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किस्से नेताजी के परिवार की जासूसी के
ईशिता आयान दत्त, रंजीता गणेशन और वीनू संधू /  May 01, 2015

कुछ सार्वजनिक फाइलों की सूचनाओं के मुताबिक आजादी के बाद भी सुभाष चंद्र बोस के परिवार की जासूसी की गई थी। बता रही हैं ईशिता आयान दत्त, रंजीता गणेशन और वीनू संधू

तत्कालीन कलकत्ता में 1940 के दशक का समय। औपनिवेशिक प्रशासन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 38/2 एल्गिन रोड और 1 वुडबर्न पार्क वाले घरों पर नजर रखे हुए था। हर वक्त कम से कम 14 अधिकारियों को इन घरों पर निगरानी रखने की ताकीद दी गई थी। कुछ अधिकारी सड़क के कोने पर खड़े रहते थे ताकि वे दोनों घरों की निगरानी कर पाएं जबकि कुछ नेताजी के घरों की ओर से जाने वाली भीड़ में ही मिल जाते थे।

नेता जी के भाई के पोते सुगत (शिशिर कुमार बोस के बेटे, वह एक इतिहासकार और तृणमूल कांग्रेस के सांसद भी हैं), सूर्य और चंद्र (अमिय नाथ बोस के बेटे) जासूसी की कहानियां काफी दिलचस्पी के साथ सुनाते हैं। लेकिन जब आप उनसे सार्वजनिक की गई दो फाइलों के बारे में पूछेंगे तो वे सहज महसूस नहीं करेंगे जिसके मुताबिक 1948 और 1968 के बीच भारत सरकार ने शिशिर और अमिय (नेता जी के बड़े भाई शरत चंद्र बोस के बेटे) पर इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी)के जरिये निगरानी रखी थी जिसमें उनके निजी पत्रों को पढऩे जैसा वाकया भी हुआ था। सुगत का कहना है कि इस वक्त कुछ चीजें पहेली के तौर पर देखी जा रही हैं। वर्ष 1958 में शिशिर को अपनी पत्नी कृष्णा के साथ हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में रॉकफेलर फेलोशिप पर अमेरिका जाना था जहां उन्हें बाल चिकित्सा रेडियोलॉजी के लिए कुछ काम करना था।

सुगत ने बोस पर अपनी लिखी किताब 'हिज मैजेस्टी ऑपोनेंट-सुभाष चंद्र बोस ऐंड इंडियाज स्ट्रगल अगेंस्ट एम्पायर' में लिखा है, 'मेरी मां का पासपोर्ट समय पर मिल गया लेकिन पिता के पासपोर्ट में असामान्य तरीके से देरी हुई। उनके जाने का वक्त जैसे जैसे करीब आया तब कलकत्ता में इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ को काफी सख्त लहजे में पत्र लिखना पड़ा। आखिरकार पासपोर्ट मिला। देरी की वजह यह बताई गई कि ब्रितानी शासनकाल से ही उनका नाम ब्लैकलिस्ट में दर्ज है और उसे हटाने में चूक हुई।' सुगत इस बात पर हैरानी जताते हैं कि क्या ऐसा सचमुच असावधानी की वजह से हुआ था?

वह बताते हैं, 'हम जानते हैं कि उनकी यात्रा पर आईबी की नजर थी। उन्होंने मेरे पिता का वह पत्र भी पढ़ा जिसे उन्होंने चाची एमिली (नेताजी की पत्नी) को लिखा था। एक पत्र में उन्होंने यह बताया था कि वह अमेरिका जा रहे हैं और वह विएना भी जाएंगे जहां वह रहती थीं। ऐसा नहीं है कि आजादी से पहले ऐसा होता था बल्कि वे सचमुच लगातार उन पर नजर रखे हुए थे।' सुगत कहते हैं, 'ब्रितानी शासनकाल के दौर में पिताजी को यह महसूस होता था कि जब भी वह वुडबर्न पार्क के अपने आवास से मेडिकल कॉलेज जाते थे तो कोई उनका पीछा करता था। उन्हें इस बात पर तब यकीन हुआ जब उन्हें कॉलेज के रास्ते में ही पकड़ कर 13, लॉर्ड सिन्हा रोड आईबी के मुख्यालय ले जाया गया। उन्हें एक रात वहां रखा गया जहां से उन्हें दिल्ली ले जाया गया। दिल्ली में उन्हें लाल किले में रखा गया फिर उन्हें ट्रेन से लाहौर ले जाया गया जहां उन्हें लाहौर किले की काल कोठरी में रखा गया।'

