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पश्चगामी कदम
संपादकीय /  May 06, 2015

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) ने एक बार फिर भारत को अपनी प्राथमिकता वाली निगरानी सूची में डाल दिया है। उसने ऐसा बौद्घिक संपदा अधिकार (आईपीआर) के संरक्षण के मामले में भारत का रिकॉर्ड खराब मानते हुए किया है। भारत के अलावा 11 अन्य देशों को भी इसी तरह श्रेणीबद्घ किया गया है। यह एक तरह से पिछले वर्ष उठाए गए कदम का दोहराव है। उस वक्त ऐसे ही सोच के चलते देश की आईपीआर व्यवस्था की समयपूर्व समीक्षा की गई थी।

लेकिन वर्ष 2014 में यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच शिखर बैठक के पहले उठाया गया था। उस बैठक में दोनों नेताओं द्वारा एक संयुक्त कार्य समूह के गठन का फैसला किया गया था। नवंबर में दिल्ली में कार्य समूह की बैठक के दौरान ही यूएसटीआर ने यह स्वीकार किया कि अमेरिका आईपीआर के मोर्चे पर द्विपक्षीय प्रगति चाहता है। दिसंबर में समयपूर्व समीक्षा की रिपोर्ट के निष्कर्ष बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित किए गए थे जिनमें कहा गया था कि आईपीआर को लेकर हो रही बातचीत में भारत की कोशिशें सार्थक, सतत और प्रभावी हैं। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी कहा गया था कि नई सरकार ने देश के आईपीआर कानूनों में सुधार के लिए नन्हे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

भारत की बात करें तो पहली बैठक के बाद आईपीआर समीक्षा समिति बनाई गई और यह चिंता जताई गई कि द्विपक्षीय नजरिया उस बहुपक्षीय ढांचे का अतिक्रमण कर रहा है जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए थे। यहां बात हो रही थी ट्रेड रिलेटेड एस्पेक्ट्स ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (ट्रिप्स) समझौते की जो विश्व व्यापार संगठन के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भारत ने अपने आईपीआर के कानूनी ढांचे में उल्लेखनीय सुधार किए।
भारतीय कानून को विश्व व्यापार संगठन में कोई खास चुनौती नहीं मिली। नैसर्गिक रूप से देश की आईपीआर व्यवस्था के पुनर्गठन की कोई भी कोशिश पूरी तरह उसके अपने हितों, तकनीकी नवाचार आदि से ताल्लुक रखने वाली ही होगी। अगर यह मान लिया जाए कि ऐसा अमेरिकी दबाव में किया जा रहा था तो बदलावों की विश्वसनीयता ही संदिग्ध होनी तय है।

चाहे जो भी हो, अमेरिका द्वारा भारत को उक्त सूची से हटाने से इनकार करना वर्ष 2014 में दोनों देशों द्वारा की गई प्रगति के एकदम विरोधाभासी है। यह हमारे द्विपक्षीय रिश्तों के लिए भी सही नहीं है। स्पष्टï है कि अमेरिकी सरकार घरेलू अंशधारकों से प्रभावित है और भारतीय उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा का दबाव महसूस कर रही है। अगर भारतीय उत्पादक ट्रिप्स के दायरे में रहते हुए भी प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं तो अमेरिकी दबाव निश्चित तौर पर चिंता का विषय है।

भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्ते बहुआयामी हैं और किसी एक मसले पर लगने वाला झटका दोनों शिखर बैठकों से हासिल लाभ को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाने वाला नहीं साबित होगा। आईपीआर के मुद्दे पर व्याप्त गतिरोध को इस नजरिये से भी देखा जाना चाहिए। कुलमिलाकर दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते (वर्तमान के और भविष्य के भी) तकनीक के इर्दगिर्द बुने गए हैं। दोनों दिशाओं में होने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी यही बताता है। अगर अमेरिका आईपीआर को लेकर विरोधी रुख कायम रखता है तो द्विपक्षीय व्यापार और निवेश का माहौल काफी अहम हो जाएगा। दोनों देशों को नवंबर और दिसंबर 2014 में जारी आधिकारिक वक्तव्यों पर सार्थक रूप से टिके रहना चाहिए। 

Keyword: america, USTR, IPR,,
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