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आबोहवा की दवा!
संपादकीय /  April 08, 2015

धीरे-धीरे भारत वायु की गुणवत्ता पर ध्यान देने को मजबूर हो रहा है। उत्तरी भारत में हाल में अपेक्षाकृत स्वच्छ यूरो-चार ईंधन की ओर कदम बढ़ाए गए हैं और एक राष्टï्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पेश किया गया है। हालांकि ये कदम बहुत मामूली हैं और जिस समस्या का उन्हें समाधान तलाशना है, वह बहुत गहरी है। दिल्ली जैसे बेहद प्रदूषित इलाकों में हालात तब तक बेहतर होने की संभावनाएं नहीं हैं, जब तक कि कुछ कारगर उपाय नहीं किए जाएंगे, जो दुखद रूप से अभी तक नहीं किए गए हैं। मिसाल के तौर पर वाहन उद्योग ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वह अगले कुछ महीनों में यूरो-चार मानकों के अनुरूप वाहनों का उत्पादन करने के लिए तैयार नहीं है। यह सब इस तथ्य के बावजूद है कि नियामकीय बदलावों पर काफी चेतावनियां जारी की गई थीं।

इसी तरह, इस बात को लेकर भी स्पष्टïता का अभाव है कि एक्यूआई से खराब गुणवत्ता वाली हवा की चेतावनी जारी होगी तो क्या कदम उठाए जाएंगे। खासतौर से दिल्ली में, विशेषकर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इसे दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर घोषित करने के बाद हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं। अगर ये खतरे कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताए जा रहे हैं तो भी पर्यटन पर पडऩे वाले प्रभाव को लेकर कुछ चिंता होनी चाहिए। दिल्ली के प्रदूषण में बड़ा भारी हिस्सा निकटवर्ती राज्यों का भी है, हालांकि तमाम ऐसे स्थानीय कारक भी हैं, जो यहां की आबोहवा खराब कर रहे हैं। राजधानी में रोजाना अन्य राज्यों से प्रवेश करने वाले यूरो-तीन मानकों वाले हजारों वाहन प्रवेश कर सकते हैं, जिनमें यूरो-चार मानकों के 50 पाट्र्स पर मिलियन (पीपीएम) गंधक की मात्रा की तुलना में 350 पीपीएम के साथ गंधक की बहुत ऊंची मात्रा होती है। उनसे 2.5 माइक्रॉन आकार के और हानिकारक तत्त्व निकलते हैं, जो फेफड़ों और रक्तप्रवाह में घुसकर कई बीमारियों का सबब बन सकती हैं। वर्ष 2012 के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि तकरीबन 40 फीसदी से अधिक बच्चों के 'कमजोर या संकुचित' फेफड़े थे, जिनमें वयस्क होने के साथ ही फेफड़ों के क्षतिग्रस्त होने का जोखिम था।

राष्ट्रीय हरित पंचाट ने अब 10 साल से पुराने डीजल वाहनों के राज्य में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह काफी हद तक इस पर निर्भर करेगा कि इस आदेश को कैसे अमल में लाया जाएगा। राजधानी की जहरीली होती खराब हवा के लिए कई अन्य कारक भी जिम्मेदार हैं: मसलन-कोयला आधारित बिजली संयंत्र और शहर में या उसके इर्द-गिर्द मौजूद प्रदूषण फैलाने वाली फैक्टरियां, गंदी सड़कें और झाड़ू लगाने से उठने वाली धूल, जो हवा में घुल जाती है, निर्माण कचरे को उचित रूप से ठिकाने न लगा पाना, दिल्ली और पड़ोसी राज्यों में गिरने वाले पेड़ और उनकी पत्तियों के अवशेष और खाना पकाने के लिए कोयले और खुली आग में खाना पकाना इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।

अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है तो प्रदूषण से जुड़े मसलों का समाधान तलाशना उतना मुश्किल भी नहीं है। अंत में, कुछ और विकल्प हैं जो निजी वाहनों के परिचालन को और मुश्किल और महंगा बनाते हैं और सार्वजनिक परिवहन बेड़े में विस्तार करते हैं, जिसका अर्थ यही है कि दिल्ली सरकार को संभवत: बस रैपिड ट्रांजिट (बीआरटी) कॉरिडोर्स के अपने फैसले को लेकर पुनर्विचार करना होगा, जो अगर बेहतर तरीके से लागू हो तो वह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ बन सकती है, जैसा कि कई शहरों में इसके जरिये यह उपलब्धि हासिल की गई है। इसके अलावा कंजेशन शुल्क जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

Keyword: india, polution, air, AQI,,
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