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केवल सपनों की सौगात से नहीं बढ़ेगा देश से होने वाला निर्यात
राहुल जैकब /  April 19, 2015

मार्च में चीन से होने वाला निर्यात 15 फीसदी घटा। यह हकीकत की ऐसी ठंडी फुहार है, जिसकी दुनिया को जरूरत नहीं। परिसंपत्ति की कीमतों में गिरावट और जिंसों के दाम में आई नरमी के प्रभाव ने चीन की सरकारी कंपनियों के मुनाफे में भारी सेंध लगाई है। इस्पात उत्पादन में जबरदस्त गिरावट के बाद ऑस्ट्रेलिया के लौह अयस्क निर्यातकों की चीन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं और वे भारत में अपना माल खपा रहे हैं, जहां वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान इस्पात के आयात में 71 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई।

जनवरी और फरवरी के संयुक्त निर्यात में दो अंकों की बढ़ोतरी को देखते हुए मार्च में उससे मिलते-जुलते आंकड़ों की अपेक्षा कर रहे अर्थशास्त्री हैरान रह गए। कुछ ने अमेरिका को छोड़कर चीन के बड़े कारोबारी साझेदारों की मुद्राओं की तुलना में रेनमिनबी के मजबूत होने की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ इस वाजिब तथ्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि वर्ष 2015 की पहली तिमाही में निर्यात असल में 4.7 फीसदी की दर से बढ़ा। शेष विश्व के लिए चिंता की बात यही है कि चीन के निर्यात में कमी आना, जो बमुश्किल भविष्य की संकेतक है, वह यह कि स्मार्टफोन इकोसिस्टम के बाहर उपभोक्ता एवं पूंजीगत वस्तुओं की वैश्विक मांग के साथ सब कुछ ठीक नहीं। मंगलवार को विश्व व्यापार संगठन ने कहा कि इस साल व्यापार में केवल 3.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जो पिछले साल के 2.8 फीसदी से अधिक रहा। फाइनैंशियल टाइम्स के व्यापार संपादक शॉन डोनान ने कहा कि वर्ष 2008 के वित्तीय संकट से तीन दशक पहले तक वैश्विक व्यापार की वृद्घि वैश्विक वृद्घि की तुलना मे दोगुनी रही, जिससे कुछ अर्थशास्त्रियों ने 'अतिभूमंडलीकरण' के दौर का नाम दिया। डब्ल्यूटीओ के अनुसार वर्ष 1990 से औसतन सालाना व्यापार वृद्घि 5.1 फीसदी रही है।  

मगर वर्ष 2014 लगातार तीसरा साल है, जब वैश्विक व्यापार में वृद्घि वैश्विक जीडीपी वृद्घि की तुलना में सुस्त रही। इससे एक दिन पहले ही ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में वैश्विक अर्थव्यवस्था के फिर से सुस्त पडऩे के जोखिम बताए गए हैं। बहरहाल इस पृष्ठïभूमि से अप्रभावित भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने इस महीने की शुरुआत में ऐलान किया कि भारत को अपने वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को वर्ष 2013-14 में 466 अरब डॉलर से बढ़ाकर वर्ष 2019-20 तक 900 अरब डॉलर करने पर लक्ष्य केंद्रित करना चाहिए।

एक अप्रैल को जब इस खबर को वेबसाइट पर देखा तो मुझे यह किसी लतीफे के माफिक लगी। मैं इस वृद्घि की दर की गणना के लिए खुद से ज्यादा आंकड़ों के महारथी शख्स को लगाना चाहूंगा लेकिन वाणिज्य मंत्रालय के अनुमान की थाह लेने के लिए कोई इनाम नहीं दिया जाएगा, जिसका संभावित वृद्घि का लक्ष्य न केवल डब्ल्यूटीओ द्वारा वैश्विक व्यापार की अनुमानित वृद्घि की तुलना में ऊंचा है बल्कि फरवरी तक 11 महीनों के दौरान देश से होने वाले वस्तु निर्यात की 0.88 फीसदी वृद्धि से भी अधिक है, जिसमें फरवरी में ही अकेले दो अंकों की गिरावट दर्ज की गई। हममें से तमाम इस सरकार के कर सकने वाले नजरिये के कायल हैं। कोई भी इस वादे पर निसार हो सकता है कि हमारे देश की सड़कों पर पसरे कचरे को साफ कर हमारे देश को जबरदस्त साफ सुथरा बनाया जाएगा। मगर लक्ष्यों को हकीकत के पैमाने पर भी तोलने की दरकार है, जिसे थकाऊ, विस्तृत ब्योरे वाले कार्यान्वयन योजना से साकार करना होगा। हमारे निर्यात लक्ष्यों को गंभीरता से लेना किसी परीकथा सरीखा होगा।

