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4जी की सफलता में होगी महारथी की क्षमता परीक्षा
इंद्रजित गुप्ता /  May 28, 2015

आरआईएल की 4जी वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवा की शुरुआत पर सबकी नजर है। इस सेवा के बहाने कंपनी की कार्य संस्कृति और उसके संपूर्ण प्रभाव का आकलन कर रहे हैं इंद्रजित गुप्ता

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) की 4जी वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवा की शुरुआत में अब ज्यादा समय शेष नहीं है। हालांकि अभी यह स्पष्टï नहीं है कि इसकी शुरुआत कब होगी लेकिन एक बात तो तय है, जैसे-जैसे लॉन्च की तारीख करीब आएगी, वैसे-वैसे हो-हल्ला और शोरशराबा बढ़ेगा। इस परियोजना पर पूरी दुनिया की नजर है। आरआईएल ने अत्याधुनिक दूरसंचार नेटवर्क तैयार करने के लिए 70,000 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्घता जताई है। यह निवेश देश को संचार क्रांति के अगुआ देशों में शुमार कर सकता है। पांच हजार शहरों और कस्बों के लिए एक मजबूत वॉयरलेस ब्रॉडबैंड नेटवर्क तैयार करने की तगड़ी चुनौतियां आरआईएल जैसे संस्थान तक की परीक्षा ले सकती हैं जिसे अपनी बेहतर परियोजना क्रियान्वयन क्षमताओं पर पूरा गर्व है।
तकनीकी चुनौतियों के अलावा भी यह परियोजना आरआईएल के शीर्ष से नीचे की ओर आने वाले केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया के मॉडल का अहम परीक्षण होगी। कर्मचारियों को जोडऩे और उनको सशक्त बनाने के मामले में आजकल नवाचार की संस्कृति और उच्च विश्वास का माहौल आधुनिक उद्यमिता के अहम पड़ाव हैं। लेकिन आरआईएल अपने नए उद्यमों में भी पूरी तरह एक अलग और विशिष्टï कार्य संस्कृति अपनाती आई है। यह एक ऐसी संस्कृति है जो परिणाम पर जोर देती है। यहां अंतिम परिणाम सबसे अधिक महत्त्व रखता है, माध्यम चाहे जो भी आजमाए गए हों। सभी प्रमुख नीतिगत फैसले संस्थान में एकदम उच्चतम स्तर पर लिए जाते हैं। हर कर्मचारी चाहे वह कितना भी वरिष्ठï हो, उससे यही उम्मीद की जाती है कि वह दिए गए काम को पूरा करे। उसका समय-समय पर अत्यंत सख्ती से मूल्यांकन भी किया जाता है। इन समीक्षा बैठकों से संबंधित कानाफूसी और किस्से बाहर भी आ जाते हैं जहां वरिष्ठï कर्मचारियों को समय पर काम पूरा न कर पाने के लिए सार्वजनिक रूप से फटकार सुननी पड़ती हैं। मिलजुलकर काम करने पर बहुत अधिक जोर नहीं दिया जाता। रिलायंस एक और पुरानी परिपाटी पर काम करता है। यहां एक ही परियोजना के लिए दो टीमें तैनात की जाती हैं और दोनों को एक दूसरे के बारे में कुछ भी पता नहीं होता। आरआईएल की काम करने की यह शैली आक्रामक जरूर है लेकिन इसके बावजूद कंपनी के चेयरमैन मुकेश अंबानी लगातार देश और विदेश से शीर्ष प्रतिभाओं को अपने साथ जोडऩे में कामयाब रहे हैं। कंपनी को परियोजना प्रबंधन और क्रियान्वयन के लिए विश्व स्तर पर प्रतिष्ठïा हासिल है।
यह अलग बात है कि करोड़ों रुपये पाने वाली इन प्रतिभाओं में से कुछ ही लंबे वक्त तक टिक पाती हैं और अगर वे टिकती भी हैं तो काम करने के लिए पूरी आजादी का ख्वाब शुरुआती कुछ महीनों में ही हवा हो जाता है। वे बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि वे एक बड़े पहिये के कलपुर्जे भर हैं। आरआईएल काम करने के लिए बहुत अच्छी जगह नहीं बताई जाती है।
