बिजनेस स्टैंडर्ड - लागत को लेकर जागरूक आरबीआई
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लागत को लेकर जागरूक आरबीआई
नीलाश्री बर्मन और मनोजित साहा / मुंबई April 03, 2015

विदेशी मुद्रा भंडार तीव्र गति से बढ़ रहा है और यह अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है। 6 सितंबर 2013 के 275 अरब डॉलर के निचले स्तर (जब मुद्रा संकट उफान पर था) के बाद अगले 18 महीने में यह भंडार 66 अरब डॉलर बढ़कर 27 मार्च 2015 को 341.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया। 28 अगस्त 2013 को 68.83 प्रति डॉलर पर पहुंचने वाला रुपया 9 फीसदी चढ़ चुका है।
मुद्रा और मुद्रा भंडार की किस्मत में बदलाव की शुरुआत भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के कुछ ठोस व नवोन्मेष वाले कदमों से हुई। इसके बाद निवेशकों की मनोदशा नरेंद्र मोदी सरकार की विजय के साथ मजबूत हुई, जिन्होंने वादा किया था कि वह सुधार में तेजी लाएंगे और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएंगे।
विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़त की पृष्ठभूमि में मुद्रा स्थिर हुई है और आयात कवर अभी करीब 10 महीने का है, जो अगस्त 2013 में 8 महीने से कम का था। साथ ही अर्थव्यवस्था में सुधार की पृष्ठभूमि में चालू खाते का घाटे व राजकोषीय घाटे में सुधार हुआ है, लेकिन भू-राजनैतिक तनाव के चलते चिंताएं अभी दूर नहीं हुई हैं, जो तेल की कीमतें भड़का सकती है और विदेशी फंडों की निकासी अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कयासों से हो सकता है। मार्च 2014 से विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा ऋणपत्र में आया है, जो ब्याज के प्रति संवेदनशील हैं और फेडरल रिजर्व ऐसे निवेश का प्रवाह पलट सकता है, लिहाजा रुपये पर दबाव बन सकता है। केंद्रीय बैंक विनिमय दर में गिरावट में संभावित जोखिम को लेकर सतर्क है, जो इसकी डॉलर खरीद में प्रतिबिंबित हुई है। एक ओर जहां केंद्रीय बैंक हमेशा से ही कहता रहा है कि इसने न तो विनिमय दर के और न ही विदेशी मुद्रा भंडार के किसी निश्चित स्तर को लेकर चल रही है और इसका हस्तक्षेप सिर्फ और सिर्फ उतारचढ़ाव में कमी लाने के लिए होता है। वहीं दूसरी ओर सवाल यह उठ रहा है कि वह कितनी लंबी अवधि तक भंडार बनाए रख सकता है क्योंकि इससे लागत जुड़ी हुई होती है। वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने हालांकि स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार इसी तरह के संचयन की तलाश कर रही थी। आर्थिक समीक्षा में चीन का उदाहरण दिया गया है और कहा गया है कि देश अपना विदेशी मुद्रा भंडार 750 अरब से 1 लाख करोड़ डॉलर के स्तर तक ले जाने का लक्ष्य तय कर सकता है।
इसमें कहा गया है, 'आज चीन वास्तव में वित्तीय संकट का सामना कर रही सरकारों के लिए आखिरी विकल्प के तौर पर उभरा है। चीन आज विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष दोनों ही भूमिकाएं निभा रहा है और वह भी अपने रिजर्व के दम पर।' भले ही यह रिजर्व डॉलर के मुकाबले रुपये में उतार-चढ़ाव की स्थिति में सुरक्षा की तरह काम आता है लेकिन इसके साथ ही इसे बढ़ाने और इसे बनाए रखने में सरकार को लागत भी वहन करनी पड़ती है।
कोटक सिक्योरिटीज के मुद्रा विश्लेषक ए बनर्जी ने बताया, 'जब आरबीआई ने हाजिर बाजार से डॉलर खरीदती है तो तंत्र में रुपये की आवक बढ़ती है। इससे महंगाई बढ़ती है। आरबीआई इसे ऐसे नहीं करना चाहती है इसलिए वह अपनी स्पॉट खरीद को फॉरवर्ड में बदल देती है और इस तरह फॉरवर्ड प्रीमियम के कारण इससे प्रत्यक्ष लागत जुड़ जाती है। अगर आरबीआई अतिरिक्त नकदी के लिए खुले बाजार परिचालन का रास्ता अख्तियार करता है तो भी इसमें लागत लगती है।'

Keyword: Investment, RBI, foreign currency,
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