ब्रिटिश राज के दौरान बोस परिवार के ज्यादातर सदस्यों की जासूसी की गई। अमिय इंगलैंड में सात साल गुजारने के बाद दिसंबर 1944 में भारत वापस आ गए। उनके पिता शरत को कून्नूर में हिरासत में रखा गया था और नेताजी भारत-बर्मा सीमा पर युद्ध के आखिरी चरण में मसरुफ थे। परिवार के सबसे बड़े भाई कारावास की सजा काट रहे थे इस वजह से अमिय को कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत शुरू करनी पड़ी। बोस इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक सूर्य ने अमिय से ये कहानियां सुनी है। वह बताते हैं, 'पिताजी ट्राम से कलकत्ता हाईकोर्ट जाया करते थे। उन्होंने यह ध्यान देना शुरू किया कि वुडबर्न पार्क के घर के मुख्य गेट पर एक व्यक्ति निगरानी कर रहा है। वह आदमी ने ट्राम स्टॉप तक उनका पीछा किया और उनके पीछे ही ट्राम में आ गया। कई दिनों के बाद पिताजी ने उस आदमी से कहा कि तुम रोज मेरे पीछे आते हो तो मेरी मदद क्यों नहीं करते? कम से कम मेरी ब्रीफकेस ही ले लो। उसके बाद उस आदमी ने शुरुआती हिचक के बाद स्वीकार कर लिया।'

नेताजी के सबसे छोटे भाई शैलेश चंद्र बोस के बेटे अद्र्धेंदु उस वक्त काफी छोटे थे और उन्हें ïउस वक्त यह समझ नहीं थी कि उनके परिवार की निगरानी की जा रही है। लेकिन उन्हें यह बात जरूर याद है कि उनके पिता कभी-कभी यह कहते थे कि उन पर निगाह रखी जा रही है। वह बताते हैं, 'अगर किसी व्यक्ति का कोई पीछा करता है तो निश्चित तौर पर उसे संदेह होगा ठीक वैसे ही मेरे पिता को भी इस बात का आभास होता था कि उन पर निगाह रखी जा रही है। लेकिन यह सीधे तौर पर आक्रामक नहीं था। ऐसा भी नहीं था कि सनसनीखेज तरीके से बरसाती कोट में कोई आपका पीछा कर रहा हो।'

खुफिया विभाग में मौजूद शैलेश के एक दोस्त ने उन्हें यह चेतावनी दी थी कि उनके वर्ली स्थित आवास के फोन की टैपिंग की जा रही है। अद्र्धेंदु कहते हैं, 'इस स्पष्ट जासूसी से हमारे परिवार का कुछ भी नहीं बदला क्योंकि हम कुछ नहीं जानते थे।' सुभाष चंद्र बोस के भाइयों में शैलेश कानून या मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने के बजाय कारोबार में जाने वाले एकमात्र व्यक्ति थे जिसकी वजह से उन्हें मुंबई आना पड़ा। नतीजतन अद्र्धेंदु कलकत्ता के व्यापक राजनीतिक माहौल से दूर हो गए। उन्होंने बॉम्बे डाइंग के लिए बतौर मॉडल 1975 और 1985 के बीच कैमरे का सामना किया और 1990 तक वह हिंदी फिल्मों में वह एक अभिनेता के रूप में दिखे।

सुगत को भी प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र जीवन के दौरान ही जासूसी का आभास हो गया था। वह बताते हैं, '1970 के दशक में मैं जिन वाद-विवाद का आयोजन करता था उसकी खबर आईबी को होती थी। हमें हमेशा यह बात पता होती थी कि खुफिया विभाग के अधिकारी छिपे हुए हैं और हम जानबूझकर उन्हें तंग करने के लिए गलत सूचनाएं देते रहते थे मसलन हड़ताल कल से बुलाई जाएगी। लेकिन ये सभी सार्वजनिक स्तर की गतिविधियां थीं।'

