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उनकी कमियां न गिनाइए, उनसे तालमेल बिठाइए
कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  May 26, 2015

अपनी हालिया सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर हाउसिंग डॉट कॉम के 26 वर्षीय सीईओ राहुल यादव की जितनी सराहना हुई, उतना ही उनका उपहास भी उड़ा। जहां कई लोगों को यादव की भड़ास अपरिपक्वता की निशानी लगी तो वहीं तमाम लोगों ने उनके मुखर अंदाज को भी सराहा। उनमें उन्हें एक योग्य विद्रोही, मुंहफट बेलौस अंदाज वाले शख्स की छवि नजर आती है, एक तरह से ई-कॉमर्स के सलमान खान की। यह शख्स कुछ बेअदब है लेकिन फिर भी अपरिहार्य (अपने अविवेकपूर्ण कृत्य के बावजूद वह अपने पद पर कायम हैं) है और उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किसी चुहलबाजी की कवायद से कैसा प्रचार मिलता है। उनके जुबानी तीरों ने यही असर पैदा किया कि वह लोगों के दिमाग में चढ़ गए।
अगर आप यादव की अभी तक की टिप्पणियों का आकलन करेंगे तो पाएंगे कि पांच किस्म के लोग उनके कोप का भाजन बने, जिसमें निवेशक (प्राइवेट इक्विटी फंड), निदेशक मंडल, निशाना बनाने वाले, साथी और प्रतिद्वंद्वी शामिल हैं। वास्तव में अगर आप इसे सोचें तो ये ऐेसे लोग हैं, जिनसे कारोबारियों का लगभग हर समय वास्ता पड़ता है, सिर्फ निदेशक मंडल के सदस्यों को छोड़कर, जिन्हें रबर की मुहर या आश्रितों की तरह माना जाता है। हालांकि यादव के उलट वे निजी बातचीत में ही ऐसा करते हैं। वे अपनी कटुता को शिष्टïता के आवरण से ढकना जानते हैं।
यादव के त्यागपत्र में निवेशकों पर तार्किक चर्चाएं करने में अक्षमता का आरोप लगाया गया है। फंड मैनेजर उनकी बुद्घिमता पर सवाल उठाने के उनके आकलन से शायद सहमत न हों लेकिन दुनिया झुंड में चलने की उनकी मानसिकता को पहले भी देख चुकी है और ईमानदारी से कहें तो यह उनमें भरोसे को कम करता है। पहले डॉटकॉम बुलबुले की स्मृतियां भी हर किसी के जेहन में ताजा हैं कि फंड मैनेजरों को सभी संदेहों से ऊपर रखा जाए।
जहां तक अपने साथियों और प्रतिद्वंद्वियों को लेकर यादव द्वारा भला-बुरा कहने का सवाल है तो मुझे यह बताने दीजिए कि कई कारोबारी, जिनमें कई आदरणीय नाम भी शामिल हैं, इससे भी बदतर अपराधों के दोषी हैं। उदारीकरण से पहले के दौर में किसी कारोबारी घराने का का मुख्य मकसद न केवल लाइसेंस हासिल करना था बल्कि यह भी तय करना था कि दूसरों के लाइसेंस हासिल करने की राह कैसे अटकाई जाए। तमाम छोटे कारोबारियों के आवेदन बिना किसी कारण के खारिज कर दिए जाते थे। उदारीकरण के दौर के बाद पर्दे के पीछे का वह खेल शायद बंद हुआ है लेकिन एक दूसरे के खिलाफ मोर्चेबंदी में कोई कमी नहीं आई है। किसी भी बीट पर काम करने वाला पत्रकार बता देगा कि अधिकांश मामलों में किसी कंपनी के ऊपर उछलने वाली कीचड़ के लिए मसाला निश्चित रूप से प्रतिद्वंद्वी द्वारा मुहैया कराया जाता है। कीचड़ उछालने का यह खेल न केवल प्रतिद्वंद्वियों के बीच खेला जाता रहा है बल्कि परिवार भी इससे अछूते नहीं रहे हैं, जहां भाई, भाई के खिलाफ, बहन-बहन के खिलाफ, भतीजा-चाचा के खिलाफ और यहां तक कि बेटा-बाप के खिलाफ खड़ा होता है। यह निजी और खतरनाक हमलों में भी तब्दील हो सकता है। इन पारिवारिक झगड़ों में जो कुछ हुआ, उसकी तुलना में यादव की जुबान से निकले तीरों की धार कहीं नहीं ठहरती।
