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सराहनीय पहल
संपादकीय /  March 24, 2015

राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार पिछले दिनों जहां कई अध्यादेशों को कानून बनाने के क्रम में विधायी मंजूरी हासिल करने में कामयाब रही, वहीं वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन एक अपवाद के रूप में हमारे सामने आया। सरकार ने इस कानून में जिन बदलावों का प्रस्ताव रखा उन्होंने तमाम राजनीतिक सरगर्मियों को जन्म दिया। अनेक विपक्षी दलों और यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ सहयोगियों ने भी कानून में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध किया। प्रधानमंत्री ने सरकारी रेडियो से अपने राजनीतिक विरोधियों को जवाब दिया और सरकार के प्रस्तावित संशोधनों की वकालत की। बहरहाल, अभी भी इस बात को लेकर पर्याप्त अनिश्चितता है कि आगे क्या होगा? सबसे पहले तो सरकार की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने वर्ष 2013 में पारित कानून को लेकर जताई जा रही चिंताओं के निवारण के प्रति उत्सुकता दिखाई। यह सच है कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए उस कानून का समर्थन किया था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि सत्ता में आने के बाद वह संभावित दिक्कतों का ख्याल करते हुए उसमें बदलाव नहीं ला सकती। यह बात भी स्वागतयोग्य है कि विनिवेश चक्र को शुरू करने के क्रम में ख्ुाद प्रधानमंत्री ने एक कठिन रास्ता अपनाया है, जिसके अपने राजनीतिक जोखिम हैं। इससे यह पता चलता है कि सरकार जटिल सुधार संबंधी उपायों को अपनाने की इच्छुक नजर आ रही है। यह कहना सही न होगा कि संशोधन विधेयक के मौजूदा मसौदे में कोई दिक्कत नहीं है। मसलन, सहमति के प्रावधान को लेकर कई लोगों की चिंता जायज है। बिना सहमति के भूमि अधिग्रहण अनुचित है और इससे तब तक बचा जाना चाहिए जब तक कि अधिग्रहण को रोकने की कोशिश किसी खास समूह द्वारा जानबूझकर अतिरिक्त धनराशि हासिल करने के लिए न की जा रही हो। शायद 80 प्रतिशत सहमति का मौजूदा स्तर बहुत अधिक है। अगर ऐसा है तो संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार शायद सहमति के प्रावधान के कुछ पहलुओं पर रियायत के पक्ष में हो, खासतौर पर इसलिए कि अधिग्रहण एक भावनात्मक मसला भी है। सहमति अथवा असहमति के राजनीतिक जोखिम से परियोजनाओं को प्रभावित होने देना भी सही नहीं। ऐसे में विपक्ष और सरकार को साथ मिलबैठकर कोशिश करनी चाहिए कि एक ऐसा फॉर्मूला सामने आ सके जिसके जरिये दोनों पक्षों को संतुष्टï किया जा सके।
बजाय कि सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने के। सरकार वर्ष 2013 के कानून में जो अन्य बदलाव करना चाहती है उनमें से एक है सामाजिक प्रभाव आकलन के प्रावधान को समाप्त करना। यह इस कानून का एक अहम हिस्सा है। इसे शामिल करने का मकसद है भूमि गंवाने वालों की उचित पहचान करना तथा उनकी भी जिनकी आजीविका पर भूमि अधिग्रहण का नकारात्मक असर पड़ता है। सरकार का यह कहना सही है कि इस आकलन के लिए तय समयावधि बहुत अधिक है और उसकी वजह से अधिग्रहण की प्रक्रिया इतनी ज्यादा धीमी हो जाती है कि पूरी प्रक्रिया ही बेमानी हो जाती है। लेकिन समझदारी बरती जाए तो यहां भी समझौते की गुंजाइश है।
ऐसे आकलन के लिए एक तयशुदा समयावधि भी निर्धारित की जा सकती है। ऐसा फिलहाल पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं के साथ देखने को मिल रहा है। चाहे जो भी हो लेकिन सरकार की कानून में सुधार संबंधी कोशिशों के लिए सराहना की जानी चाहिए। इतना ही नहीं विपक्ष को सरकार की मदद से एक ऐसा संशोधन तैयार करना चाहिए जिससे दोनों पक्ष सहमत हो सकें।

Keyword: NDA, Ordinance, Bill,
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