शायद उन्होंने इस जासूसी को थोड़ी गंभीरता से तब लिया जब वह 1978 में कैंब्रिज में जा रहे थे। सुगत बताते हैं, 'मैंने जांच के लिए आए एक पुलिस अधिकारी की नोटबुक देखी और उसके पास उन सभी वाद-विवाद की पूरी सूची थी जिसका आयोजन मैंने किया था या जिसमें मैंने हिस्सा लिया था। उनको इस बात की जानकारी भी थी कि मैंने क्विज प्रतियोगिता का आयोजन कराया था। मैं यह सबकुछ सार्वजनिक रूप से कर रहा था लेकिन अगर सरकार ने यह सोचा हो कि मैं जहां बोल रहा हूं वहां आईबी एजेंट की उपस्थिति जरूरी है तो यह एक अलग मामला है। लेकिन अगर उन्होंने मेरे निजी पत्र खोले तो यह अलग तरह का अनुचित और अनधिकृत हस्तक्षेप है।'

जहां तक नेताजी का सवाल है सूर्य को ऐसा नहीं लगता है कि भारत सरकार को उनकी पीढ़ी की वजह से प्रभावित होना पड़ा हो। हां यह जरूर है कि उन्होंने जर्मनी में जब भी नेताजी पर कोई चर्चा होती थी तो अक्सर भारतीय दूतावास की ओर से रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग) का कोई प्रतिनिधि जरूर उपस्थित होता था। सूर्य याद करते हैं, 'जब पिताजी (अमिय) 1957 में जापान गए तब उन्हें एक अजीब तरह की बात महसूस हुई मानो कोई उनकी पीछा कर रहा है। उन्हें यकीन था कि ऐसा केवल भारत सरकार के निर्देश पर ही हो सकता है। लेकिन निश्चित रूप से वह इसके बारे में आश्वस्त नहीं हो सकते थे।' लेकिन महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि इस तरह की खुफिया जानकारी का आदेश किसने दिया? क्या वह शख्स जवाहरलाल नेहरू थे?  इस बात पर बोस पविार के सदस्यों की राय बंटी हुई प्रतीत होती है। सूर्य कहते हैं कि यह बिल्कुल स्पष्ट था कि नेहरू ने निजी तौर पर टोक्यो में भारतीय दूतावास से अमिय की गतिविधि पर नजर रखने को कहा था।

चंद्र कहते हैं, 'मेरे पिता नेहरू के साथ बेहद खुले हुए थे और वे खुले तौर पर समाजवाद और अबंध नीति (ऐसा सिद्धांत जिसके मुताबिक सरकार को वाणिज्यिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए) जैसे मामलों पर तर्क करते थे। लेकिन यह उनके निजी रिश्ते का एक हिस्सा था। जब 1957 में वह जापान जा रहे थे तो नेहरू को भी इस यात्रा की जानकारी थी। वह सीधे तौर पर उनसे बात करके यह पूछ सकते थे, 'तुम टोक्यो क्यों जा रहे हो?' इसके बजाय उन्होंने अपने विदेशी सचिव को उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का आदेश दे दिया। टोक्यो में मेरे पिता की जासूसी वहां पहुंचने के साथ ही शुरू हो गई। उनकी पल-पल की निगरानी की जाती थी और यह देखा जाता था कि वह कहां जा रहे हैं और उनकी मुलाकात किनसे हो रही है। मुझे नहीं लगता है कि किसी मंत्री में इतनी हिम्मत थी कि वे नेहरू की सहमति के बिना बोस परिवार की जासूसी कर पाते।' अमिय के बेटे को इस बात पर हैरानी होती है कि क्या नेहरू को इस बात का डर या आशंका थी कि नेताजी अब भी जिंदा हैं और इसी वजह से अमिय की निगरानी की जा रही थी।

अद्र्धेंदु इस मसले को एक नाटकीय पहलू के साथ जोड़ते हैं। वह कहते हैं, 'नेताजी भारत की तकदीर लिखने वाले लोगों में से थे। उनकी ख्याति नेहरू के करियर के लिए एक खतरा था। नेताजी के मुकाबले नेहरू की जिंदगी ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं रही। नेताजी ने कई दुस्साहसी काम किए जिसमें पनडुब्बी में जर्मनी से जापान तक का सफर करना और गुप्त रूप से अफगानिस्तान की यात्रा करना शामिल है। (हाल में हुए खुलासे में यह अंदाजा मिला है कि औपनिवेशिक पुलिस के गुप्तचर रेड नेटवर्क में भी थे और उन्हें काबुल में नेताजी की गतिविधियों के बारे में जानकारी थी।)' सुगत नेहरू की इस कथित आशंका को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं। उनके मुताबिक सिर्फ एक दस्तावेज है जिससे यह अंदाजा मिलता है कि नेहरू ने 1957 में जापान में विदेश सचिव के माध्यम से भारतीय राजदूत से उनके चाचा की गतिविधियों के बारे में पूछा था और उन्हें इसका पूरा ब्योरा भी दिया गया था। वह कहते हैं, 'मुमकिन है कि नेहरू खुद उस वक्त जापान में थे और वह नेताजी को श्रद्धांजलि देना चाहते हों।'

