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चर्चित चेहरों से नहीं आंकी जाए किसी उत्पाद की विश्वसनीयता
कनिका दत्ता /  June 04, 2015

बिहार की एक अदालत ने अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित और प्रिटी जिंटा आदि अभिनेता-अभिनेत्रियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश जारी किया है। यह आदेश मैगी तथा उसके विविध स्वरूपों का प्रचार करने के लिए जारी किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि अगर कोई सितारा हैसियत वाला कलाकार अपने बेहतर दिनों में कुछ पैसे कमाने के लिए किसी चीज का प्रचार करता है तो उस पर दोषारोपण करने से क्या होगा? जहां तक उपभोक्ता मानकों की बात है तो सबसे अधिक समस्या वहीं नजर आती है। मैगी का मामला सुर्खियों में आने के बाद से कई टीकाकार यह बात कह चुके हैं। क्या बिहार की उस अदालत या किसी भी और अदालत को खाद्य एवं संरक्षा मानक प्राधिकरण के खिलाफ नोटिस नहीं जारी करना चाहिए? विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक उसका निर्माण खानपान की चीजों के लिए वैज्ञानिक मानक तैयार करने और उनके निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात का नियमन करने के लिए किया गया है। इसके अलावा उसका काम यह सुनिश्चित करना भी है कि उक्त खाद्य पदार्थ इंसान के खानेपीने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित हो। और एफएसएसए उन अनगिनत संस्थानों में से एक और है जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेंगे।

लेकिन इस विवाद ने जिस पहेलीनुमा विवाद को जन्म दिया है वह है चर्चित हस्तियों द्वारा ऐसे उत्पादों का विज्ञापन और कंपनियों द्वारा इनके विज्ञापन पर साल दर साल करोड़ों रुपये खर्च करना। कई लोगों को लगता है कि यह नीति अब अपनी उम्र पूरी कर चुकी है। यहां तक कि भारतीय उपभोक्ता भी अब इससे बहुत अधिक प्रभावित नहीं होते हैं क्योंकि ऐसी सुविख्यात शख्सियतों द्वारा किए जाने वाले विज्ञापनों और विज्ञापित वस्तुओं की भरमार हो चली है। ब्रांड प्रमोशन नीतियों में भी अब इसे कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती। जिस गति से प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है उसी गति से रचनात्मकता की मांग में भी इजाफा हो रहा है। वे दिन हवा हुए जब विकेट कीपर फारुख इंजीनियर की मनोहर छवि बिलक्रीम को भारत में लोकप्रिय बना सकती थी अथवा कपिल देव की वकालत से बूस्ट रातोरात घर-घर में जाना पहचाना नाम बन सकता था। अपने जमाने के प्रतिभाशाली हरफनमौला कपिल देव उस वक्त अपने चरम पर थे अब जबकि उनके बाल सफेद हो चले हैं और उनकी तोंद निकल आई है तो वे एक नई-नई ट्रेडिंग वेबसाइट के विज्ञापन में कमोबेश शर्मिंदा से नजर आते हैं।

हो सकता है भारतीय उपभोक्ताओं का विकास पश्चिमी उपभोक्ताओं के तर्ज पर नहीं हुआ हो लेकिन विज्ञापन होर्डिंग, पत्रिकाओं के विज्ञापनों और टेलीविजन पर दिखने वाले मशहूर चेहरे फिर भी नजर आते हैं, भले ही भ्रामक शक्ल में। जब ऐश्वर्या राय एक विदेशी शैंपू के गुणों का बखान करती नजर आती हैं तो आश्चर्य होता है कि कहीं उन्होंने चीन में बनी नाइलॉन की विग तो नहीं पहन रखी। इस बात की संभावना भी बहुत कम है कि आम भारतीय गृहिणी यह मानेगी कि खुद माधुरी दीक्षित ओट्स नूडल्स के स्वास्थ्यवर्धक गुणों को लेकर संतुष्टï हैं। बहरहाल बच्चों के लिए नियमित नाश्ते के बजाय नूडल्स की वकालत को वैसे भी सही नहीं माना जा सकता है और विज्ञापनों पर निगरानी रखने की जरूरत है।

चाहे जो भी हो लेकिन हर कोई यह जानता है कि चर्चित शख्सियतें जिन उत्पादों या सेवाओं का विज्ञापन करती हैं, वे शायद ही उनका इस्तेमाल करती हों। वे केवल पैसे के लिए यह काम करती हैं। वित्तीय तंगी से गुजरने के दौरान कुछ साल पहले अमिताभ बच्चन ने यह बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर खासे बड़प्पन का परिचय दिया था। ऐसे में इन चेहरों को किसी उत्पाद से जोड़कर देखना सही नहीं है। पेन से लेकर पेय पदार्थ तक और बीमा योजना से लेकर सीमेंट तक वे केवल विज्ञापन ही करते हैं। इसी तरह सचिन तेंडुलकर और महेंद्र सिंह धोनी भी तमाम वस्तुओं और सेवाओं का प्रचार करते हैं और उनका चेहरा ग्राहकों के जेहन में अटक जाता है। इस बात ने उन दोनों की निजी संपत्ति में भारी इजाफा किया है और उनके पास विज्ञापन के प्रस्तावों का अंबार है।

ऐसा कहा जा रहा है कि इन चर्चित हस्तियों को विज्ञापन करने के पहले उत्पाद के बारे में अच्छी तरह मालूमात कर लेनी चाहिए। अमिताभ बच्चन ने कहा है कि उन्होंने पेप्सी के साथ अपना लंबा जुड़ाव तब खत्म कर लिया जब एक स्कूली छात्रा ने उनसे कहा कि वह 'जहर' का प्रचार क्यों कर रहे हैं? इससे उनको करोड़ों रुपयों का नुकसान जरूर हुआ होगा लेकिन उनकी साख में बढ़ोतरी हुई। हमें बताया जाता है कि आमिर खान किसी विज्ञापन को हाथ में लेने के पहले कंपनी के व्यवहार से लेकर तमाम चीजों का गहन अध्ययन करते हैं। हालांकि तारे जमीं पर जैसी फिल्म और सत्यमेव जयते जैसे टेलीविजन शृंखला के सहारे अपनी छवि को एक नया रंग देने के पहले वह एक दशक तक कोका कोला का प्रचार कर चुके हैं। उस कंपनी के साथ उनका करार 2009 में समाप्त हुआ था। यकीनन वह ऐसे ब्रांड की तलाश में रहते हैं जो उनकी छवि चमकाएं।

साफ कहें तो पुलेला गोपीचंद जैसे खिलाड़ी अधिक प्रशंसा के पात्र हैं जिन्होंने एक शीतलपेय के विज्ञापन को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उनके लिहाज से वह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह था। समस्या दोतरफा है। कोई कंपनी यह दावा कैसे कर सकती है कि उसका ब्रांड ऐंबेसडर एकदम साफ सुथरा है। स्कैंडल से ग्रस्त क्रिकेट जगत में तो यह समस्या और बड़ी है (अभिनेता सलमान खान की भारी भरकम लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें अपवाद माना जा सकता है)। याद कीजिए कैसे कुछ साल पहले शराब पीकर वाहन न चलाने संबंधी एक प्रचार अभियान का चेहरा विजय माल्या को बनाया गया था। उसके असर के बारे में क्या कहा जाए!

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