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न्यायपालिका की गुणवत्ता और आजादी से जुड़े यक्ष प्रश्न
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  May 24, 2015

पिछले कुछ हफ्तों में विधायिका और कार्यपालिका के हमलों के आगे न्यायपालिका खुद का ईष्र्यालु ढंग से बचाव करती नजर आई है। सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा ईजाद किए गए चयन समूह (कॉलेजियम) तंत्र की एक संवैधानिक पीठ के समक्ष धज्जियां उड़ाईं। सरकार इसकी जगह पर राजनीतिक मनोनयन वाली नियुक्ति सहित छह सदस्यीय समिति लाना चाहती है। इस मामले में जिरह जून में शुरू होगी। इस पर दांव इतना ऊंचा लगा है कि न्यायाधीशों ने गर्मियों की अपनी परंपरागत छुट्टिïयां तक रद्द
कर दी हैं।
फिर दो न्यायाधिकरणों की कहानी सामने आती है। अदालत ने इस बार खुद को कार्यपालिका से बचा लिया, जो न्यायाधिकरणों की स्थापना के साथ ही निरंतर रूप से न्यायिक शक्तियों को कुंद करने की कोशिशों में लगी रही। एक अन्य संवैधानिक पीठ के समक्ष कानूनी लड़ाई का ताजा दौर राष्टï्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के ढांचे को लेकर जुड़ा है। ये न्यायाधिकरण कंपनी कानून बोर्ड और औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड की
जगह लेंगे।
इन न्यायाधिकरणों की स्थापना के लिए वर्ष 2004 में पुराने कंपनी कानून में संशोधन किया गया था। हालांकि इसमें लोक सेवकों को जरूरत से ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल गया, जिन्हें कोई न्यायिक अनुभव नहीं था। जिन लोगों ने नियम तैयार किए, उन पर यह आरोप लगा कि इसके जरिये उन्होंने खुद अपने लिए ऐशगाह बना डाले। मद्रास बार एसोसिएशन ने इस योजना को चुनौती दी। वर्ष 2010 में उच्चतम न्यायालय ने तमाम प्रावधानों को नकार दिया और न्यायपालिका को प्रमुखता देने के लिए कई अहम बदलाव सुझाए। वर्ष 2013 में नया कंपनी कानून तो पारित हो गया लेकिन उसमें सुझाए गए परिर्वतनों को शामिल नहीं किया गया। इससे उसी याची द्वारा मुकदमेबाजी (मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ) का नया दौर शुरू हुआ। गत सप्ताह अदालत ने न्यायाधीशों को उचित जगह देने के लिए संशोधनों को अपनाने पर जोर दिया।
नई अद्र्व-न्यायिक संस्थाओं का गठन पहले ही एक दशक की देरी झेल चुका है क्योंकि नौकरशाह संवैधानिक पीठ के फैसले के अनुरूप नियमों को बदलने से कतराते रहे। नौकरशाहों के वर्ग ने मानो ऐसे शख्स सरीखा व्यवहार किया, जो दिखावे के लिए नींद में हो और अदालती आदेशों को मानने के लिए अपनी आंखें खोलने से इनकार कर रहा हो। वे अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले प्रभावों को लेकर बेपरवाह से नजर आए।
कुछ महीनों पहले की बात है, जब अदालत ने राष्टï्रीय कर न्यायाधिकरण अधिनियम, 2005 को खारिज कर दिया लेकिन सरकार ने नए कानून को लाने की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया। 2005 का कानून इस आधार पर खारिज कर दिया गया क्योंकि यह 'उच्चतम न्यायालय के विशेष क्षेत्राधिकार का बुनियादी तौर पर अतिक्रमण था।Ó न्यायाधिकरणवाद यानी न्यायाधिकरण के चलन को चुनौती देने वाला एक अन्य मामला संवैधानिक पीठ के समक्ष लंबित है। सरकार और न्यायपालिका के बीच यह संघर्ष का दौर 1990 के दशक से ही चला आ रहा है, जब नियमित अदालतों पर काम का बोझ कम करने के लिए न्यायाधिकरणों के गठन का सिलसिला शुरू हुआ था। लगभग जब भी किसी अहम न्यायाधिकरण का गठन प्रस्तावित होता तो उसी प्रकार की कानूनी चुनौतियां खड़ी हो जातीं, जहां अफसरशाह न्यायिक चोला पहनना चाहते तो वहीं न्यायाधीशों को उनका वह दांव नागवार लगता। अफसरशाही के मठाधीश तकनीकी क्षेत्रों में दक्षता का दावा करते, जो उन्हें न्यायपालिका में नहीं नजर आती। वहीं न्यायिक बिरादरी का दावा यही होता कि उन्हें दैवीय अधिकारों से लेकर स्पेक्ट्रम और पेटेंट जैसे सभी मसलों पर फैसला करने का अधिकार है।
अदालत ने कहा, 'यह फैसला करना विधायिका का अधिकार है कि न्यायाधिकरण में केवल न्यायिक सदस्य होने चाहिए या न्यायिक और तकनीकी सदस्यों का मिश्रण। लेकिन अगर सिर्फ तकनीकी सदस्य शामिल किए जाने चाहिए तो वे ऐसे लोग होने चाहिए, जिनकी कंपनी कानून या संबंधित विषयों में विशेषज्ञता हो और महज लोक सेवा का अनुभव कंपनी कानून में तकनीकी विशेषज्ञता के तौर पर नहीं माना जा सकता।Ó
वर्ष 1994 में प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित एक मामले में अदालत ने न्यायाधिकरणों के लिए पैमाने तय किए। हालांकि, विधायिका और कार्यपालिका ने उन पर ध्यान नहीं दिया और कंपनी कानून और कर न्यायाधिकरणों का गठन लटका रहा, जो अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। परिणामस्वरूप, तमाम न्यायविद न्यायाधिकरणों की उपयोगिताओं पर सवाल उठाते हैं। सरकार द्वारा वित्तीय तंगी की स्थिति भी शंका जताने की एक अतिरिक्त वजह है, जिससे पीठ के बुनियादी ढांचे, कर्मियों की स्थिति और रिक्तियां प्रभावित होती हैं।
अदालत ने फिर दोहराया, 'यह चिंता का विषय है कि न्यायपालिका की आजादी में उत्तरोतर कमी आ रही है और न्यायपालिका का दायरा सिकुड़ रहा है, जबकि इसी दौरान लोक सेवा से जुड़े लोगों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है, जो उस क्षेत्राधिकार में काम कर रहे हैं, जो पहले उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार माना जाता था। इसके साथ ही मामलों पर फैसला करने वाले व्यक्तियों के मानक और अर्हताओं में भी क्रमिक रूप से कमी आती जा रही है, जिसका निर्धारण पहले उच्च न्यायालय किया करते थे।Ó ये न केवल न्यायपालिका के लिए बल्कि समस्त राष्टï्र के लिए कुछ चिंतित करने वाले सवाल हैं।

Keyword: court, judiciary, justice,
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