नेहरू के व्यक्तिगत रवैये और उनकी सरकार जो उस वक्त कर रही थी उसको एक ही नजरिये से देखना सुगत के लिए मुश्किल है। उनके पिता के ताल्लुक भी नेहरू के साथ थे और जब नेहरू 1961 में नेताजी रिसर्च ब्यूरो में गए थे तब वह उनके बगल में ही थे। सुगत बताते हैं, 'एक स्तर पर इन फाइलों से यह अंदाजा मिलता है कि सरकार नेताजी रिसर्च ब्यूरो के काम के लिए इन पत्रों को खोल रही थी। वहीं दूसरी ओर नेहरू 1961 में नेताजी रिसर्च ब्यूरो गए और पिताजी ने उन्हें अभिलेखागार और संग्रहालय दिखाया। उन्होंने पिताजी के काम की तारीफ की। पिताजी जब भी दिल्ली गए नेहरू उन्हें नाश्ते के लिए जरूर आमंत्रित करते थे।' इसमें कोई संदेह नहीं है कि नेताजी से जुड़े कई मिथक और किंवदंतियां रही हैं। आजादी के बाद किए गए जासूसी के दावे भी उसी तरह के अफवाहों की तरह हैं?

 'राज, सीक्रेट्स, रिवॉल्यूशन: अ लाइफ ऑफ सुभाष चंद्र बोस' के लंदन में रहने वाले लेखक मिहिर बोस का कहना है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि नेहरू ने दो बोस परिवार के सदस्यों पर निगरानी रखने के आदेश दिए थे। वह कहते हैं, 'मैंने अपनी किताब में नेताजी की मौत के बारे में काफी विस्तार से लिखा है लेकिन मुझे ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले जिससे यह अंदाजा मिले कि नेहरू ने भारत की आजादी के बाद बोस परिवार की जासूसी करने के लिए कोई आदेश दिए हों। जब मैं यह किताब लिख रहा था तब इस बात की काफी चर्चा थी कि सभी फाइलों को सार्वजनिक किया जा रहा है। लेकिन इनका संबंध इस बात से था कि नेताजी की मौत कैसे हुई न कि इनका इस बात से ताल्लुक था कि नेहरू ने उनके परिवार के लोगों के लिए क्या कदम उठाए। फाइलों के सार्वजनिक होने की वजह से ऐसी खबर आई थी।'

अगर नेहरू ने ऐसा नहीं किया तब आखिर सरकार में शामिल किस शख्स ने जासूसी का आदेश दिया होगा? सुगत कहते हैं, 'जासूसी की प्रक्रिया 1940 के दशक में शुरू हुई जब वल्लभभाई पटेल गृह मंत्री थे। दूसरे गृह मंत्रियों के कार्यकाल में भी यह निगरानी जारी रही जिनमें गोविंद वल्लभ पंत भी शामिल हैं। लाल बहादूर शास्त्री जब प्रधानमंत्री बने तब भी यह जासूसी जारी रही। वास्तविक जासूसी 13, लॉर्ड सिन्हा रोड (कलकत्ता) के खुफिया विभाग के मुख्यालय से की जा रही थी जब विधान चंद्र रॉय काफी वक्त तक मुख्यमंत्री रहे और उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए दोषमुक्त नहीं किया जा सकता है।' कुछ लोगों के साथ नेताजी के वैचारिक मतभेद जगजाहिर हैं। बोस परिवार इस बात पर एकमत है कि सरकार को इस बात की घोषणा कर देनी चाहिए कि किसने जासूसी के आदेश दिए और साथ ही नेताजी की सभी फाइलों को सार्वजनिक कर देना चाहिए। एक सरकारी पैनल को इस मसले पर गौर करने का आदेश दिया गया है। अब इस परिवार की मुख्य प्राथमिकता यह है कि सच लोगों की स्मृतियों से दूर नहीं होना चाहिए।

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