जहां तक निदेशक मंडल के सदस्यों का सवाल है तो शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि प्रवर्तक ने उनकी बौद्घिक क्षमता पर सवालिया निशान लगाए हों, जैसा कि यादव ने अपने त्यागपत्र में किया। मगर आपके सामने ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं होगी, जहां उनकी स्वीकृतियों को हल्के में लिया जाता हो। जब वे किसी खामोश दर्शक की तरह काम करते हैं तो आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रवर्तक उनके बारे में क्या सोचते हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो सत्यम कंप्यूटर्स थी, जहां निदेशक मंडल, जिसमें तमाम नामी-गिरामी नाम शामिल थे, न केवल बी रामलिंगा राजू की गड़बडिय़ों का आकलन करने में नाकाम रहे बल्कि मायटास इन्फ्रास्ट्रक्चर में कंपनी के विलय के राजू के शर्मनाक प्रस्ताव पर सहमत भी हो गए थे।
लगभग 20 वर्षों पहले तक एक वक्त ऐसा भी था, जब तमाम भारतीय कारोबारी यादव जैसे बेलौस अंदाज में बात किया करते थे। मनु छाबडिय़ा के बात करने का अंदाज काफी दिलचस्प था। ललित मोहन थापर और रौनक सिंह जैसे लोग सीधे-सपाट अंदाज में बात किया करते। उनके पास जाना कभी जाया नहीं जाता था। उनके पास हर समय आपके लिए कहानियों का अंबार लगा होता था और इससे भी अहम बात यह थी कि उनमें से कुछ को नए सिरे से पेश करने पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं होता था लेकिन उसके परिणाम घातक भी होते। उनकी टिप्पणियों से किसी के लिए मुश्किलें भी पैदा हो जातीं लेकिन वह हास-परिहास का हिस्सा था। छवि निर्माताओं के उदय के साथ ही शेयर को लेकर संवेदनशील जानकारियों पर कड़े नियमन के चलते पत्रकार अब ऐसी रंगीन बातचीतों से महरूम हो गए हैं। इन दिनों सिर्फ राहुल बजाज ही अपवाद हैं, जो हमेशा बेबाकी से अपनी बात करते हैं।
जहां तक नजाकत का सवाल है तो जरा कारोबारी के चेहरे से शराफत का नकाब उतरने का इंतजार कीजिए। मुझे याद है कि पहले डॉटकॉम बुलबुले के शुरुआती दौर में दिल्ली के एक कारोबारी से मेरी मुलाकात हुई, जो कुछ कारोबारी विचारों के लिए ऐंजल निवेशक बनना चाहते थे। मेरी बात सुनने के बाद उन्होंने पूरी गंभीरता से कहा कि मानव तस्करी में बहुत पैसा है। फिर उन्होंने एक घंटे तक मुझे उस कारोबार की बारीकियां समझाईं। वह उस उपक्रम को वित्तीय मदद देने के लिए तैयार थे। गेंद अब मेरे पाले में थी। मैंने उनकी सलाह नहीं ली।
यादव की बेबाक बातों ने हमारी संवेदनाओं पर गहरी चोट की है क्योंकि वे उग्र और परंपरा से हटकर हैं। कारोबारी दुनिया की विनम्र कूटनयिक शैली उनके लिए नहीं है। पिछले दिनों एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर उन्होंने कहा, 'मैं पेशेवर कूटनीति और खरी बातों का संगम होते देख रहा हूं। संवाद का यही भविष्य है: त्वरित और सक्षम।' आप और विवादों और मनोरंजन के लिए तैयार रहिए।

Keyword: Commment, businessmen,
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