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हाशिमपुरा: दर्द से आगे बढ़ी जिंदगी
मानवी कपूर /  March 29, 2015

मेरठ में 10 बजे सुबह का वक्त था। एक पुलिसकर्मी शहर के एक व्यस्त चौराहे पर सहजतापूर्वक यातायात को निर्देश दे रहा था। जब मैंने उससे हाशिमपुरा जाने के लिए रास्ता पूछा तो उसने अनभिज्ञता से मुझे देखा, कंधा हिलाया और वापस अपने पोस्ट में चला गया। निचली अदालत द्वारा उत्तर प्रदेश प्रांतीय सशस्त्र कॉन्सटेबुलरी (पीएसी) के 16 जवानों को मई 1987 में 44 मुसलमानों को मारने के आरोप से बरी किए जाने का मामला सुर्खियों में रहना चाहिए था लेकिन लगता है कि कानून के रखवालों सहित मेरठ के आम जनमानस के दिमाग में इस कथित क्रूरता का दृश्य अब धुंधला पड़ चुका है। शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर हाशिमपुरा के निवासी अब वैराग्य भाव से भय और निराशा के साथ संतुलन बिठाना सीख गए हैं। मुहल्ले में प्रवेश करते ही दिखा कि एक युवक कचरे के ढेर के समीप बीड़ी पी रहा था। पास में एक हिंदू मंदिर था जिसकी दीवार गेरुआ रंग की थी। जब मैंने उससे पूछा कि क्या मैं हाशिमपुरा पहुंच चुकी हूं तो उसनेे फोटो पत्रकार दलीप कुमार के कैमरे को देखा और दूसरे प्रवेश द्वार की ओर इशारा करते हुए बोला, 'मुझे लगता है कि आपको उस दरवाजे से जाना चाहिए।'
जब हम वहां पहुंचे तो उस युवक का निर्देश बिल्कुल स्पष्टï हो गया: वह उस क्षेत्र के बाहर खड़ा था जहां हाशिमपुरा के हिंदू रहते हैं और यह घटना कॉलोनी के मुस्लिम इलाके की थी। इलाके का सीमांकन स्पष्टï तौर पर धार्मिक आधार पर किया गया था।
खुले नाले, आवारा पशु और मक्खियों की भरमार से सडऩ की बू आ रही थी। हाल में मरम्मत किए गए कुछ मकानों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश मकान दोमंजिला थे और उनमें रहने वाले लोग निम्न मध्यम वर्ग के दिख रहे थे। करीब चालीस वर्षीय मोहम्मद आरिफ ने कहा कि यह घटना उन लोगों को लगातार परेशान कर रही है जो या तो पीडि़त हैं अथवा 1987 की रात भड़की हिंसा के प्रत्यक्षदर्शी हैं। उन्होंने कहा, 'मैं उस समय 15 वर्ष का था। आपको उन महिलाओं से बात करनी चाहिए जिन्होंने अपने बेटे, पति और भाई खोए हैं। उनकी जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो गई।'
निपटने का तरीका
बचे हुए अन्य लोगों की तरह श्रमिक अब्दुल करीम ने अपनी चोट के बारे में बताते हुए कहा कि उन्होंने उसका सामना युद्ध के घाव की तरह किया। अपनी बांह उठाते हुए उन्होंने कहा, 'उन्होंने सबसे पहले मेरी बांहों पर डंडे से मारा। जब मैं गिर गया तो लातों से मारा और कुछ अन्य लोगों के साथ घसीटते हुए ट्रक में लाद दिया।'
जब मैंने कुछ परिवारों से उनकी मौजूदा जिंदगी और आगे की राह के बारे में पूछा तो वे उस रात की घटना और उसकी जांच से खुद को अलग रखने की कोशिश करते दिखे। 53 वर्षीय मोहम्मद इकबाल ने कहा, 'उस रात घटना इसलिए घटी क्योंकि पुलिस और राजनेता दोनों की टसल थी। वे मुसलमानों को आतंकवादी के रूप में देखना चाहते हैं लेकिन अपने संकीर्ण सोच के कारण वास्तव में आतंकवादी वे खुद हैं।' इस घटना के कारण इकबाल को अपनी मेडिकल की पढ़ाई छोडऩी पड़ी और अब एक गैराज खोलकर अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं।
