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आईबीए के साथ मिलकर एसएमई के प्रदर्शन और क्रेडिट की रेटिंग
अनिंदिता दे /  March 29, 2015

हाल में बजट में घोषित दिवालिया कानून सुधारों के नक्शेकदम पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय एमएसएमई के प्रदर्शन और क्रेडिट रेटिंग की योजना लागू कर रहा है। यह प्रस्ताव का क्रियान्वयन इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के साथ मिलकर किया जा रहा है और इसे 'प्रदर्शन एवं क्रेडिट रेटिंग योजना' नाम दिया गया है। इस प्रस्ताव का मकसद एमएसएमई की क्षमताओं और ऋण पात्रता के बारे में तीसरे पक्ष द्वारा विश्वसनीय सलाह मुहैया कराना और एमएसएमई को उनके वर्तमान परिचालन की शक्तियों और कमजोरियों के बारे में जागरूक
करना है।
अधिकारियों ने कहा कि एमएसएमई के लिए ऋण लेना सबसे बड़ी बाधा बन गया है, क्योंकि आमतौर पर बैंक और वित्तीय संस्थान उनके ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में आशंकित रहते हैं। कई बार कहीं से भी ऋण नहीं मिल पाता है और एमएसएमई की स्थिति खराब हो रही है। इसलिए मंत्रालय ने आसान से वित्त उपलब्ध कराने के लिए यह योजना बनाई है। इस योजना के तहत रेटिंग सूची में शामिल रेटिंग एजेंसियों द्वारा दी जा रही है और सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों द्वारा चुकाई जाने वाली रेटिंग फीस में केवल पहले साल ही सब्सिडी मिलेगी। सूची में शामिल एजेंसियों के जरिये इस योजना को लागू करने के लिए राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (एनएसआईसी) को नोडल एजेंसी नियुक्त किया गया है।
उन्होंने कहा कि तीसरे पक्ष की रेटिंग के अलावा ऐसी क्रेडिट रेटिंग से आकर्षक ब्याज दरों पर कर्ज उपलब्धता, वैश्विक कारोबार में मान्यता, बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के जल्द ऋण स्वीकृति, एसएसआई के लिए रेटिंग फीस में सब्सिडी की सुविधा मिलेगी। दूसरी ओर बैंक एवं वित्तीय संस्थानों को फायदा मिलेगा। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को सबसे बड़ा फायदा यह मिलेगा कि उन्हें कर्ज लेने वाली एसएसआई इकाई की ताकत और कमजोरियों का स्वतंत्र मूल्यांकन प्राप्त हो सकेगा। इससे बैंक और वित्तीय संस्थान अपने ऋण जोखिम का ठीक से प्रबंधन कर सकेंगे। हाल में आरबीआई की एक रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि हालांकि देशों और संबंधित व्यवसायों में स्थिति अलग-अलग है, लेकिन विकासशील देशों में एसएमई के लिए वित्त की कमी की कई वजह हैं। इनमें ज्यादा जोखिम, लेन-देन की ज्यादा लागत और गिरवी रखने के लिए पर्याप्त संपत्ति नहीं होना शामिल हैं।  इसके अलावा एमएसएमई को वित्त की किल्लत में तीन कारकों की अहम भूमिका है। इनमें जिन परियोजनाओं के लिए कर्ज लिया जा रहा है, उनकी कमजोर गुणवत्ता होना, वित्त के लिए एमएसएमई का उपलब्ध स्रोतों का इष्टतम उपयोग न कर पाना और इक्विटी फाइनैंसिंग के प्रति एमएसएमई का नकारात्मक दृष्टिकोण होना है।  रिपोर्ट के मुताबिक एसएमई को ऋण की जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर के पुख्ता आंकड़े नहीं हैं। आईएफसी और मैकेंजी ऐंड कंपनी (मैकिंजी) द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक उभरते बाजारों में करीब 36.5 से 44.5 लाख सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग हैं, जिनमें से 2.5 से 3 लाख औपचारिक एसएमई और 5.5 से 7 करोड़ औपचारिक सूक्ष्म उद्योग हैं, जबकि शेष (28.5 से 34.5 करोड़) अनौपचारिक उद्योग हैं।
इसी अध्ययन में कहा गया है कि उभरते बाजारों में औपचारिक एसएमई (1.1 से 1.7 करोड़) में 45 से 55 फीसदी की औपचारिक संस्थागत ऋण या ओवरड्राफ्ट तक पहुंच नहीं होती है, जबकि उन्हें इसकी जरूरत होती है। अगर सूक्ष्म एवं अनौपचारिक उद्योगों को शामिल करें तो कम ऋण उपलब्धता की खाई ज्यादा चौड़ी है। सभी एमएसएमई (24 से 31.5 करोड़) में 65 से 72 फीसदी को ऋण सुविधा नहीं मिल पाती है। ऋण की जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है। एशिया और अफ्रीका में स्थिति ज्यादा खराब है। भारत में एसएमई के बारे में कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि उनकी 93 फीसदी वित्तीय जरूरत आंतरिक और अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती है।

Keyword: SME, Credit rating, IBA,
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