दिनेश नवाडिया ने कहा कि 'चिट्ठी' व्यवस्था आपसी विश्वास पर आधारित है और यह दशकों से प्रचलन में है। उन्होंने कहा, 'हम कारोबारियों में पुरानी व्यवस्था छोडऩे और एक ज्यादा औपचारिक इकरारनामे (जिसे हम झांगड़ कहते हैं) को अपनाने के लिए जागरूकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। इस नई व्यवस्था में स्टांप पेपर पर हीरे, रंग, कटाई, क्लेरिटी और भुगतान का ब्योरा होगा।'

यह उद्योग 90,000 करोड़ रुपये का है। इसमें कारोबारियों को भुगतान में डिफॉल्ट के कारण नुकसान हो रहा है, क्योंकि चिट्ठी व्यवस्था बहुत अधिक विश्वसनीय नहीं है और रातोरात छूमंतर होने वाले कारोबारी व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। नवाडिया ने कहा कि पिछले डेढ़ साल में ही करीब 1,500 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट हुए हैं और उद्योग को इतना बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है। नवाडिया ने बताया कि सोमवार को गुजरात पुलिस ने मुंबई स्थित भारत डायमंड बुअर्स (बीडीबी) के एक कारोबारी को गिरफ्तार किया है, जिसने 53 करोड़ रुपये के भुगतान में डिफॉल्ट किया था। उन्होंने कहा कि जब तक ऐसे डिफॉल्टरों के खिलाफ औपचारिक दस्तावेज और सबूत नहीं होते हैं, तब तक पुलिस भी मदद नहीं कर सकती।

मुंबई के कारोबारी कुछ वर्षों पहले से ही औपचारिक इकरारनामे की व्यवस्था अपना चुके हैं। नवाडिया ने दावा किया कि मुंबई में करीब 50 फीसदी कारोबारी नई व्यवस्था अपना चुके हैं। सूरत के कटारगाम, वराछा में बहुत से हीरा कारोबारियों ने चिट्ठी व्यवस्था से कारोबार करना बंद कर दिया है, ताकि वे नुकसान से बच सकें। लेकिन कुछ कारोबारी अब भी यह पुरानी व्यवस्था अपना रहे हैं। सूरत के एक हीरा कारोबारी और पॉलिशर कीर्ति शाह ने कहा कि यह व्यवस्था अव्यावहारिक थी। शाह ने कहा, 'बहुत सी इकाइयां अब भी पुरानी चिट व्यवस्था अपना रही हैं और बहुत से औपचारिक दस्तावेज की पद्धति नहीं अपनाना चाहते हैं। हालांकि यह सही है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान उद्योग को नुकसान हुआ है, लेकिन यह पिछले कई दशकों से विश्वास के आधार पर चल रहा था।'

उनका मानना है, 'विभिन्न कारोबारों से जुड़े लोगों ने सूरत और मुंबई के हीरा कारोबार में निवेश किया है और इस कारोबार में उन्हें घाटा होने पर वे डिफॉल्ट करते हैं। औपचारिक  दस्तावेज की व्यवस्था अपनाने से स्थिति में काफी सुधार आएगा।' हालांकि नवाडिया को विश्वास है कि अगले एक साल में सूरत स्थित ज्यादातर इकाइयां 'झांगड़' व्यवस्था अपना लेंगी। सूरत के कारोबारियों का मानना है कि पारिवारिक रिश्तों और सामुदायिक संबंधों से पनपने वाला यह उद्योग अब समुदाय की परिधि से बाहर निकल गया है और इसलिए कारोबार के परंपरागत तरीके कारगर नहीं रह गए हैं।

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