इकबाल ने बताया, 'इस फैसले से अब उम्मीद की कोई किरण नहीं दिख रही है। पुलिस बल में जब तक मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, इस प्रकार की घटनाएं थम नहीं सकतीं।' उनके इन शब्दों से मुस्लिम समुदाय में अन्याय की गहरी भावना साफ झलकती है। मोहम्मद अमजद 1987 में महज पांच साल के थे। उन्होंने कहा कि वह इस क्रूरता की कहानी को सुनते हुए बड़े हुए हैं। उन्होंने पूछा, 'लोगों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया और न ही नौकरी की सुरक्षा थी। हमने जिस किसी को वोट दिया, चाहे वह किसी भी पार्टी से ताल्लुक रखते हों, हमें नजरअंदाज किया। आज (मुख्यमंत्री) अखिलेश यादव कहां हैं?'
इस बीच, मोहल्ले के पुरुष एवं महिलाएं दिल्ली जाने वाली एक बस के आसपास जमा होने लगे ताकि वे इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील के लिए जाने वाले अपने परिवार के सदस्यों को विदा कर सकें। उनके भीतर गुस्से की आग जल रही होगी लेकिन वह दिख नहीं रही थी।
करीब 100 मीटर दूर खड़े शेर अली भीड़ को देख रहे थे। वह पेशे से दर्जी हैं और गुलमर्ग ऐंड संस नाम से एक दुकान चलाते हैं। पीएसी के छापे के दौरान उनकी दुकान जल गई थी। उन्होंने बताया, 'इस मामले में गवाह के रूप में मैं एक बार दिल्ली गया था। यह काफी निराशाजनक था कि हमने जो भुगता उसे जानने में अदालत अधिक दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी।' उनके दो बेटे हैं-एक चाटर्ड अकाउंटेन्ट और दूसरा होमियोपैथी डॉक्टर जो लखनऊ और दिल्ली में रहते हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने उनसे कहा कि ईमानदारी ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। और उन्हें लोगों की आंखों से दूर रखा।' हालांकि उन्हें लगता है कि पीडि़त लोगों को न्याय नहीं मिला, लेकिन लोग अब उस सदमे को भूलकर आगे बढऩा चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उसके बाद से अब तक यहां कोई हिंदू-मुस्लिम विवाद नहीं हुआ और दोनों समुदाय शांति और भाइचारे के साथ रह रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हमारे करीब 70 फीसदी ग्राहक हिंदू हैं। वास्वत में 1987 में जब मैंने दोबारा अपनी दुकान खोली थी तो मेरे पहले ग्राहक सुभाष नगर के शर्माजी थे।'

दोस्ताना पड़ोसी
हालांकि यहां से महज एक गली दूर हिंदू बहुल क्षेत्र है लेकिन उस क्षेत्र में एक भी हिंदू का मकान नहीं है जहां मुसलमान रहते हैं। अली ने कहा, 'आपको उन्हें कहना चाहिए। वे यहां कभी असुरक्षित महसूस नहीं करेंगे और हमलोग यहां शांतिपूर्वक रहते हैं।' एक 12 वर्षीय लड़का दोपहिया पर बैठा था और जब उससे पूछा कि मोहल्ले में हिंदू परिवार कहां रहते हैं तो उसने तुरंत पास के एक नीले दरवाजे की ओर इशारा कर दिया। वहां परिवार के पुरुष सदस्य काम पर चले गए थे और