यह सही है कि वर्ष 2010 से चीन में श्रम की दरें सालाना दो अंकों में बढ़ रही है। निश्चित रूप से इसके मायने यही हैं कि बांग्लादेश, इंडोनेशिश और भारत में स्थानांतरित श्रम आधारित नौकरियों में इजाफा हो रहा है, जो हमारे हालिया कपड़ा निर्यात में बढ़ोतरी से यह झलकता है। कुल मिलाकर चीजों को आसान बनाने के लिए बहुत शिद्दत से काम करना है.....मसलन भारत में आयात और निर्यात को लेकर कारोबार की मुश्किलें कम करना।

वैश्विक व्यापार में संरचनागत बदलाव को उस जुमले से व्यक्त किया जा सकता है, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं में अक्सर नजर आता है। यह शब्द है-आपूर्ति शृंखला। वाहनों से लेकर स्मार्टफोन और तमाम ऐसी चीजों के विनिर्माता एक साथ जुड़ रहे हैं। द इकॉनमिस्ट के अनुसार 1990 के दशक के मध्य तक चीन शेष विश्व को जो विनिर्मित उत्पाद निर्यात करता था, उसके 40 फीसदी पुर्जे ही वहां बनते थे लेकिन अब चीन में ऐसे उत्पादों के 65 फीसदी पुर्जे बनते हैं। वर्ष 1990 में वैश्विक उत्पादन में एशिया की एक चौथाई हिस्सेदारी थी, जो अब तकरीबन आधी हो गई है। बहरहाल अब चीन में श्रम लागतों को लेकर जो नुकसान होने की आशंका है, उसका मुख्य फायदा भारत को नहीं बल्कि दक्षिण पूर्ण एशियाई देशों (आसियान) को मिलने का अनुमान है। यह क्षेत्र पहले ही ऊंची उत्पादकता वाले श्रमिकों के लिए मशहूर है और उनका जीडीपी भी ज्यादा बड़ा है।

सरकार ने हाल में हनोवर औद्योगिक मेले में 'मेक इन इंडिया' की मुहर वाले सोने के प्यालों और अधिकारियों के लिए योग का मुजाहिरा पेश किया लेकिन उसे भारतीय कृषि के कायाकल्प के लिए ग्रामीण अवसंरचना को बढ़ावा देने और खुदरा जैसे सेवा उद्योगों पर ध्यान दिया जाए ताकि हमारे पास सॉफ्टवेयर के अलावा भी कुछ और भी हो, जिस पर हम गर्व कर सकें। एक वक्त छोटे एवं मझोले उद्यमों के लिए आरक्षित उद्यमों का दायरा खोलने का कदम सही दिशा में उठाया गया है लेकिन इसे दो दशक पहले ही किया जाना चाहिए था। हमें यह अवश्य ही स्वीकार करना चाहिए कि हम चीन तो क्या आसियान की बराबरी भी नहीं कर सकते। केवल दंतकथाओं में ही कछुए, खरगोश को हराते हैं और इस मामले में तो कछुए की सेहत बेहद कमजोर, बुनियादी तालीम से महरूम और उसको हांकने वाले भी दशकों की गहरी नंीद में सोने वाले हैं। इस दौर में दुनिया बदल गई है और हम जरूरत के करीब भी नहीं बदल पाए।

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