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जाति-जाति का शोर, भाजपा ने पकड़ा संस्कृति का छोर
प्रणव सिरोही / नई दिल्ली May 22, 2015

प्रतीकों की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का शायद ही कोई और सानी हो। भारतीय वेदांत और दर्शन के शिखर पुरुष स्वामी विवेकानंद से लेकर आधुनिक भारत के निर्माता माने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के बाद पार्टी अब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर पर दांव लगाकर एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है। जानकार मान रहे हैं कि इससे जहां पार्टी को आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में फायदा मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए दिनकर का राष्ट्रवादी वैचारिक भाव अपने एजेंडे को सिरे चढ़ाने में मददगार हो सकता है। दिनकर को लेकर सत्तारूढ़ दल की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज विज्ञान भवन में आयोजित दिनकर की दो महत्त्वपूर्ण कृतियों 'संस्कृति के चार अध्याय' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की। अमूमन ऐसे कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नहीं जाते हैं। न केवल प्रधानमंत्री बल्कि बिहार से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, राधामोहन सिंह और गिरिराज सिंह के अलावा बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी भी शामिल हुए। इसी मंच से कार्यक्रम की आयोजन समिति के प्रमुख और बिहार भाजपा के दिग्गज नेता सी पी ठाकुर ने दिनकर को मरणोपरांत 'भारत रत्न' देने की मांग की।

हालांकि जानकारों को इसे लेकर सरकार की नीयत पर शक भी हो रहा है। साहित्यकार मंगलेश डबराल ने बताया, 'यह पूरी तरह सियासी पैंतरा है कि सरकार को अचानक दिनकर की याद आई। इससे पहले भी प्रेमचंद की 125वीं जयंती बीती और कई अन्य प्रमुख साहित्यकारों से जुड़े कार्यक्रम भी हुए लेकिन पिछली सरकार ने उनकी सुध तक नहीं ली।' दरअसल बिहार में इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और भाजपा का मानना है कि दिनकर को प्रतीक बनाकर वह बिहार में राजनीतिक तौर पर कुछ फायदा उठा सकती है।

प्रखर राष्ट्रवाद के प्रहरी दिनकर

जानकार भले ही दिनकर को प्रतीक बनाने की इस कवायद को संदेह के चश्म से देखें लेकिन इससे दिनकर के योगदान की अहमियत कम नहीं हो जाती, जो सही मायनों में भारतीय राष्टï्रवाद के प्रखर कवि माने जाते हैं। उनकी रचनाओं ने भी नए आजाद मुल्क को उसकी पहचान तलाशने से लेकर चीन के साथ हुई लड़ाई में मिली हार के बाद पस्त हौसले में फिर से नया दम भरने के लिए प्रेरित किया। यहां तक कि जब देश को जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत पड़ी तो वहां भी दिनकर की रचनाओं ने प्रेरणा का काम किया। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दिनकरजी का पूरा साहित्य खेत-खलिहान, गांव और गरीब से जुड़ा है। बिहार के लोगों तक व्यापक रूप से पहुंच बनाने के लिए भी मोदी ने दिनकर के 1961 में लिखे एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें दिनकर ने लिखा था- 'बिहार को जात-पात को भूलना और अच्छी राह पर चलने का रास्ता अख्तियार करना होगा।' मोदी ने इस पर कहा, 'आप एक या दो जातियों के सहारे शासन नहीं कर सकते। अगर आप जात-पात से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक बिहार का सामाजिक विकास प्रभावित होगा।'

इससे भी बढ़कर भारतीय संस्कृति पर किया गया दिनकर का काम भाजपा और संघ परिवार को खासा लुभावना लगता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के संबंध को तलाशती उनकी कृति 'संस्कृति के चार अध्याय' संघ परिवार की 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की अवधारणा के लिए किसी चाशनी से कम नहीं है। डबराल कहते हैं, 'वैसे तो दिनकर की अपील राष्ट्रीय है लेकिन संघ परिवार अपने एजेंडे को सिरे चढ़ाने के लिए उनके विचारों का इस्तेमाल करने की फिराक में है।' 

Keyword: ram dhari singh dinkar, BJP, RSS, narendra modi,,
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