महिलाओं ने दरवाजा खोलने या बात करने से इनकार कर दिया। लौटते समय मैंने उस युवक से पूछा कि 1987 में क्या हुआ था तो वह चकरा गया। उसकी माता अपना सिर ढंककर बाहर आईं और सुरक्षित अंदाज में खींचते हुए अंदर ले गईं। उन्होंने कहा, 'हमने बच्चों को उसके बारे में अभी तक नहीं बताया है।' लगता है कि दर्द ने यहां व्यावहारिकता के लिए रास्ता बना दिया है। हिंदुओं वाली गली में 80 वर्षीय महिला बीरमल देवी ने बताया कि वह अब उस घटना को भूल चुकी थीं लेकिन पिछले कुछ दिनों से टेलीविजन पर उसे दोबारा दिखाया जाने लगा है। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी गली के बाहर मुसलमान समुदाय से जो भी थोड़ी-बहुत बातचीत होती है वह बिल्कुल शांतिपूर्वक लगती है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों से उनकी काफी शिकायत है खासकर वृद्ध पेंशन योजनाओं को लेकर लेकिन उसमें सांप्रदायिक कलह की कोई झलक नहीं दिखती है।
मुस्लिम समुदाय का एक सब्जी बेचने वाला देवी के घर के बाहर रुका। वह मुस्कराते हुए बोलीं, 'ये लोग अपना माल बेचने अक्सर हमारी गली में आते हैं। ऐसा कोई तनाव नहीं है जैसा कि मीडिया में दिखाया जा रहा है।' वहां की अन्य महिलाएं भी उनकी हां में हां मिलाते हुए आलू का मोलभाव करने लगीं।
सड़क के पार एक पुलिस बूथ खाली पड़ा था। उससे करीब एक किलोमीटर दूर शाहपीर गेट के अपने कार्यालय में एक पुलिसकर्मी क्रिकेट विश्व कप का सेमी-फाइनल मैच देख रहा था। उसने कहा, 'वह हमारे क्षेत्राधिकार में नहीं है।'
उससे करीब चार किलोमीटर दूर सिविल लाइन्स थाने के बाहरी डेस्क पर सब इंस्पेक्टर राम सिंह वकीलों और आगंतुकों से घिरे बैठे थे। उन्होंने गूगल नेक्सस4 पर बातचीत की और जरूरी मामलों को निपटाने लगे। उन्होंने कहा, 'फैसला आने के बाद तनाव की कोई खबर नहीं है। लेकिन यदि आप वहां जाते हैं और लोगों का दरवाजा खटखटाकर पूछते हैं कि वह कैसा महसूस कर रहे हैं तो वे भड़क जाते हैं।' तभी एक स्थानीय पार्षद आरिफ अंसारी और मेरठ के वकील शफीक अहमद बातचीत में शामिल हो गए। अहमद ने कहा, 'उनके वकीलों ने उन्हें डुबा दिया। इस तरीक के कमजोर प्रारूप के साथ वह कभी नहीं जीत सकते।' अंसारी को उस रात स्थानीय लोगों पर पीएसी के अत्याचारों को बयां करने का मौका मिल गया। उन्होंने कहा, 'उन्होंने शवों को सम्मान के साथ दफनाया भी नहीं। हमारे देश के पुलिस बल इतने भ्रष्टï हैं कि अपराधी खुले में घूम रहे हैं।' अंसारी काफी गुस्से में अपनी कुर्सी से उठकर हमारे करीब आ गए और 1987 की उस दुर्भाग्यपूर्ण रात की भयावह घटना के बारे में बताने लगे। तभी सिंह ने उनसे कहा कि वह कुछ भी बोल सकते हैं लेकिन इस घटना बारे में बोलना सही नहीं होगा क्योंकि इससे दोबारा तनाव पैदा हो सकता है। इस पर मुस्कराते हुए अंसारी ने कहा, 'बिल्कुल, यह सिंह साहब के कार्यकाल से पहले हुआ था और अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता है।'

Keyword: Meerut, communal violence, hashimpura,
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