ऐसा नहीं है कि हाल के दिनों में इस संस्कृति को बदलने का प्रयास न किया गया हो लेकिन सब बेमानी साबित हुआ। गूगल से प्रेरित होकर आरआईएल ने एक डिजाइनर की मदद से अपनी दीवारों को नए चटख रंग दिए। वहां प्रेरक पोस्टर लगाए गए। गत वर्ष उसने कंपनी के स्तर पर एक वेबकास्ट की योजना बनाई और कर्मचारियों को जोडऩे की पहल को लेकर संवाददाता सम्मेलन आयोजित किए। इस प्रक्रिया में कंपनी के चेयरमैन और शीर्ष टीम को शामिल होना था। लेकिन हुआ यह कि कोई यह बात कर्मचारियों और मानव संसाधन विभाग के वरिष्ठïों तक पहुंंचाना भूल गया और उनको अगले दिन इसकी खबर अखबारों में आई रिपोर्ट से लगी। लेकिन असल बात यह है कि आखिर में इसमें से कुछ भी मायने नहीं रखता। कंपनी को मालूम है कि आगे कैसे बढऩा है।
वर्ष 2002 में जब अंबानी ने रिलायंस इन्फोकॉम की शुरुआत की तो मैंने पूरी प्रक्रिया को करीब से देखा। वह आरआईएल की पारंपरिक परियोजना का सटीक उदाहरण था: अति महत्त्वाकांक्षी, बेहद जटिल और अशांत। लेकिन इसके बावजूद इसमें मूलभूत गुणधर्म मौजूद थे। आदेश और नियंत्रण वाली काम करने की शैली। कम विश्वास वाला भ्रामक माहौल। वरिष्ठï अधिकारियों के लिए रिवॉल्विंग दरवाजे और परदे के पीछे नीतियों में बदलाव को लेकर कानाफूसी का दौर। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कि अंबानी की महत्त्वाकांक्षा इससे जुड़ी हुई थी और इस परियोजना में कड़ी मेहनत की गई। यह अलग बात है कि 4,500 करोड़ रुपये बट्टïे खाते में डाल दिए गए। इसे शायद यह कहकर उचित ठहराया गया होगा कि भविष्य के बड़े कारोबार की बुनियाद तैयार करने के नाम पर यह कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है। ऐसे में उसके चर्चित परिचालन तंत्र और परियोजना क्रियान्वयन में उसकी मूल क्षमता की परीक्षा की बात क्यों? इसलिए कि उसने रिकॉर्ड समय में जो रिफाइनरी तैयार कीं उनके लिए कुछ श्रेय बेकटेल को भी जाना चाहिए जिसने पूरी इंजीनियरिंग, योजना और विनिर्माण पर नजर रखी। वहीं दूसरी ओर आरआईएल ने परिणाम और प्रबंधन के लिए बेकटेल को श्रेय देने का कमाल का काम किया। यह पूरा प्रकरण स्वप्न सदृश सही साबित हुआ। इस नई जियो परियोजना के लिए ऐसी कोई व्यवस्था पहले से करके नहीं रखी गई है। उसे सभी 100 वेंडरों का प्रबंधन खुद करना होगा। हकीकत यह है कि ऐसा करना कोई आसान काम नहीं है।
यह परियोजना तय समय से पीछे चल रही है और इसकी लागत में भी महत्त्वपूर्ण इजाफा हुआ है। स्पष्टï है कि क्षमता से ज्यादा काम ले लिया गया है। इस बात ने कंपनी के चेयरमैन की रातों की नींद उड़ा रखी है। इतना ही नहीं शायद कंपनी ने नेटवर्क की योजना और देश भर में फाइबर बिछाने को भी कम करके आंक लिया था। पहला, टॉवर लगाने के लिये नई जगह तलाशना मुश्किल था। ऐसे में उसने अन्य मौजूदा टॉवर नेटवर्क में संभावनाएं तलाशनी आरंभ कीं। यह पूरी प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण थी। हर नगर निकाय ने उनसे काफी कुछ वसूला। अगर स्थानीय स्तर पर सशक्त टीमों का निर्माण किया गया होता तो इसमें से कई काम आसानी से हल हो सकते थे लेकिन केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया ने चीजों को जटिल से जटिलतम बना दिया। नेटवर्क के पूर्ण इस्तेमाल और फाइबर बिछाने की प्रक्रिया बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरी। अब तक करीब 5 बार ऐसी कोशिश की जा चुकी है कि एक स्थिर नेटवर्क तैयार किया जाये जो 2,300 मेगावॉट के स्पेक्ट्रम पर अबाध ढंग से काम कर सके लेकिन सफलता हासिल नहीं हो सकी है। इसकी वजह से कंपनी सेवा शुरू करने में हिचकिचा रही है। समय बीतता जा रहा है और इस वर्ष के अंत तक सेवा शुरू करने में होने वाली कोई भी देरी दूरसंचार विभाग को यह अधिकार दे देगी कि वह रेडियो तरंगें वापस ले ले।

Keyword: Reliance industries, 4g, broadband,
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